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तरही ग़ज़ल-2 (आ० समर कबीर जी को समर्पित)

1222 1222 122
.
हमारा धर्म दहशत है? नहीं तो!
तो पूरी क़ौम सहमत है? नहीं तो!
.
तेरे हाथों में ख़ंजर है, मेरे भी
ये क्या अच्छी अलामत है? नही तो

फ़क़त मंदिर ओ मस्जिद के मसौदे,
यही क़ौमी क़यादत है? नही तो!  

अज़ीमुश्शां मक़ाबिर के जो खालिक,
कहीं उनकी भी तुर्बत है? नही तो!

जहाँ पत्थर की हर देवी सुरक्षित,
वहाँ बेटी सलामत है? नही तो!

मेरी झोली ख़सारों से भरी है    
ये मामूली सी ने'मत है? नहीं तो!
.
जड़ों से दूर जाना, कट के रहना 
तरक़्क़ी की ज़मानत है? नहो तो

हज़ारों शे'र यूँ तो कह चुका हूँ 
किसी में भी नफ़ासत है? नहीं तो!
.

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 18, 2018 at 5:30pm

आदरणीय योगराज प्रभार जी, सादर नमस्कार आपको, वाह लाजबाब ग़ज़ल आनंद आ गया 

Comment by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on September 18, 2018 at 5:22pm

आदरणीय प्रभाकर जी....बहुत ही बढ़िया  ग़ज़ल के लिए तहेदिल से मुबारकबाद .....

Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 11:56am

मेरी झोली ख़सारों से भरी है, ये मामूली सी ने'मत है? नहीं तो! ...वाह! बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है आदरणीय योगराज सर. इस उम्दा प्रस्तुति पर दिल से ढेरों बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 8, 2017 at 8:12pm

आदरनीय योगराज भाई , बेहतरीन गज़ल कही है , आपने .. शे र दर शेर बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 8, 2017 at 11:53am

आ. भाई योगराज जी रचना और रचनाकार दोनों को कोटि कोटि नमन ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 8, 2017 at 10:12am

आ. योगराज सर,
तो सुरक्शत लिखा जाय :p 
सादर 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 8, 2017 at 10:01am

भाई निलेश नूर जी, पंजाबी में व्यंजन "क्ष" नहीं होता इसलिए मंदिर/मंदर की तर्ज़ पर सुरक्षित को सुरक्षत पढने या बोलने का सवाल ही पैदा नहीं होताI  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 8, 2017 at 9:58am

आ. योगराज सर...
काश सभी मित्र जितना अपने शब्दों को लेकर जागरूक हैं, उतना ही अन्य भाषा के शब्दों को लेकर भी    हो जायें.
वैसे पंजाबी लहजे में सुरक्षित को सुरक्षत पढना आम है ..जैसे मन्दिर को मंदर ...( ये एक सम्भावित कुतर्क हो सकता है :-)))) 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 8, 2017 at 9:44am

आ० भाई अनुराग वशिष्ठ जी, "सुरक्षित" शब्द  गलती से नहीं लिखा थाI दरअसल सलामत शब्द से वो फीलिंग नहीं आ रही थी, बहरहाल भावुकता में काफियाबंदी गलत हो गईI अब सुरक्षित की जगह सलामत कर दिया है, रचना को समय देने के लिए दिल से आपका शुकरगुज़ार हूँI        


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 8, 2017 at 9:41am

आ० निलेश नूर जी, गलती सुधार ली गई हैI  

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