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तुम्हारे इन्तज़ार में ........

तुम्हारे  इन्तज़ार में ........

देखो न !

कितने सितारे भर लिए हैं मैंने

इन आँखों के क्षितिजहीन आसमान में

तुम्हारे इन्तज़ार में ।

गिनती रहती हूँ इनको

बार- बार सौ बार

तुम्हारे इन्तज़ार में ।

तुम क्या जानो

घड़ी की नुकीली सुइयाँ

कितना दर्द देती हैं ।

सुइयों की बेपरवाह चाल

हर  उम्मीद को

बेरहमी से कुचल देती है।

अन्तस का ज्वार

तोड़ देता है

घुटन की हर प्राचीर को

और बहते- बहते ठहर जाता है

खारी…

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Added by Sushil Sarna on September 20, 2021 at 11:46am — 4 Comments

बेबसी.........

बेबसी ........

निशा के श्यामल कपोलों पर

साँसों ने अपना आधिपत्य जमा लिया ।

झींगुरों की लोरियों ने

अवसाद की अनुभूतियों को सुला दिया ।

स्मृतियाँ किसी खिलौने की भाँति

बेबसी के पलों को बहलाने का

प्रयास करने लगीं ।

आँखों की मुंडेरों पर 

बेबसी की व्यथा तरल हो चली ।

आँखों के बन्द करने से कब दिन ढला है ।

मुकद्दर का लिखा कब टला है ।

मृतक कब पुनर्जीवित हुआ है  ।

प्रतीक्षा की बेबसी के सभी उपचार

किसी रेत के महल से ढह गए…

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Added by Sushil Sarna on September 17, 2021 at 5:55pm — 4 Comments

समयानुकूल

बयालीस हैं जा चुके,बीत रहा है काल।

सुखदुख चलते साथ में,जीवन इक जंजाल।।

यारों की ये कामना,रहे सदा ही साथ।

यार सलामत हों सदा, हे नाथों के नाथ।।

उन्यासी उन्नीस सौ,माह सितंबर जान।

सोलहवीं तारीख थी, जब जन्मे 'कल्याण'।।

गुरु आभे ने लिख दई,यही जन्म तारीख।

गुरु न देते ज्ञान तो, फिरूं मांगता भीख।।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 17, 2021 at 12:01pm — No Comments

मुझे ना मार पाएगी (अतुकान्त)

खाली हो गई हूँ

इच्छाओं से, आशाओं से

व्यर्थ विचारों से

निरर्थक प्रवाहों से

अस्थिर लगावों से

अनर्गल खिंचावों से

आधुनिक चकाचौंध से

कौन जाने, मौत

कब दरवाजा खटखटा दे

साथ ले जाने को

किन्तु वह क्या साथ

ले जा पाएगी ?

वह तो पंच तत्वों में

तन को मिलाएगी

मुझे ना मार पाएगी

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on September 16, 2021 at 10:59pm — 6 Comments

ये मेरे बस की बात नहीं

तू खुद ही जुदा हो जा मुझसे अब यही बेहतर है

इश्क़ किया था तुझसे नफरत मुमकिन नहीं होगी

तेरे यादों  का आशियाँ बनाए बैठे  है हम कब से

प्यार की दुनिया को जलाने की हिम्मत नहीं होगी

 

कैसे करूँ नफरत तुझसे, बता ऐ ज़िंदगी

तुझे भूलने की हमसे कोशिश भी नहीं होगी

अब तू ही मेरी…

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Added by AMAN SINHA on September 16, 2021 at 10:30am — No Comments

हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221-1221-1221-122

हालत जो तेरी देखी है हैरान हूँ मैं भी

कोने में पड़ा घर के परेशान हूँ मैं भी (1)

गर आप सरल होंगे तो आसान हूँ मैं भी

ज़ालिम हैं अगर आप तो हैवान हूँ मैं भी (2)

ये सूनी दिवारें ही मुझे घूर रहीं हैं

खाली है मकाँ भी मिरा सुनसान हूँ मैं भी (3)

गर मिल भी गए हम भी तो आबाद न होंगे

उजड़ा है अगर तू भी तो वीरान हूँ मैं भी (4)

आएगा किसी दिन वो लगाएगा ठिकाने

कमरे में पड़ा फालतू सामान हूँ मैं भी…

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Added by सालिक गणवीर on September 16, 2021 at 8:30am — 5 Comments

ओजोन दिवस के दोहे

परत घटे ओजोन की, बढ़े धरा का ताप

काटे हम ने पेड़ जो, बने वही अभिशाप।१।

*

छन्नी सा  ओजोन  ही,  छान  रही  है धूप

घातक किरणें रोक जो, करती सुंदर रूप।२।

*

गोला सूरज आग का, विकिरण से भरपूर

पराबैंगनी  ज्वाल  को, ओजोन  रखे  दूर।३।

*

जीवन है ओजोन से, करो न इस को नष्ट

बिन इसके धरती सहित होगा सबको कष्ट।४।

*

क्लोरोफ्लोरोकार्बन,  है जिन की सन्तान

एसी फ्रिज ये उर्वरक, दें उसको नुकसान।५।

*

कर इनका उपयोग कम, करना अच्छा काम…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 15, 2021 at 5:30pm — 4 Comments

उम्मीद .......

उम्मीद .......

मैं जानती हूँ

बन्द साँकल में

कोई आवाज नहीं होती

मगर होती हैं उसमें

उम्मीद की सीढ़ियों पर सोयी

अनगिनत प्यासी उम्मीदें

किसी के लौट आने की

मैं ये भी जानती हूँ

कि उम्मीद के दामन में

दर्द के सैलाब होते हैं

कुछ हसीन ख़्वाब होते हैं

साँझ के साथ

उम्मीद भी जवान होती है

शब

इन्तज़ार के पैरहन में रोती है

जानती हूँ

उम्मीद झूठी होती है

मगर दिल की बसती में

उम्मीद…

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Added by Sushil Sarna on September 15, 2021 at 4:00pm — 6 Comments

झूठी शख़्सियत

राह में मैं एक दफा, खुद से हीं टकरा गया

अक्स देखा खुद का तो, होश मुझको आ गया

दूसरो को दूँ नसीहत, काबिलियत मुझमे नहीं

आँख औरों को दिखाऊं, हैसियत इतनी नहीं

 

आईने में खुद का चेहरा, रोज ही तकता हूँ मैं

मैं भला हूँ झूठ ये भी, खुदसे ही कहता हूँ मैं

अपने फैलाये भरम में, हर घडी रहता हूँ मैं

सोच की मीनारों पर, बस पूल बांधता हूँ मैं

 

बातों में मेरी सच की, दूर तक झलक नहीं

इस जमी मिलता जैसे, दूर तक फलक नहीं

क्या गलत है…

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Added by AMAN SINHA on September 15, 2021 at 12:00pm — 2 Comments


प्रधान संपादक
कविता: ज़माने में बनी है हिंद की पहचान हिंदी से

अगर है एक तो है एक हिंदुस्तान हिंदी सेI 

ज़माने में बनी है हिंद की पहचान हिंदी सेI

.

ये दुनिया एक ही कुनबा सदा इसने सिखाया है,

मोहब्बत का सदाक़त का मिला वरदान हिंदी सेI 

.

जो तुलसी जायसी के लाल, अंग्रेजी के अनुयायीI 

उन्हें तुम दूर ही रखना मेरे भगवान हिंदी सेI 

.

तुम हिंदी काव्य को रसहीन होने से बचा लेना,  

नहीं तो फिर न निकलेगा कोई रसखान हिंदी सेI 

ये उर्दू फ़ारसी अब तक दिवंगत हो गई होतीं, 

मिला भारत में दोनों को…

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Added by योगराज प्रभाकर on September 14, 2021 at 11:00am — 10 Comments

हाल-ए-दिल

गा रहा हूँ मैं आज, अपने ग़म सभी भुलाने को

हौसला शराब का है, हाल-ए-दिल सुनाने को

राज दिल में लाखो अपने, आज सबको खोलना है

लोग रुस्वा हो भले ही, एक- एक कर बोलना है

मर गए तो क्या मरेंगे, जी कर भी करना है क्या?

कुछ ना उससे राबता है, अब भला डरना है क्या?

आज अपनी बेहयायी, सबको…

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Added by AMAN SINHA on September 14, 2021 at 10:12am — No Comments

विश्व पटल पर हिन्दी का परचम लहराया

संप्रभू भाषा हिन्दी भारत की मिट्टी से उपजी है जो किसी की मोहताज नहीं है। इसकी अपनी प्राणवायु, प्राणशक्ति व उदारभाव होने के कारण ये शब्दसंपदा का अनूठा उपहार हैं। 130 करोड़ की आबादी वाले भारत देश में करीब 44% से ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली राष्ट्र भाषा हिन्दी को दुनिया में बोलने वालों का प्रतिशत 18.5% हैं। दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली हिन्दी भाषा विश्व की पांच भाषाओं में से एक है।

भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने 2006 में दस जनवरी को विश्व हिन्दी…

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Added by babitagupta on September 14, 2021 at 7:30am — 3 Comments

निज भाषा को जग कहे (दोहा गजल) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

निज भाषा को जग कहे, जीवन की पहचान

मिले नहीं इसके बिना, जन जन को सम्मान।१।

*

बड़ा सरल पढ़ना जिसे, लिखना भी आसान

पुरखों से हम को मिला, हिन्दी का वरदान।२।

*

हिन्दी के प्रासाद का, वैज्ञानिक आधार

तभी बनी है आज ये, भाषा एक महान।३।

*

जैसे  धागा  प्रेम  का, बाँध  रखे  परिवार

उत्तर से दक्षिण तलक, एका की पहचान।४।

*

नियमों में बँधकर रहे, हिन्दी का हर रूप

भाषाओं में हो गयी, इस से यह विज्ञान।५।

*

गूँजे चाहे विश्व  में, हिन्दी  कितना…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2021 at 11:08pm — 3 Comments

उस रात ....

उस रात .......

उस रात

वो बल्ब की पीली रोशनी

देर तक काँपती रही

जब तुम मेरी आँखों के दामन में

मेरे ख्वाबों को रेज़ा-रेज़ा करके

चले गए

और मैं बतियाती रही

तन्हा पीली रोशनी से

देर तक

उस रात

मुझसे मिलने फिर मेरी तन्हाई आई थी

मेरी आरज़ू की हर सलवट पर

तेरी बेवफाई मुस्कुराई थी

और मैं

अन्धेरी परतों में

बीते लम्हों को बीनती रही

देर तक

उस रात

तुम उल्फ़त के दीवान का

पहला अहसास…

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Added by Sushil Sarna on September 13, 2021 at 3:42pm — 6 Comments

एक दोहा गज़ल - प्रीत - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

एक दोहा गज़ल - प्रीत -(प्रथम प्रयास )

छूट गयी जब  से  यहाँ, सहज  प्रेम की रीत

आती तन की वासना, बनकर मन का मीत।१।

*

चलते फिरते तन करे, जब  तन से मनुहार

मन को तब झूठी लगे, मन की सच्ची प्रीत।२।

*

एक समय जब स्नेह में, जाते थे जग हार

आज सुवासित वासना, चाहे केवल जीत।३।

*

भरे सदा ही  प्रीत ने, ताजे तन मन घाव

प्रेम रहित जो हो गये, खोले घाव अतीत।४।

*

मण्डी जब  से  देह को, कर  बैठे हैं लोग

मन से मन के मध्य में, आ पसरी है…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2021 at 11:25am — 6 Comments

ग़ज़ल-इश्क़ महब्बत धोखा था

22 22 22 2



1

आँख खुली तो जाना था

इश्क़ मुहब्बत धोका था

2

उधड़ी सीवन रिश्तों की

चुपके से वो सिलता था

3…

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Added by Rachna Bhatia on September 13, 2021 at 11:00am — 3 Comments

नास्तिक

सर झुका दूँ तेरे दर पर, ये मुझे करना नहीं

जान दे दूं हंस के लेकिन डर के है मरना नहीं

हाँथ जोडू पैर पकड़ूँ न तेरी मिन्नत करूँ

अपने ख़ातिर तेरे आगे डर के न तौबा करूँ

तू ने ही बनाया सबको जो ये चाहे सोच ले

तेरे ही लिखे पे फिर क्यों तेरा ही ना बस चले

तू अगर अगर है जन्मदाता सबका पालन हार है

जो दबे हैं उनपर दुःख का क्यों तोड़ता पहाड़…

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Added by AMAN SINHA on September 13, 2021 at 10:07am — 4 Comments

ग़ज़ल (हुस्न तो  मिट जाएगा...)

2122 -  2122 -  2122 - 212

 

हुस्न तो  मिट जाएगा  फिर भी अदा रह जाएगी 

ढल  चलेगी  ये  जवानी  पर  वफ़ा  रह  जाएगी 

साथ मेरे  तुम हो जब  तक प्यार की  सौग़ात है 

बिन तुम्हारे  ज़िन्दगी ये  इक सज़ा  रह  जाएगी 

जब तलक  माँ-बाप राज़ी  बस दुआ मक़्बूल है 

दिल दुखा तो फ़र्श पर  ही  हर दुआ रह जाएगी 

ईद का दिन है  तेरी  रहमत भी  है अब जोश में 

मेरे जैसों की भी झोली  ख़ाली क्या रह जाएगी

कर भलाई  के भी…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 12, 2021 at 10:38pm — 4 Comments

अंतिम इच्छा (लघुकथा)



एक शव को गिद्ध कौओं द्वारा नोचते खसोटते देख करीब पड़े एक बूढ़े बीमार कुत्ते से न रहा गया और उसने उनसे कहा ,"अरे!अरे! इतनी बेदर्दी से इसको क्यों नोच-खसोट रहे हो। थोड़ा आराम से खाओ न । अब यह कौन-सा उठने वाला है?"

गिद्ध ने अपना आहार खाते हुए कहा,"आओ! तुम भी चखो,इसका माँस बहुत ही स्वादिष्ट है...।"

कौओं के समूह से एक कौए ने कहा," अहा! मैंने भी ऐसा स्वदिष्ट माँस पहले कभी नहीं खाया...।"

बूढ़े कुत्ते ने अपने अगल-बगल देखा, उसको अपनी बिरादरी का कोई भी सदस्य कहीं नज़र नहीं आया। उसका शरीर…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 12, 2021 at 3:28pm — 3 Comments

नज़्म (मेरी माँ)

2122 - 2122 



तू  शफ़ीक़-ओ-मह्रबाँ  है

तुझसा माँ  कोई कहाँ  है



तेरे आँचल  का  ये साया 

मुझको जन्नत का गुमाँ है



तेरा  दामन  मेरी  दुनिया 

और क़दम सारा जहाँ है



रंज हो या  हो ख़ुशी बस

तू सदा  ही ख़ुश-बयाँ  है



बिन  तेरे  ये  ज़िन्दगी तो

ख़ाक है या फिर धुआँ है    



तेरे  दामन  के ये  रौज़न    

माँ  ये  मेरी कहकशाँ …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 12, 2021 at 2:30pm — 4 Comments

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