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कविता: ज़माने में बनी है हिंद की पहचान हिंदी से

अगर है एक तो है एक हिंदुस्तान हिंदी सेI 
ज़माने में बनी है हिंद की पहचान हिंदी सेI

.
ये दुनिया एक ही कुनबा सदा इसने सिखाया है,
मोहब्बत का सदाक़त का मिला वरदान हिंदी सेI 

.

जो तुलसी जायसी के लाल, अंग्रेजी के अनुयायीI 
उन्हें तुम दूर ही रखना मेरे भगवान हिंदी सेI 

.

तुम हिंदी काव्य को रसहीन होने से बचा लेना,  
नहीं तो फिर न निकलेगा कोई रसखान हिंदी सेI 

ये उर्दू फ़ारसी अब तक दिवंगत हो गई होतीं, 
मिला भारत में दोनों को ही जीवनदान हिंदी सेI

.

मेरे दाता वो मेरी जिंदगी का आखरी दिन हो, 

जरा भी दूर हो जिस पल मेरी संतान हिंदी सेI 

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by AMAN SINHA on September 15, 2021 at 11:51am

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी, 

लाज़वाब, रसदार, मज़ेदार प्रस्तुति। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 14, 2021 at 6:13pm

मुहतरम योगराज प्रभाकर जी आदाब, हिन्दी दिवस के अवसर पर शानदार प्रस्तुति के लिए दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ और इस रचना को ओ बी ओ के फ़ीचर ब्लॉग में शामिल होने की कामना करता हूँ।  सादर।

Comment by Sushil Sarna on September 14, 2021 at 5:55pm
वाह आदरणीय योगराज प्रभाकर जी हिन्दी दिवस पर बहुत सुंदर और सार्थक प्रस्तुति सर । हार्दिक बधाई सर
Comment by Samar kabeer on September 14, 2021 at 3:47pm

//रचना के आगे 'कविता' शब्द जोड़ दिया है//

इसे कहते हैं उस्तादी:-))) 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 14, 2021 at 3:45pm

रचना के आगे 'कविता' शब्द जोड़ दिया है आ० समर कबीर जी.

Comment by Samar kabeer on September 14, 2021 at 3:34pm

// मैं उस मिसरे की बह्र जरूर देखता अगर मैंने यह रचना ग़ज़ल लिखकर पोस्ट की होती.//

फिर ये रचना कौन सी विधा में है मुहतरम? इंगित मिसरे को छोड़कर सभी मिसरे 1222 1222 1222 1222 के वज़्न पर पूरे उतरते हैं ।


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 14, 2021 at 3:00pm

हार्दिक आभार आ० लक्ष्मण धामी मुसाफिर भाई जी. 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 14, 2021 at 2:59pm

आपकी इस उस्तादाना राय के लिए तह-ए-दिल से ममनून हूँ आ० समर कबीर साहिब. मैं उस मिसरे की बह्र जरूर देखता अगर मैंने यह रचना ग़ज़ल लिखकर पोस्ट की होती.  

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 14, 2021 at 12:13pm

आ. भाई योगराज जी, सादर अभिवादन। हिन्दी दिवस पर बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on September 14, 2021 at 11:57am

जनाब योगराज प्रभाकर साहिब आदाब, हिन्दी दिवस पर अपने जज़्बात की अक्कासी करती अच्छी ग़ज़ल कही आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'तुम हिंदी काव्य को रसहीन होने से बचा लेना'

इस मिसरे की बह्र चेक कर लें ।

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