For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,173)

लघुकथा :साथी

गौरी, पिता के स्नेहिल परिधि में एक साथी की परिभाषा का 'प' समझ पाई। उसी पिता के आँगन में एक लंबा सा साथ निभाने के लिए उसके बचपन को बांटने के लिए भाई के रिस्ते ने साथ दिया। तब वह साथी की परिभाषा के दूसरे पायदान पर 'रि' रूपी रिस्ते को समझने की कोशिश भर कर रही थी। पिता का वह आँगन गौरी की परवरिश के साथ-साथ, बेटी के पराये होने का एहसास भी कराता रहता था। उसकी शिक्षा-दीक्षा की इतिश्री मानकर पिता ने जीवन के लिए, फिर से एक साथी की तलाश शुरू कर दी। जो बेटी भाग्य विधाता होगा। पिता से भी ज्यादा अच्छे से…

Continue

Added by Vijay Joshi on February 2, 2018 at 12:30am — 2 Comments

ज़िन्दगी की सच्चाई पन्नों पर

ज़िन्दगी की सच्चाई पन्नों पर

हरकीरत हीर जी कौन हैं -- यह मुझे पता नहीं, मैं उनसे कभी मिला नहीं, परन्तु हरकीरत हीर जी क्या हैं, यह मैं उनकी रचनाओं में ज़िन्दगी की सच्चाई से भरपूर संवेदनाओं के माध्यम बहुत पास से जानता हूँ।

ज़िदगी के उतार-चढ़ाव में गहन उदासी को हम सभी ने कभी न कभी अनुभव किया है, परन्तु भावनाओं को कैनवस पर या पन्ने पर यूँ उतारना कि…

Continue

Added by vijay nikore on February 1, 2018 at 10:13pm — 10 Comments

कविता : शून्य बटा शून्य

उसने कहा 2=3 होता है

 

मैंने कहा आप बिल्कुल गलत कह रहे हैं

 

उसने लिखा 20-20=30-30

फिर लिखा 2(10-10)=3(10-10)

फिर लिखा 2=3(10-10)/(10-10)

फिर लिखा 2=3

 

मैंने कहा शून्य बटा शून्य अपरिभाषित है

आपने शून्य बटा शून्य को एक मान लिया है

 

उसने कहा ईश्वर भी अपरिभाषित है

मगर उसे भी एक माना जाता है

 

मैंने कहा इस तरह तो आप हर वह बात सिद्ध कर देंगे

जो आपके फायदे की है

 

उसने…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 1, 2018 at 8:45pm — 6 Comments

ग़ज़ल इस्लाह के लिए :मनोज अहसास

221 2121 1221 212

हमनें यूँ ज़िन्दगानी का नक्शा बदल लिया

देखा तुझे जो दूर से रस्ता बदल लिया

तुमने भी अपने आप को कितना बदल लिया

नज़रों की ज़द में आते ही चहरा बदल लिया

जब इस सराय फानी का आया समझ में सच

हमनें भरी दुपहर में कमरा बदल लिया

दादी की जलती उंगलियों का दर्द अब नहीं

हामिद ने इक खिलौने से चिमटा बदल लिया

दीवानगी भी ,शाइरी भी,दिल भी, शहर भी

तुमको भुलाने के लिए क्या क्या बदल लिया

कांपी तमाम रात…

Continue

Added by मनोज अहसास on February 1, 2018 at 6:12pm — 6 Comments

आहट की प्रतीक्षा में ...

आहट की प्रतीक्षा में ...

जाने

कितनी घटाओं को

अपने अंतस में समेटे

अँधेरे में

चुपचाप

बैठी रही

कौन था वो

जो कुछ देर पहले

देर तक

मेरे मन की

गहन कंदराओं में

अपने स्वप्निल स्पर्शों से

मेरी भाव वीचियों को

सुवासित करता रहा

और

मैं

ऑंखें बंद करने का

उपक्रम करती हुई

उसके स्पर्शों के आग़ोश में

मौन अन्धकार का

आवरण ओढ़े

चुपचाप

बैठी रही

आहटें

रूठ गयीं…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 1, 2018 at 3:23pm — 13 Comments

भीतर-बाहर

भीतर-बाहर

हाँफती धुमैली साँसों की धड़कन

लगता है यह गाड़ी अचानक

किन्हीं अनजान अपरिचित

दो स्टेशनों के बीच

ज़बर्दस्ती

रोक दी गई है, कब से…

Continue

Added by vijay nikore on February 1, 2018 at 9:06am — 13 Comments

कविता -संघर्ष

हौसलों की बैसाखी से

हर मंज़िल को पार किया है

दया-सहानुभूति को

हरदम दर किनार किया है

जब-जब घिरे बादल विपत्ति के

बिजलियाँ चमकीं विचलन की

ख़ुद को मैंने धारदार किया है

बाधाओं को परास्त करता गया

बीज सफलता के बोता गया

भय के काँटों को लाचार किया है

गिरा नहीं , लड़खड़ाया नहीं

इरादा कभी मेरा डगमगाया नहीं

जीवन सुनामी को पार किया है

किया सदैव साहस का आलिंगन

धैर्य का उपवन सजाया है

संघर्षों का मैंने श्रृंगार किया है ।…

Continue

Added by Mohammed Arif on February 1, 2018 at 8:30am — 9 Comments

दूर दामन से तेरे गर्दिश-ए-अय्याम रहे - SALIM RAZA REWA

2122 1122 1122  22/112

ये हमारी है दुआ शाद तू गुलफा़म रहे

दूर ही तुझसे सदा गर्दिश-ए-अय्याम रहे

-

सारी दुनिया में तेरे इल्म की महके ख़ुश्बू

जब तलक चाँद सितारें  हों तेरा नाम रहे

-

इस तरह तेरे तसव्वुर में मगन हो जाऊँ

मुझको अपनों से न ग़ैरों से कोई काम रहे

-

जब तेरी दीद को हम शहर में तेरे पहुंचें

अपने दामन से न लिपटा कोई इल्ज़ाम रहे

-

तेरी ख़ुशहाली की हरपल ये दुआ करते हैं 

तेरे  दामन  में  ख़ुशी  सुब्ह रहे शाम रहे …

Continue

Added by SALIM RAZA REWA on February 1, 2018 at 7:30am — 26 Comments

फितरत नहीं छिपती है - (गजल)- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१ १२२२ २२१ १२२२



नफरत के बबूलों को आँगन में उगाओ मत

पाँवों में स्वयं के अब यूँ शूल चुभाओ मत।१।



ऐसा न हो यारों फिर बन जायें विभीषण वो

यूँ दम्भ में इतना भी अपनों काे सताओ मत।२।



फितरत नहीं छिपती है कैसे भी मुखौटे हों

समझो तो मुखौटे अब चेहरों पे लगाओ मत।३।



माना कि तमस देता तकलीफ बहुत लेकिन

घर को ही जला डाले वो दीप जलाओ मत।४।



ढकने को कमी अपनी आजाद बयानों पर

फतवों के मेरे  हाकिम  पैबंद  लगाओ…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2018 at 6:00am — 15 Comments

ग़ज़ल (मैं क़िस्मत आज़माई कर रहा हूँ )

(मफ़ाईलुन -मफ़ाईलुन- फ़ऊलन)



मैं क़िस्मत आज़माई कर रहा हूँ |

शुरूए आशनाई कर रहा हूँ |

चुरा कर वो नज़र कहते यही हैं

मैं उनसे बेवफ़ाई कर रहा हूँ |

दिया है सिर्फ़ शीशा एब जू को

मैं कब उसकी बुराई कर रहा हूँ |

जमी जो धूल दिल के आइने पर

उसी की मैं सफ़ाई कर रहा हूँ |

सितमगर सिर्फ़ हक़ माँगा है अपना

मैं कब बेजा लड़ाई कर रहा हूँ |

परख लेना कभी भी वक़्ते मुश्किल

नहीं मैं ख़ुद नुमाई…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 31, 2018 at 12:30pm — 13 Comments

विधाता छंद-रामबली गुप्ता

न किंचित स्वार्थ हो हिय औ', भुला कर वैर जो सारे।

अमीरी औ' गरीबी के, मिटा कर भेद सब प्यारे!

करें सहयोग हर जन का, सभी के काम जो आते।

सदा वे श्रेष्ठ जन जग में, सुयश-सम्मान हैं पाते।।1।।

धरे हिय धैर्य औ' साहस, निरन्तर यत्न जो करते।

न किंचित राह की बाधा, न मुश्किल से किन्हीं डरते।

सहें हर यातना पथ की, शिखर पर किन्तु चढ़ते हैं।

वही प्रतिमान नव बन कर, अमिट इतिहास गढ़ते हैं।।2।।

सदा सुरभित सुमन बन कर, दिलों में जो यहाँ खिलते।

भुला कर…

Continue

Added by रामबली गुप्ता on January 31, 2018 at 11:54am — 7 Comments

माँ की चिंता

/माँ की चिंता//

''माँ तुम आज फिर,अब तक जाग रही हो? कितनी बार समझा चुकी हूँ कि ठंडी रातों में इतनी देर तक जागना तुम्हारी सेहत के लिए ठीक नहीं है।"

फिर से अस्थमा का दौरा पड़ सकता है। तुम समझने का नाम ही नहीं लेती हो!

आई बड़ी समझाने वाली। 'बेटी, मेरी चिंता छोड़, जीना ही कितने दिन है।' और "जिसकी बेटी देर रात तक काम से लौटे उस माँ को नींद कहाँ से आएगी।"

माँ दरवाजे पर ही टकटकी लगाये बैठी थी।

'बेटी तेरा काम क्या है?' कहाँ काम पर जाती है?' किसके घर काम पर जाती...

बेटी ने बीच…

Continue

Added by Vijay Joshi on January 30, 2018 at 9:37pm — 5 Comments

लघुकथा वसन्तोत्सव

कड़कड़ाती ठंड में वसुधा की कँपकपि असहाय हो रही थी। सूरज को इसकी खबर हुई तो वह बहुत दूर अपनी वार्षिक यात्रा पर था। शीघ्र लौट कर सब ठीक करने का आश्वासन दिया। तो उसके लौटने की खबर से ही, ठंड ने अपना दायरा समेटना शुरू कर लिया।

वसुधा अपने नैसर्गिक रूप में पुनः खिलखिलाने लगी। वसुधा नव यौवना सी मुस्कान लिए साजन से मिलन के सतरंगी सपने सजाने लगी। हाथों में मेहँदी रंग रचने लगा।

पतझर से प्रकृति ने धरा पर रांगोली सजाई। तो वन उपवन में अमलताश ,पलाश, शिरीष , ने वसुधा के लिए वंदनवार सजाएं।…

Continue

Added by Vijay Joshi on January 30, 2018 at 9:00pm — 3 Comments

झूठी कसम तो आपकी खाई न जाएगी

221 2121 1221 212

सच्ची  जो बात है  वो छुपाई न जाएगी ।

झूठी कसम तो आप की खाई न जाएगी ।।

बस हादसे ही हादसे मिलते रहे मुझे ।

लिक्खी खुदा की बात मिटाई न जाएगी ।।

चेहरे हैं बेनकाब यहाँ कातिलों के अब।

लेकिन सजाये मौत सुनाई न जाएगी ।।

ज़ाहिद खुदा की ओर मुखातिब न कर मुझे ।

काफ़िर हूँ मैं नमाज़ पढ़ाई न जाएगी…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on January 30, 2018 at 6:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है

*[बहर-ए-खफ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून]*



*2122 1212 22*



बन के मेरा हबीब आता है।

जो भी दिल के करीब आता है।।



सबकी तकदीर में लिखा है सब,

कौन बनने गरीब आता है।।



खून मेरा उबलने है लगता,

रू-ब-रू जब रकीब आता है।।



कद्र भाई की है नहीं जिसको,

वही लेकर ज़रीब आता है।।



आजकल हो गया उसे है क्या,

बन के हरदम अजीब आता है।।



हौसले देखकर हमारे अब

पढ़ने खुतबा ख़तीब आता है।।



'दीप' अब ऐतबार है किसका

काम… Continue

Added by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on January 30, 2018 at 2:48pm — 11 Comments

घुटन – लघुकथा  -

घुटन – लघुकथा  -

"जुम्मन मियाँ, यह क्या हो गया हमारे शहर को। तिरंगा फ़हराने  को लेकर दंगा फ़साद और मोतें"?

"सुखराम जी, यह केवल हमारे शहर का मसला नहीं है। ऐसी खतरनाक़ हवायें तो सारे देश में चल रहीं हैं। कहीं झंडे को लेकर, कहीं गाय को लेकर और कहीं मंदिर के बहाने"।

"अरे मियाँ, आजकल तो बलात्कार की भी बाढ़ सी आगयी है। वह भी नाबालिग बच्चियों के साथ। पता नहीं, ईश्वर कहाँ सोया पड़ा है"?

"सुखराम भाई, सब कुछ ईश्वर के भरोसे थोड़े ही चलता है। हमारी सरकार और प्रशासन की भी तो कोई…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on January 30, 2018 at 2:15pm — 16 Comments

कि है जो कर्ज़ माटी का लहू देकर चुकाते हैं-सतविन्द्र कुमार राणा

गजल

1222 1222 1222 1222

बताना है सभी को हम हलाली का ही खाते हैं

कि है जो कर्ज़ माटी का लहू देकर चुकाते हैं



सियासत भी है अच्छी शय जिसे अक्सर बुरा माना

भले कुछ रहनुमा भी हैं जो सबके काम आते हैं



दिशा दक्षिण में सर्दी चल पड़ी मधुमास आते ही

चमन में गुल महक उट्ठे भ्रमर भी गुनगुनाते हैं



समझना है जरा मुश्किल भरोसा किस पे करलें हम

कभी अपने उठाते हैं कभी अपने गिराते हैं



सलामत किस तरह दुनिया रहेगी आज 'राणा' बोल

भुलाकर लोग…

Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 30, 2018 at 7:00am — 15 Comments

ग़ज़ल- मेरा घर भी कितना हवादार है।

बह्र - फऊलुन फऊलुन फऊलुन फउल

न छत है न कोई भी दीवार है।

मेरा घर भी कितना हवादार है।

हुनरमन्द होकर भी बेकार है।

अजीबोगरीब उसका किरदार है।

जिसे दूर तक सूझता ही नहीं,

वही इस कबीले का सरदार है।

भले ही जुदा धड़ से सर होगया,

अभी भी मेरे सर पे दश्तार है।

वो शेखी पे शेखी बघारे तो क्या,

सभी जानते हैं वो मुरदार है।

दवा का असर कोई होगा नहीं,

वो…

Continue

Added by Ram Awadh VIshwakarma on January 29, 2018 at 9:49pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
प्रीत रीति के खेल में ,ऐ साजन मैं हारी||  (मुक्तमणि छंद पर आधारित गीत 'राज')

पर्वत जैसे दिन कटें ,रातें लगती भारी|  

 प्रीत रीति के  खेल में ,ऐ साजन मैं हारी||

 

 अधरों पर  मुस्कान है,उर के भीतर ज्वाला|

 पीनी पड़ती सब्र की ,भीतर भीतर हाला||

बिस्तर पर जैसे बिछी,द्वी धारी कुल्हारी|

प्रीत रीति के खेल में ,ऐ साजन मैं हारी||

 

सरहद से आई नहीं, अबतक कोई पाती|  

जल जल आधी हो गई,इन नैनों की बाती||

चौखट पर बैठी रहूँ देखूँ बारी बारी|

प्रीत रीति के खेल में ,ऐ साजन मैं…

Continue

Added by rajesh kumari on January 29, 2018 at 8:51pm — 16 Comments

वर्तमान परिदृश्य पर पञ्चचामर छंद में एक रचना

जगण+रगण+जगण+रगण+जगण+गुरु

करे विचार आज क्यों समाज खण्ड खण्ड है

प्रदेश वेश धर्म जाति वर्ण क्यों प्रचण्ड है

दिखे न एकता कहीं सभी यहाँ कटे हुए

अबोध बाल वृद्ध या जवान हैं बटे हुए

अपूर्ण है स्वतन्त्रता सभी अपूर्ण ख़्वाब हैं

जिन्हें न लाज शर्म है वहीं बने नवाब हैं

अधर्म द्वेष की अपार त्योरियाँ चढ़ी यहाँ

कुकर्म और पाप बीच यारियां बढ़ी यहाँ

गरीब जोर जुल्म की वितान रात ठेलता

विषाद में पड़ा हुआ अनन्त दुःख…

Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 29, 2018 at 2:10pm — 5 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin posted a discussion

अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....

प्रिय सदस्य गण / प्रबंधन समिति के सदस्य गण / ओ बी ओ के सभी पाठक एवं शुभचिंतक गणसादर प्रणामआप सभी…See More
59 minutes ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"हाड़-मॉंस स्ट्रेट (लघुकथा) : "नेता जी ये क्या हमें बदबूदार सॅंकरी गलियों वाली बस्ती के दौरे…"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार आदरणीय मंच। इंतज़ार है साथियों की सार्थक रचनाओं का, सहभागिता का। हम भी हैं कोशिश में।"
yesterday
Admin posted a discussion

"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,सादर नमन।."ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।प्रस्तुत…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"इल्म गिरवी है अभी अपनी जहालत के लिए ढूँढ लो क़ौम नयी अब तो बग़ावत के लिए अब अगर नाक कटानी ही है हज़रत…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।"
Sunday
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"2122, 1122, 1122, 112/22 सर झुका देते हैं हम उसकी इबादत के लिए एक दिल चाहिए हमको तो मुहब्बत के…"
Apr 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सादर अभिवादन।"
Apr 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिएकर्बला   साथ   चले   कौन …"
Apr 25
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
" स्वागतम "
Apr 25
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 190 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा नौजवान शायर…See More
Apr 21
आशीष यादव posted a blog post

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत…See More
Apr 20

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service