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अनजाने से .....

मैं
व्यस्त रही
अपने बिम्ब में
तुम्हारे बिम्ब को
तराशने में

तुम
व्यस्त रहे
स्वप्न बिम्बों में
अपना स्वप्न
तराशने में

हम
व्यस्त रहे
इक दूसरे में
इक दूसरे को
तलाशने में

वक्त उतरता रहा
धूप के सायों की तरह
मन की दीवारों से
हम के आवरण से निकल
मैं और तू
रह गए कहीं
अधूरी कहानी के
अपूर्ण से
अफ़साने में

हम
फिर बन जाते हैं
अजनबी
अपनी अपनी मैं के दम्भ को जीते हुए
हम के अवगुंठन में
अनजाने से


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 678

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 21, 2020 at 6:27am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on November 20, 2020 at 8:14pm

 आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी, सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by Sushil Sarna on November 20, 2020 at 8:13pm

 आदरणीय narendrasinh chauhan जी, सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by narendrasinh chauhan on November 19, 2020 at 6:34pm

khub sundar rachna sir 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 17, 2020 at 8:09pm

एक और बोलती कविता के लिए बधाई आदरणीय सुशील जी...

Comment by Sushil Sarna on November 11, 2020 at 8:38pm

"आदरणीय  Samar kabeer जी, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है

Comment by Samar kabeer on November 8, 2020 at 12:10pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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