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दीपावली

दीपोत्सव हम मना रहे

जगमग जग ये हो सारा

ज्ञान का ऐसा दीप जलायें

अज्ञान दूर हो जग से सारा

सौहार्द प्रेम का हो प्रसार

वसुधैव कुटुम्बकम का सच हो नारा

दीपक ऐसा एक जलायें

फैले प्रेम का उजियारा

(मौलिक/अप्रकाशित)

Added by Veena Gupta on November 14, 2020 at 2:00am — 4 Comments

फिर से मुझको न वो हरा जाए....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 1212 22/112

फिर से मुझको न वो हरा जाए

इससे पहले ही कुछ किया जाए (1)

जब वो आँखों से कुछ नहीं कहता

कान में कुछ तो बुदबुदा जाए (2)

बन गया है वो मील का पत्थर

अब उसे ठीक से पढ़ा जाए (3)

यार अब बन गया अदू मेरा

अब भले को बुरा कहा जाए (4)

सीधे रस्ते पे क्या चलेगा वो

जिसका ईमान डगमगा जाए (5)

है जबाँ यार ये महब्बत की

उससे उर्दू में कुछ कहा जाए…

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Added by सालिक गणवीर on November 13, 2020 at 9:30am — 7 Comments

मुंगेरीलाल के वैक्सीन सपने (कहानी) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी :

मुंगेरीलाल और कोरोनाकाल... सबके बहुत बुरे हालचाल! लॉकडाउन पर लॉकडाउन... घर में क़ैद सब जॉब डाउन, रोज़गार डाउन! बेचारे मुंगेरीलाल ने अपनी कम्पनी की नौकरी छोड़कर बड़ी मुसीबत कर ली थी सात साल पहले। उनका काम और रुझान दिलचस्प और संतोषजनक था, फ़िर भी सपनों और दिवास्वप्नों में खोये रहने और बड़ी-बड़ी बातें फैंकने के कारण दफ़्तर, घर, बाज़ार और ससुराल सभी जगह लोग उनका मज़ाक उड़ा-उड़ा कर मौज-मस्ती कर लिया करते थे। उन सबकी बातों को मुंगेरीलाल कभी हल्के में, तो कभी बहुत गंभीरता से ले लेते थे।

एक बार…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 12, 2020 at 8:30am — 2 Comments

गार्गी की बार्बी (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

भगवान देता है, तो छप्पर फाड़ कर देता है। लेता है, तो एक झटके में ले लेता है। देकर ले लेता है, तो हँसाने के बाद रुला-रुला कर। राजन, रंजीता और गंगा का ज़िन्दगीनामा भी यही साबित करता रहा; गार्गी और गार्गी की बार्बी का भी! बार्बी के साथ कब, क्या, कैसे और क्यूँ होगा; बार्बी ने कभी सोचा न था। सोचती भी कैसे? उसकी सोच तो उसकी मम्मी पर निर्भर थी। उसकी मम्मी ने भी तो न सोचा था वह सब। यही हाल गार्गी का था। गार्गी के साथ कब, क्या, कैसे और क्यूँ होगा; गार्गी ने कभी सोचा न था। सोचती भी कैसे? उसकी सोच तो…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 10, 2020 at 8:30am — 4 Comments

तरही ग़ज़ल

दोस्तो गर ज़िन्दगी में कामरानी चाहिए

ज़ह्न-ओ-दिल से गर्द नफ़रत की हटानी चाहिए



अर्ज़ कर दूँ आख़िरी ख़्वाहिश इजाज़त हो अगर

एक शब मुझको तुम्हारी मेज़बानी चाहिए



ज़िल्ल-ए-सुब्हानी अगर कुछ आपसे बच पाए तो

हम ग़रीबों को भी थोड़ी शादमानी चाहिए



मूँद कर आँखें न चलना याद रखना ये सबक़

ज़िन्दगी में हर क़दम पर सावधानी चाहिए



ज़िन्दगी में लाज़मी तो है मगर इंसान को

दफ़्न करने के लिये भी माल पानी चाहिए



फ़ज़्ल से रब के मुकम्मल हो गई मेरी ग़ज़ल

दोस्तो…

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Added by Samar kabeer on November 9, 2020 at 5:30pm — 22 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : मज़ा (गणेश जी बाग़ी)

        ज वो बेहद खुश थी। कई दिनों बाद कुछ ठीक-ठाक ग्राहक आये थे। वह अरसे बाद आज रात बच्चों को अच्छा खाना खिला पाई थी। बच्चे भी बहुत दिनों बाद अच्छा खाना खाकर तृप्त दिख रहे थे, "माँ, वाह, मज़ा आ गया !"

         आज की इस आमदनी की बात उसके दल्ले पति से भी न छुपी रह सकी थी। दो-चार थप्पड़ रसीद कर उसने उससे कुछ पैसे ऐंठ लिये। ठेके पर दोस्तों के साथ बैठ, ठर्रा गटकाते हुए उधर वह भी बड़बड़ाये जा…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 9, 2020 at 4:21pm — 8 Comments

ग़ज़ल

212 212 212 212

1

दोस्तों के बिना ज़िन्दगी दोस्तो

इक कहानी उदासी भरी दोस्तो

2

बीच में फ़ासले ला के दौलत के क्यों

आज़माने लगी दोस्ती दोस्तो

3

हाथ में हाथ डाले खड़ी दोस्ती

गर्दिश-ए-दौराँ से लड़ के भी दोस्तो

4

कारवाँ अज़्म का रोके रुकता नहीं

राह चाहे हो मुश्किल भरी दोस्तो

5

हार बैठे हैं दिल कू-ए-उल्फ़त में हम

अब न खेलेंगे बाजी नई दोस्तो

6

सुब्ह होते ही बेहिस जहाँ के सितम

ढूँढ लेंगे हमारी गली…

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Added by Rachna Bhatia on November 9, 2020 at 1:00pm — 7 Comments

फैसला (लघुकथा)

आज मम्मी जी पापा जी छोटे के लिए लड़की देखने जा रहे। हम दो भाई है, छोटे भाई का नाम अभिषेक है। मुझे तो बैंक जाना था, फरवरी मार्च दो महीने, बैंक से छट्टिया वैसे भी नहीं मिलतीं। सास- ससुर की लाड़ली बड़ी बहू उनके साथ जारही थी। बहुत खुश थी, बड़ी बहू-चयन का विशेष दायित्व जो मिल गया था। पापा जी ने तो कह दिया था, हम ठहरे पुराने जमाने के लोग, आजकल जो अपेक्षाएं, एक बहू से परिवार को हो सकती है तुम बेहतर जानती हो। ड्राईवर के आते ही कहा, गाड़ी लगाओ, रामबीर चार घंटे का रास्ता है । बारह बजे तक पहुँचना है,…

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Added by Chetan Prakash on November 8, 2020 at 7:00pm — 6 Comments

सोच का सफ़र (लघुकथा )

जब मैं कल रात ड्यूटी से घर आई , तो महाभारत घर में पहले से ही हमेशा की तरह चल रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा कि जब घर वालों ने अपनी मर्जी से मेरी शादी की, मेरी राय तक नहीं पूछी गई l क्यूंकि मेरे जैसी जो पहले ही तीस पार कर चुकी होl उन से भला कौन राय लेता l मैं तो बोझ थी, जिसको निपटाना चाहा l जानलेवा बीमारी ने शादी के कुछ महीनों बाद ही उनको मुझसे जब दूर कर दिया। तब मुझे लगा, अब मुझे उस घर में एक अजनबी की तरह नहीं रहना चाहिए, मैं जल्दी से उनका बोझ कम करना चाहा। उनके जाने के बाद, मैं उस घर में अकेले…

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Added by मोहन बेगोवाल on November 4, 2020 at 9:30pm — 3 Comments

अनजाने से .....

अनजाने से .....

मैं

व्यस्त रही

अपने बिम्ब में

तुम्हारे बिम्ब को

तराशने में

तुम

व्यस्त रहे

स्वप्न बिम्बों में

अपना स्वप्न

तराशने में

हम

व्यस्त रहे

इक दूसरे में

इक दूसरे को

तलाशने में

वक्त उतरता रहा

धूप के सायों की तरह

मन की दीवारों से

हम के आवरण से निकल

मैं और तू

रह गए कहीं

अधूरी कहानी के

अपूर्ण से

अफ़साने…

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Added by Sushil Sarna on November 4, 2020 at 7:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल

221 1221 1221 122

.

आँखों मे छुपी अश्कों की जागीर का मतलब

समझेगी न ये दुनिया मेरी पीर का मतलब

चल मुझसे नहीं तुझको महब्बत ज़रा समझा

वो पर्स में तेरे मेरी तस्वीर का मतलब

जन्नत है कहीं गर तो यहीं पर है यहीं पर

क्या था कभी क्या आज है कश्मीर का मतलब

थे एक से बढ़ एक गुरु फिर भी न समझे

वो बीच सभा खिंचते हुए चीर का मतलब

इस जिस्म के हर हिस्से में बाँधे हूँ मैं ज़ेवर

कैसे मुझे मालूम हो जंजीर का…

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Added by anjali gupta on November 3, 2020 at 11:30pm — 8 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
बहुत चुनावी शोर : पाँच दोहे // सौरभ

हमें अबूझा ही लगा, लोकतंत्र का रूप ..

रात-रात भर मंत्रणा, करती व्याकुल धूप !

 

कैसे कितना कौन कब, किसे लगाता तेल

गणना-गणित चुनाव का, भितरघात-धुरखेल

 

बहुत कमीने रहनुमा, क्या हम बाँधें आस

इंद्रमंच पर बैठ कर, करते हैं बकवास ।।

 

दिखा-दिखा वह तर्जनी, पुलक रहा हर बार

मालिक हम भी जानते, क्या होती सरकार !!

 

राजा-राजा खेलते, बेवकूफ हम रंक !

उँगली थामे सोचिए, दाग लगा या डंक ?

***

सौरभ

(मौलिक और…

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Added by Saurabh Pandey on November 3, 2020 at 8:00pm — 4 Comments

जीने से पहले ......

जीने से पहले ......

मिट गई

मेरी मोहब्बत

ख़्वाहिशों के पैरहन में ही

जीने से पहले

जाने क्या सूझी

इस दिल को

संग से मोहब्बत करने का

वो अज़ीम गुनाह कर बैठा

अपने ख़्वाबों को

अपने हाथों

खुद ही तबाह कर बैठा

टूट गए ज़िंदगी के जाम

स्याह रातों में

ज़िंदगी

जीने से पहले

डूबता ही गया

हसीन फ़रेबों के ज़लज़ले में

ये दिल का सफ़ीना

भूल गया

मौजों की तासीर

साहिल कब बनते हैं

सफ़ीनों की…

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Added by Sushil Sarna on November 2, 2020 at 6:05pm — 8 Comments

जो किसी का नहीं अब वही है मेरा ....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

212 212 212 212

आज दिल उसके दुख से दुखी है मेरा

जो किसी का नहीं अब वही है मेरा (1)

मौत मुझको बुलाती है हर पल मगर

ज़िंदगी रास्ता रोकती है मेरा  (2)

लिख न पाऊँगा मैं आज क्या हो गया

मौत से सामना आज भी है मेरा  (3)

डगमगाते हैं जब भी क़दम ये मिरे

यार मंज़िल पता पूछती है मेरा   (4)

रख दिया है मुझे आग के सामने

जानता है बदन काग़ज़ी है मेरा  (5)

रोक सकता नहीं रथ के पहिए कोई

अब…

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Added by सालिक गणवीर on November 2, 2020 at 5:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल..कहीं लौकी कहीं कद्दू कहीं कटहल के ठेले हैं

मुफाईलुन*4

खरीदूँ कौन सी सब्जी बड़े लगते झमेले हैं

कहीं लौकी कहीं कद्दू कहीं कटहल के ठेले हैं

इधर भिन्डी बड़ी शर्मो हया से मुस्कुराती है

अजब नखरे टमाटर के पड़ोसी कच्चे केले हैं

तुनक में मिर्च बोली आ तुझे जलवा दिखाती हूँ

कहे धनिया हमें भी साथ ले लो हम अकेले हैं

शकरकंदी,चुकंदर ने सजाई नाज से महफ़िल

सुनाया राग आलू ने मगन बैगन,करेले हैं

घड़ी भर को जरा पहलु में लहसुन,प्याज आ बैठो

जुदाई में तुम्हारी 'ब्रज' ने…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2020 at 8:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल

,12122 12122 12122 12122

1

लगा के ठोकर वो पूछते हैं उठा के सर क्या चला करेंगे

पलट दी बाजी ये कह के हमने ख़ुदा के दम पर बढ़ा करेंगे

2

सजा के महफ़िल मेरी तबाही की पूछते हैं कि क्या करेंगे…

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Added by Rachna Bhatia on October 31, 2020 at 3:47pm — 3 Comments

लूटा गया था रात में अस्मत को जिसकी ढब -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



कहते हैं झूठ  ज़ुल्म  हिरासत  में आ गया

हाँ न्याय ज़ालिमों की हिमायत में आ गया।१।

*

लूटा गया था रात में अस्मत को जिसकी ढब

उसका ही नाम दिन को सिकायत में आ गया।२।

*

अन्धा है न्याय  जानता  होगी सजा नहीं

बेखौफ जुल्मी यूँँ न अदालत में आ गया।३।

*

बचना था जेल जाने  से  ऊँँची पहुँँच के बल

शासन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 31, 2020 at 2:00pm — 12 Comments

अहिल्याबाई होलकर

भारतीय इतिहास में रानी अहिल्याबाई का अपना ही इतिहास है जो दया, परोपकार, प्रेम और सेवा भाव की भावना से ओतप्रोत थी| रानी अहिल्याबाई एक ऐसी ही रानी थी जिसने रानी होते हुए भी खुद को कभी रानी नहीं माना बल्कि ईश्वर का एक प्रतिनिधि समझ कर ही अपने राज्य पर राज किया| जीवन रहते उन्हें इतनी परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन वह परिस्थितियों से घबराए बिना अपने कर्म पथ पर आगे बढ़ती रही| वह युद्ध में विश्वास नहीं कर करती ना ही उन्हें खून-खराबा पसंद…

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Added by PHOOL SINGH on October 31, 2020 at 11:25am — 1 Comment

ग़ज़ल नूर की- मेरी आँखों में तुम को ख़ाब मिला?

मेरी आँखों में तुम को ख़ाब मिला?

या निचोडे से  सिर्फ आब मिला.

.

सोचने दो मुझे समझने दो

जब मिला बस यही जवाब मिला.

.

दिल ने महसूस तो किया उस को   

पर न आँखों को ये सवाब मिला.

.

मैकदे में था जश्न-ए-बर्बादी

जिस में हर रिन्द कामयाब मिला.

.

इतना अच्छा जो मिल गया हूँ मैं

इसलिए कहते हो “ख़राब मिला.”

.

“नूर” चलने से पहले इतना कर

अपने हर कर्म का…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2020 at 10:01am — 12 Comments

मिस्मार दिल का ये दर-ओ-दीवार हो गया

बह्र:- 221 2121 1221 212

मिस्मार दिल का ये दर-ओ-दीवार हो गया

मुद्दत हुई तो यार का दीदार हो गया

वो जो चला गया है मेरा शह्र छोड़ कर

लगता है ऐसा मुझको मैं बीमार हो गया

बेमोल ही रहे न किया ज़िंदगी से ग़म

तूने छुआ मुझे तो मैं दीनार हो गया

था मर्ज़ ऐसा जिसकी नहीं थी दवा कोई

तू हाथ थाम कर मेरा तीमार हो गया

तूने गले लगाया "रिया" को मेरे ख़ुदा

लगता है जैसे क़द मेरा मीनार हो गया

"मौलिक व…

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Added by Richa Yadav on October 30, 2020 at 3:30pm — 10 Comments

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