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ग़ज़ल..कहीं लौकी कहीं कद्दू कहीं कटहल के ठेले हैं

मुफाईलुन*4

खरीदूँ कौन सी सब्जी बड़े लगते झमेले हैं
कहीं लौकी कहीं कद्दू कहीं कटहल के ठेले हैं

इधर भिन्डी बड़ी शर्मो हया से मुस्कुराती है
अजब नखरे टमाटर के पड़ोसी कच्चे केले हैं

तुनक में मिर्च बोली आ तुझे जलवा दिखाती हूँ
कहे धनिया हमें भी साथ ले लो हम अकेले हैं

शकरकंदी,चुकंदर ने सजाई नाज से महफ़िल
सुनाया राग आलू ने मगन बैगन,करेले हैं

घड़ी भर को जरा पहलु में लहसुन,प्याज आ बैठो
जुदाई में तुम्हारी 'ब्रज' ने कितने रंज झेले हैं

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 4, 2020 at 6:46pm

तहे दिल से शुक्रिया ज़नाब सालिक गणवीर जी...

Comment by सालिक गणवीर on November 4, 2020 at 4:24pm

भाई ब्रजेश कुमार जी

सादर अभिवादन

बढ़िया ग़ज़ल कही आपने. बधाइयाँ स्वीकारें.

Comment by Samar kabeer on November 3, 2020 at 11:19pm

कोई बात नहीं ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2020 at 8:57pm

माफ़ कीजिये आदरणीय समर जी टाइपिंग मिस्टेक हुई है टिप्पड़ी में और उसे हटाने का ऑप्शन भी नहीं दिख रहा।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2020 at 8:53pm

आदरणीय धामी जी रचना पटल पे आपकी उपस्थिति से अति प्रसन्नता हुई...सादर

Comment by Samar kabeer on November 3, 2020 at 12:06pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 2, 2020 at 10:37pm

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन । बहुत ही सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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