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212 212 212 212

1

दोस्तों के बिना ज़िन्दगी दोस्तो
इक कहानी उदासी भरी दोस्तो
2
बीच में फ़ासले ला के दौलत के क्यों
आज़माने लगी दोस्ती दोस्तो
3
हाथ में हाथ डाले खड़ी दोस्ती
गर्दिश-ए-दौराँ से लड़ के भी दोस्तो
4
कारवाँ अज़्म का रोके रुकता नहीं
राह चाहे हो मुश्किल भरी दोस्तो
5
हार बैठे हैं दिल कू-ए-उल्फ़त में हम
अब न खेलेंगे बाजी नई दोस्तो
6
सुब्ह होते ही बेहिस जहाँ के सितम
ढूँढ लेंगे हमारी गली दोस्तो
7
लब से कुछ भी नहीं कह सके थे मगर
फिर भी समझा था वो अनकही दोस्तो
8
दर्द सहते रहे अश्क बहते रहे
पर नहीं ला सके लब प सी दोस्तो

9
रात लम्बी भी थी और तारीक भी
जिससे 'निर्मल' बख़ूबी लड़ी दोस्तो

मौलिक व अप्रकाशित

रचना निर्मल

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 21, 2020 at 6:40am

आ. रचना जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Rachna Bhatia on November 19, 2020 at 6:56pm

आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी बेहद शुक्रिय:।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 17, 2020 at 8:34pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीया...बधाई

Comment by Rachna Bhatia on November 12, 2020 at 5:12pm

आदरणीय समर कबीर सर् आदाब। जी सर्, 'पर शिकायत किसी से न की दोस्तो' रख लेती हूँ। बेहद शुक्रिय: सर्।

Comment by Samar kabeer on November 12, 2020 at 11:50am

'आह भी इक न उसने भरी दोस्तो'

इस मिसरे को यूँ कर लें:-

'आह भी इक न हमने

भरी दोस्तो'

या

'पर शिकायत किसी से न की दोस्तो'

Comment by Rachna Bhatia on November 10, 2020 at 9:31pm
आदरणीय समर कबीर सर् आदाब।सर् ग़ज़ल तक आने तथा हौसला बढ़ाने के लिए बहुत बहुत आभारी हूँ। आठवें में कहना चाह रही थी कि
'मुँह से उफ़ भी नहीं निकली '।
शायद मैं अपनी बात ठीक से कह नहीं पाई।
सर्,सुधार के लिए क्या यूँ कह सकते हैं
'आह भी इक न उसने भरी दोस्तो'
Comment by Samar kabeer on November 10, 2020 at 8:15pm
मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार करें ।
8वें शैर का सानी समझ में नहीं आया ।

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