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कि है जो कर्ज़ माटी का लहू देकर चुकाते हैं-सतविन्द्र कुमार राणा

गजल
1222 1222 1222 1222
बताना है सभी को हम हलाली का ही खाते हैं
कि है जो कर्ज़ माटी का लहू देकर चुकाते हैं

सियासत भी है अच्छी शय जिसे अक्सर बुरा माना
भले कुछ रहनुमा भी हैं जो सबके काम आते हैं

दिशा दक्षिण में सर्दी चल पड़ी मधुमास आते ही
चमन में गुल महक उट्ठे भ्रमर भी गुनगुनाते हैं

समझना है जरा मुश्किल भरोसा किस पे करलें हम
कभी अपने उठाते हैं कभी अपने गिराते हैं

सलामत किस तरह दुनिया रहेगी आज 'राणा' बोल
भुलाकर लोग यकजहती यहाँ नफ़रत बढ़ाते हैं

मौलिक /अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 3, 2018 at 8:10pm

आदरणीय लक्षमण धामी जी हौंसलाफ़ज़ाई के लिए सादर आभार

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 3, 2018 at 8:09pm

आदरणीय विजय निकोर सर सादर आभार उत्साहवर्धन  के लिए

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 3, 2018 at 8:08pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ भाई जी हौंसलाफ़ज़ाई के लिए तहेदिल शुक्रिया

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 3, 2018 at 8:08pm

आदरणीया रक्षिता सिंह जी हौंसलाफ़ज़ाई के लिए तहेदिल शुक्रिया

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 3, 2018 at 8:07pm

आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी,हौंसलाफ़ज़ाई के लिए सादर आभार

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 3, 2018 at 8:06pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी हौंसलाफ़ज़ाई के लिए तहेदिल शुक्रिया

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 3, 2018 at 8:05pm

आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी,सादर हार्दिक आभार,अनुमोदन एवं उत्साहवर्धन के लिए

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 2, 2018 at 8:35pm

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल कही आदरणीय..सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2018 at 3:52pm

आ. भाई सतविंद्र जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by vijay nikore on February 2, 2018 at 1:15pm

गज़ल अच्छी लगी। हार्दिक बधाई, आ० साविन्द्र जी।

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