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कब तक  - लघुकथा –

कब तक  - लघुकथा –

"अम्मा, ये सारी टोका टोकी, रोकथाम केवल मेरे लिये ही क्यों है?"

"यह सब तेरी भलाई के लिये ही है बिटिया।"

"क्या अम्मा?, मेरी भलाई के अलावा कभी भैया के बारे में भी सोच लिया करो।"

"अरे उसका क्या सोचना? मर्द मानुष है, जैसा भी है सब चल जायेगा।"

"इसलिये उसके किसी काम में रोकटोक नहीं।रात को बारह बजे आये तो भी चलेगा।और मैं दिन में भी अकेली कहीं नहीं जा सकती।"

“तू समझती क्यों नहीं मेरी बच्ची?"

"क्या समझूं अम्मा? भैया बारहवीं में तीन साल…

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Added by TEJ VEER SINGH on November 28, 2020 at 9:52am — 8 Comments

आइना

आइना हूं मैं तो बस ज़िन्दगी का,कहते हो तुम बुढ़ापा जिसे

जिन्दगी के सफ़र में जो भी खोया या पाया,पलटकर देखो नज़र भर उसे 

ज़िन्दगी से सदा तूने सदा ये ही शिकवे किये,ए ज़िंदगी तूने सदा दुख है दिये 

सच ये नहीं छुपेगा आइने से बिखरी थीं ख़ुशियाँ,तेरी ज़िन्दगी में 

ग़मों को सदा तूने गले से लगाया,ख़ुशियों के पल क्यों ना याद किये 

आइने में देखोगे जो ख़ुशियों के वो पल,ग़मों में भी फिर जल उठेंगे दिये

जीवन जीने की कला आप कहते हैं जिसे

उम्र का ये दौर ही है…

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Added by Veena Gupta on November 28, 2020 at 9:09am — 3 Comments

रखिहै सबका तुष्ट

जब तब अजिया कहत रहिं

दूध पूत हैं एक

जैस पियावहु दूध तस

बढ़िहै ज्ञान विवेक

गइयन केरी सेवा कयि

करिहौ जौ संतुष्ट

पइहैं पोषण पूर जब

हुइहैं तब वह पुष्ट

अमृत  जैसन दूध बनि

निकसी बहुत पवित्र

रोग दोष का नास करि

रखिहै सबका तुष्ट

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on November 27, 2020 at 7:22pm — 2 Comments

लघुकथा- खाली गमला

मिश्रा जी यूं तो बैंक से रिटायर हुए थे, लेकिन रिटायरमेंट के बाद उन्होंने पूरी तरह से अपने जीवन को वृक्षारोपण के लिए समर्पित कर दिया, इसलिए लोगों के लिए उनका परिचय था " वही जो पेड़ लगाते हैं"। घर के पास स्थित राधा कृष्ण मंदिर में भी उन्होंने कई पेड़ लगाए थे, जब तक उनका लगाया पौधा पूरी तरह से बड़ा न हो जाता, तब तक उसकी देखभाल के लिए जाया करते थे। पार्कों में, रोड साइड पर, अपने स्कूटर पर पानी के जरीकेन रखकर ले जाते थे और पौधों में पानी डालते थे, बाद में पैदल ही जाने लगे। कभी-कभी आसपास के…

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Added by Dr Vandana Misra on November 27, 2020 at 12:00pm — 7 Comments

मार ही दें न फिर ये लोग मुझे.....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 1212 22/112



जाँ से प्यारे हैं सारे लोग मुझे

मार देंगे मगर ये लोग मुझे(1)

मुझको पानी से प्यार है लेकिन

एक दिन फूँक देंगे लोग मुझे (2)

मैं उन्हें अपना मानता हूँ मगर 

ग़ैर समझे हैं मेरे लोग मुझे (3)

उम्र भर शह्र में रहा फिर भी

जानते ही नहीं ये लोग मुझे (4)

बाद मुद्दत के अपने गाँव गया

सारे पहचानतेे थे लोग मुझे (5)

उनकी बातों का क्यों बुरा मानूँ

लग रहे हैं भले से लोग…

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Added by सालिक गणवीर on November 26, 2020 at 4:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122

बहते दरिया की रवानी लिख रहे हैं

सब यहाँ अपनी कहानी लिख रहे हैं



आंसुओं से बह रहा मेरे लहू औ'

आप हैं जो इनको पानी लिख रहे हैं



नींद आंखों से हुई है आज मिन्हा

चोट हम कोई पुरानी लिख रहे हैं



कह नहीं पाते थे तुमसे जो कभी वो

बात गज़लों की जुबानी लिख रहे हैं



तू अलग होकर भी मुझसे ही जुड़ी है

अपने किस्से को लाफ़ानी लिख रहे हैं



जो चलाये थे कभी बरसात में हम

कश्ती औ' बारिश का पानी लिख रहे हैं



जो… Continue

Added by सचिन कुमार on November 25, 2020 at 9:32pm — 9 Comments

ग़ज़ल

2122 -1122-1122-22

याद तेरी को ऐसे दिल में लगा रक्खा है ।

ढूंढ  पाये  तेरा तो  जेब    पता रक्खा है ।1

 

रात  सो जाये हमें नींद कहाँ आती अब ,

साथ रातों यही  रिश्ता जो  बना रक्खा है ।2

 

क्यूँ बता दी कोई अपनी  ये कहानी उसको ,

बन  रहे   फूल  जो क्यूँ  शूल बता  रक्खा है।3

 

कल मिरा आज बिगाना वो  किसी कल  होगा

किस लिए यार  यूँ ही खुद को जला रक्खा है ।4

 

था कभी खोजा जिसे ऊँचे पहाड़ों जा कर ,

नेक बंदे…

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Added by मोहन बेगोवाल on November 24, 2020 at 4:30pm — 1 Comment

करोना -योद्धाओं के नाम

करोना -योद्धा  सखी    के नाम 
 
 सुनो ! अपना ध्यान रखना 
हरगिज़ हरगिज़ न डिगना 
हौसलों को हिम्मत बँधाते रहना 
धैर्य  ध्वजा   है  फहराते  रहना 
हमेशा से ही  सिपाही  हो तुम 
विजय सी ही वाहवाही  हो तुम 
अब के जंग निज अपने संग है 
वैरी का बिलकुल अजीब रंग है 
कितने ही समर तुमने हैं जीते 
कितने ही वार किए हैं…
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Added by amita tiwari on November 24, 2020 at 1:30am — 3 Comments

ग़ज़ल

212 212 212 2

राज़ आशिक़ के पलने लगे हैं

फूल लुक-छिप के छलने लगे है

उनके आने से जलने लगे हैं

मुँह-लगे दिल तो मलने लगे हैं

कोई आता है खिड़की पे उसकी

रात में गुल वो खिलने लगे हैं

चल रही है मुआफिक हवा भी

बागवाँ फूल फलने लगे हैं

आज पूनम दुखी है बहुत सुन !

आँख में ख्वाब खलने लगे हैं

रंग सावन ग़जल आ घुले फिर

अब तो चेतन बदलने लगे हैं

मौलिक एवं…

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Added by Chetan Prakash on November 23, 2020 at 6:30pm — 2 Comments

जिंदगी का सफर

हमारा आज और कल एक सिक्के के दो पहलू हैं 

सुनहरे कल के लिए आज की बलि मत चढ़ा दो 

माना की आज ज़िंदगी कठिन है पर जीना जरूरी है 

उसके लिए अपने  भविष्य को बचाना है 

तिनके का सहारा लेकर हमें जाना है उस पार ।  

हिम्मत न हार तूफान से टकरा 

अपने कल के लिए कठिन संघर्ष कर 

आया भयंकर तूफान खतरे में जग जहान है 

आशा की पतवार है किश्ती नदी मझधार है 

हिम्मत न हार हमें जाना है उस पार । 

मंजिल  पर दूर तक कोई नजर नहीं आता 

छोटा है तो…

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Added by Ram Ashery on November 21, 2020 at 3:00pm — 2 Comments

मुफलिसी में ही जिसका गुजारा हुआ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२//१२२१/२२१२



मुफलिसी में ही जिसका गुजारा हुआ

कौन शासन जो  उस का सहारा हुआ।१।

**

उसको जूठन का मतलब न समझाइए

जिस ने पहना हो  सब का उतारा हुआ।२।

**

चाद किस्मत में उस के नहीं था मगर

आस भर को भी  कोई  न तारा हुआ।३।

**

जिस ने जीवन जिया  है सहज कष्ट में

आप कहते  हैं  उस को  ही  हारा हुआ।४।

**

है …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 21, 2020 at 6:22am — 8 Comments

दस्तक :

दस्तक :

वक़्त बुरा हो तो

तो पैमानें भी मुकर जाते हैं

मय हलक से न उतरे तो

सैंकड़ों गम

उभर आते हैं

फ़िज़ूल है

होश का फ़लसफ़ा

समझाना हमको

उनके दिए ज़ख्म ही

हमें यहां तक ले आते हैं

वो क्या जानें

कितने बेरहम होते हैं

यादों के खंज़र

हर नफ़स उल्फ़त की

ज़ख़्मी कर जाते हैं

तिश्नगी बढ़ती गई

उनको भुलाने के आरज़ू में

क्या करें

इन बेवफ़ा क़दमों का

लाख रोका

फिर भी

ये

उनके दर तक ले जाते हैं

उनकी…

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Added by Sushil Sarna on November 20, 2020 at 8:43pm — 2 Comments

मुझे भी पढ़ना है - लघुकथा –

मुझे भी पढ़ना है - लघुकथा –

"ऐ सुमन, मुन्ना नहीं दिखाई दे रहा?"

"काहे परेशान हो? अभी आ जायेगा।"

"अरे तू समझती काहे नहीं है। यह गाँव देहात नहीं है।शहर का मामला है। एक मिनट में बच्चा गायब हो जाता है।"

"हम सब जानते हैं इसलिये उसकी दादी माँ भी साथ गयी हैं।"

"अरे मगर गये कहाँ हैं वे दोनों?"

"और कहाँ जायेंगे? दो साल से स्कूल जाने का सपना मन में पाल रखा है। स्कूल की प्रार्थना की घंटी सुनते ही दौड़ जाता है।"

"अब क्या करें सुमन? घर की माली हालत तो तुम…

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Added by TEJ VEER SINGH on November 20, 2020 at 6:22pm — 6 Comments

ग़ज़ल

2122-1212-22

1

 आदमी कब ख़ुदा से डरता है

अपनी हर बात से मुकरता है

2

जब सर-ए-शाम ग़म सँवरता है

आइना टूटकर बिखरता है

3

आज का काम आज ख़त्म करें

वक़्त किसके लिए ठहरता है

4

ताबिश-ए-ख़्वाब के लिए दिलबर

रंग मेरे लहू से भरता…

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Added by Rachna Bhatia on November 20, 2020 at 12:00pm — 4 Comments

शून्य (ज़ीरो)

पूर्णता का जो है प्रतीक ,वह तो बस एक शून्य है 

शून्य है जीवन का सत्य ,शून्य ही सम्पूर्ण है 

जिस बिंदु से आरम्भ होता ,होता वहीं वह पूर्ण है 

आरम्भ जीवन का शून्य से और अंत भी बस शून्य है 

शून्य में जोड़ दो ,चाहे जितने शून्य तुम 

या निकालो शून्य में से चाहे जितने शून्य तुम 

शून्य फिर भी शून्य…

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Added by Veena Gupta on November 20, 2020 at 3:20am — 6 Comments

ग़ज़ल-तुमसे ग़ज़ल ने कुछ नहीं बोला?

2122       2122        2122        2

चुप रहीं आँखें सजल ने कुछ नहीं  बोला

इसलिए  मनवा विकल ने कुछ नहीं बोला

भाव जितने हैं सभी को लिख दिया हमदम

क्या कहूँ! तुमसे ग़ज़ल ने कुछ नहीं बोला?

जिस  किनारे  बैठ  के  पहरों  तुम्हें  सोचूँ

उस जलाशय के कमल ने कुछ नहीं बोला?

एक  पत्थर  झील में  फेंका कि जुम्बिश हो

झील के  खामोश जल ने कुछ नहीं  बोला

साथ 'ब्रज' के रात भर पल पल रहे जलते

जुगनुओं  के नेक  दल ने…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 19, 2020 at 9:00pm — 6 Comments

सिकुडते हुये सद्भाव

छंदमुक्त काव्य 

 

जिंदगी से जिंदगी लड़ने लगी है

आदमी को आदमी की शक्ल

अब क्यूँ इस तरह अखरने लगी है //

आँख में आँख का तिनका…

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Added by DR ARUN KUMAR SHASTRI on November 19, 2020 at 1:00pm — 1 Comment

बड़ी नज़ाकत से हमने .....

बड़ी नज़ाकत से हमने .....

बड़ी नज़ाकत से हमने
यादों को दिल में पाला है
अपने -अपने दर्दों को
मुस्कराहटों में ढाला है
मुद्दा ये नहीं कि
चराग़ बेवफ़ाई का
जलाया किसने
सच तो ये है अश्क चश्म में
दोनों ने संभाला है
ये हाला है उल्फत की
उल्फत का ये प्याला है
पाक मोहब्बत का दोनों के
दिल में पाक शिवाला है
बड़ी नज़ाकत से हमने
यादों को दिल में पाला है

सुशील सरना
मौलिक एवं अपक्राशित

Added by Sushil Sarna on November 18, 2020 at 6:07pm — 2 Comments

मौसम त्योहार का ओर तुम

हठ धर्मिता तुम्हारी तुम ही धरो 

मुझ से तो तुम बस सहयोग ही करो 

मानव जनम मिला है तत्सम आचरण करो  

हठ धर्मिता तुम्हारी तुम ही धरो 

प्रेरणा न बन सको तो कोई फरक नही

लेकिन किसी सन्मार्ग में कंटक तो न बनो

हठ धर्मिता तुम्हारी तुम ही धरो 

मै आज हूँ बस आज और अभी

गुजरे हुये पलो  से मेरी तुलना तो न करो 

भविष्य से मेरा कोई सम्बन्ध है कहा 

वर्तमान को ही मैंने जीवन कहा 

हठ धर्मिता तुम्हारी तुम ही धरो 

मुझ से तो तुम बस सहयोग…

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Added by DR ARUN KUMAR SHASTRI on November 14, 2020 at 6:00pm — 6 Comments

दीपावली - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल )

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



मेटती  आयी  है  घर  की  तीरगी  दीपावली

सब के मन में भी करे अब रोशनी दीपावली।१।

**

रीत कितने ही  युगों  से  चल रही हो ये भले

हर बरस लगती है सब को पर नई दीपावली।२।

**

तोड़ आओ ये नगर का जाल कहती साथियों

गाँव  की  नीची  मुँडेरों  पर  जली  दीपावली।३।

**

दीप सब ये प्रेम और' विश्वास के हैं इसलिए

आँख चुँधियाती नहीं  साथी  घनी दीपावली।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 14, 2020 at 8:57am — 8 Comments

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