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ग़ज़ल...ले ली मेरी जान सलीके से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वो बैठा दिल में आन सलीके से

फिर ले ली मेरी जान सलीके से

यूँ ही पहले थोड़ी सी बात हुई

बन बैठे फिर अरमान सलीके से

पल भर को पहलू में आओ चन्दा

इतना तो कर अहसान सलीके से

काफी है पलकों का उठना गिरना

तू नैन कटारी तान सलीके से

दिल की दुनिया लूट गईं दो आँखें

फिर होती हैं हैरान सलीके से

कोने की उस जर्जर अलमारी में

रख छोड़े कुछ अरमान सलीके से

जिनको थी लाज बचानी कलियों की

बन…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 25, 2018 at 5:00pm — 18 Comments

परख - लघुकथा -

परख - लघुकथा -

नीना जैसे ही चाय की ट्रे लेकर,  उसे देखने आये  लड़के वालों के परिवार की एक मात्र महिला को चाय देने बढ़ी, उस महिला को देख कर नीना के होश उड़ गये। उसे लगा वह अभी चक्कर खा कर गिर जायेगी। अब उसे निश्चित लग रहा था कि यह रिश्ता भी नहीं होने वाला। माँ बापू को आज फिर तगड़ा झटका लगेगा।

हालांकि नीना एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर थी। बस खूबसूरती में औसत थी। रंग भी थोड़ा दबा हुआ था। अतः रिश्ते होते होते रह जाते थे।

नीना के सामने कालेज की वह घटना चल चित्र की तरह घूम गयी। जब वह…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 25, 2018 at 3:20pm — 12 Comments

धरती का बोझ- लघुकथा

शोक सभा चालू थी, हर आदमी आता और मरे हुए लोगों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी बात शुरू करता और फिर प्रशासन को कोसते हुए अपनी बात ख़त्म करता. बीच बीच में लोग उस एक व्यक्ति की भी तारीफ़ जरूर करते जिसने कई लोगों को बचाया था लेकिन अपनी जान से भी हाथ धो बैठा था.

उधर कही आसमान में रूहें एक जगह बैठी हुई जमीन पर चलने वाले इस कार्यक्रम को देख रही थीं. उनमें अधिकांश तो उस एक रूह से बहुत खुश थीं जिसने उनके कुछ अपनों को बचा दिया था लेकिन एक रूह बहुत बेचैन थी. उसे यह बात जरा भी हजम नहीं हो…

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Added by विनय कुमार on October 25, 2018 at 11:34am — 12 Comments

इस  बार  तेरे  शहर  में  परछाइयाँ जलीं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"(गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२

सुनते हैं खूब न्याय  की  सच्चाइयाँ जलीं

कैसा अजब हुआ है कि अच्छाइयाँ जलीं।१।



वर्षों पुरानी बात है जिस्मों का जलना तो

इस  बार  तेरे  शहर  में  परछाइयाँ जलीं।२।



कितने हसीन ख्वाब  हुये खाक उसमें ही

ज्वाला में जब दहेज की शहनाइयाँ जलीं।३।



सब कुछ यहाँ जला है, तेरी बात से मगर

हाकिम कभी वतन में न मँहगाइयाँ जलीं।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 25, 2018 at 2:30am — 18 Comments

*शरद-पूर्णिमा*- कविता/ अर्पणा शर्मा, भोपाल

 अंबर और धरणी पर आज,

शारदीय चाँदनी रात खिली,

पूनो का चाँद लेकर आई,

तारों की बारात खिली,

कार्तिक पुरवाई बहे,

मीठी-मीठी ठंड़ खिली ,

चमेली,चंपा, जूही से महके,

सपनों की सौगात खिली,

शुभ्र चमके निहारिका ये ,

दृश्यमान है गात खिली,

गोकुल रास रचाएँ कान्हा,

वंशी की मधुरम तान खिली,

गोपियाँ-राधा झूमें-नाचें,

रक्तिम अधरों पर मुस्कान…

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Added by Arpana Sharma on October 25, 2018 at 12:00am — 8 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : विरासत

मुझे विरासत में मिलीं

कुछ हथौड़ियाँ

कुछ छेनियाँ

मिला थोड़ा-सा धैर्य

कुछ साहस

थोड़ा-सा हुनर

मैं तराशने लगा

निर्जीव पत्थरों को

बना दिया

सुंदर-सुंदर मूर्तियाँ

जो कई अर्थों में

श्रेष्ठ हैं

ईश्वर द्वारा बनायी गयीं

सजीव मूर्तियों से

जिन्हें नहीं पता रिश्तों की मर्यादा

नही कर पातीं ये भेद

दूधमुँही बच्चियों, युवतियों और वृद्ध महिलाओं में

काश

एक अदद कलम

मुझे मिली होती …

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 24, 2018 at 11:30pm — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
'रूह का पाखी' (नवगीत राज )

जर्जर तेरा महल हुआ है

बासी आबोदाना 

रूह का पाखी बोल रहा चल 

बदलें आज ठिकाना 



कोने कोने जाल मकड़िया

ढहने को तैयार दुकड़िया

ईंटें होती नंगी सारी

गारे की भी  तंगी भारी 

गाटर हुआ पुराना



पसरी आँगन बीच उदासी

जमी हुई हैं सभी निकासी

धूप हवा आती डर डर कर 

धीमे धीमे ठहर ठहर…

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Added by rajesh kumari on October 24, 2018 at 9:48pm — 12 Comments

"तरही ग़ज़ल नम्बर 4

नोट:-

तरही मुशायरा अंक-100 में 87 ग़ज़लें पोस्ट हुईं,मेरी इस ग़ज़ल में जो क़वाफ़ी इस्तेमाल हुए हैं वो बिल्कुल नये हैं ।

पहले सिल पर घिसा गया है मुझे

फिर जबीं पर मला गया है मुझे

जाल हूँ इक सियासी लीडर का

नफ़रतों से बुना गया है मुझे

कोई बारूद की तरह देखो

सरहदों पर बिछा गया है मुझे

कहदो तक़दीर से बखेरे नहीं

करके वो एक जा गया है…

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Added by Samar kabeer on October 24, 2018 at 5:54pm — 47 Comments

मिलन-लघुकथा

चारो तरफ मची भगदड़ अब धीरे धीरे कम हो चली थी, बस घायल लोगों की चीखें ही चारो तरफ गूंज रही थीं. इस भयानक हादसे में सैकड़ों लोग मरे थे और उससे ज्यादा ही घायल थे. राहत में पहुंचे लोग मृत शरीरों को एक तरफ इकट्ठा कर रहे थे और घायलों को हस्पताल भेजने की तैयारी में भी जुटे थे.

पटरी के एक तरफ पड़े एक युवा के मृत शरीर को लोगों ने उठाकर एक तरफ कर दिया. कुछ ही देर बाद कुछ और लोग एक लड़की के मृत शरीर को भी वहीँ डाल गए. कुछ घंटे बीतते बीतते तमाम लाशें एक दूसरे से गड्डमड्ड पड़ीं थीं और लड़के का हाथ लड़की के…

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Added by विनय कुमार on October 24, 2018 at 12:33pm — 14 Comments

दर्द का आँखों में सबकी - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर' ( गजल )

२१२२ /२१२२  /२१२२/ २१२

दर्द का आँखों में सबकी इक समंदर कैद है

चार दीवारी में हँसता आज हर घर कैद है।१।



हो न जाये फिर वो हाकिम खूब रखना ध्यान तुम

जिसके  सीने  में  नहीं  दिल  एक  पत्थर  कैद है।२।



जब से यारो ये सियासत हित परस्ती की हुयी

हो गया  आजाद  नेता  और  अफसर कैद है।३।



राज्य कैसा राम का यह ला रहे ये देखिये

बंदिशों से मुक्त रहजन और रहबर कैद…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 24, 2018 at 7:30am — 18 Comments

ग़ज़ल- चींटियाँ उड़ने लगीं, शाहीन कह देने के बाद

2122 2122 2122 212

हर दुआ पर आपके आमीन कह देने के बाद

चींटियाँ उड़ने लगीं, शाहीन कह देने के बाद

आपने तो ख़ून का भी दाम दुगना कर दिया

यूँ लहू का ज़ायका नमकीन कह देने के बाद

फिर अदालत ने भी ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली

मसअले को वाक़ई संगीन कह देने के बाद

ये करिश्मा भी कहाँ कम था सियासतदान का

बिछ गईं दस्तार सब कालीन कह देने के…

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Added by Balram Dhakar on October 24, 2018 at 12:00am — 20 Comments

'माता की माया' (लघुकथा)

'अनौपचारिक आकस्मिक शिखर-वार्ता' :

प्रतिभागी : लोह कलपुर्जे, मशीनें और औज़ार।

अनौपचारिक परिचर्चा जारी गोलमेज पर :

"एक समय था, जब लोग हमारा लोहा मानते थे!"

"हां, बिल्कुल सही! लोहे पर कुछ मुहावरे, कहावतें और लोकोक्तियां भी कहा करते थे बातचीत में!"

"कील, हंसिया, खुरपी, छैनी, हथौड़े से लेकर बड़ी-बड़ी मशीनों और उनके कलपुर्जों तक हमारी ही धूम थी! अपना लोहा मनवाते थे; दुश्मनों को लोहे के चने चबाने पड़ते थे!"

"चर्मकार, कारीगर, किसान, मज़दूर, इंजीनियर,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 23, 2018 at 9:30pm — 4 Comments

मानव छंद में प्रयास :

मानव छंद में प्रयास :

मेरे मन को जान गयी ।

फिर भी वो अनजान भयी।।

शीत रैन में पवन चले।

प्रेम अगन में बदन जले।।

..................................

देह श्वास की दासी है।

अंतर्घट तक प्यासी है।।

मौत एक सच्चाई है।

जीवन तो अनुयायी है ।।

................................

रैना तुम सँग बीत गई।

मैं समझी मैं जीत गई।।

अब अधरों की बारी है।

तृप्ति तृषा से हारी है।।

सुशील सरना

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on October 23, 2018 at 8:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल नूर की - मुझ को कहा था राह में रुकना नहीं कहीं

मुझ को कहा था राह में रुकना नहीं कहीं

सदियों को नाप कर भी मैं पहुँचा नहीं कहीं.

.

ज़ुल्फ़ें पलक दरख़्त सभी इक तिलिस्म हैं

इस रेग़ज़ार-ए-ज़ीस्त में साया नहीं कहीं.

.

तुम क्या गए तमाम नगर अजनबी हुआ

मुद्दत हुई है घर से मैं निकला नहीं कहीं.

.

अँधेर कैसा मच गया सूरज के राज में

जुगनू, चराग़ कोई सितारा नहीं कहीं.

.

खेतों को आस थी कि मिटा देगा तिश्नगी

गरजा फ़क़त जो अब्र वो बरसा नहीं कहीं.

.

ये और बात है कि अदू को चुना गया…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 23, 2018 at 12:00pm — 18 Comments

"मन मार्जियां "

जुल्म की ये इंतेहा भी कब तलक।

ज़िंदगी के इम्तेहा भी कब तलक॥

आज़ या कल बिखर ही जाऊंगा।

वक़्त होगा मेहरबाँ भी कब तलक॥

ऐब ही जब ऐब तुझमें हैं भरे मैं ।

तुझमें ढूँडू ख़ूबियाँ भी कब तलक॥…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on October 23, 2018 at 11:30am — 1 Comment

मुआवज़ा - लघुकथा -

मुआवज़ा - लघुकथा -

 देश भक्त पार्टी के एक नामी नेता  रेल हादसे पर  विरोध जताने अपने समर्थकों की भारी भीड़  लेकर डी  एम साहब के दफ़्तर पहुंच गये और जम कर नारेबाज़ी शुरू कर दी। थोड़ी  देर में साहब  ने नेताजी को दफ़्तर में बुला  लिया।

"क्या हुआ भैया जी, इतना शोरगुल किसलिये। हम लोग तो खुद ही रात दिन इसी काम में लगे हुए हैं।"

"जनाब, हम जन प्रतिनिधि हैं।लोगों को सब जानकारी देनी पड़ती है कि प्रशासन क्या कर रहा है। इतना समय हो गया, आप लोगों की ओर से कोई पुख्ता खबर नहीं आई मीडिया…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 23, 2018 at 10:59am — 8 Comments

गजल(था कभी...)

2122 2122 2122 212
था कभी कितना नरम वह! हर कदर आखर हुआ
जब हवाओं ने छुआ तब पात वह जर्जर हुआ।1

सूख जाती है सियाही आजकल जल्दी यहाँ
ख्वाहिशों के फ़लसफों पे आदमी निर्झर हुआ।2

मिट्टियों की कौन करता है यहाँ पड़ताल भी
हर शज़र गमला सजा आकाश पर निर्भर हुआ।3

जो उड़ाता था वहाँ बेपर घटाओं को कभी
देखते ही देखते वह आजकल बेपर हुआ।4

वक्त की मदहोशियाँ क्या-क्या करा देतीं यहाँ
गर्द के बस ढ़ेर जैसा एक दिन अकबर हुआ।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 23, 2018 at 10:00am — 5 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

शायरी फख्र से महफ़िल में जुबानी आई ।

आप आये तो ग़ज़ल में भी रवानी आई ।।

लौट आयीं हैं तुझे छू के हमारी नजरें ।

जब दरीचे पे तेरे धूप सुहानी आई ।।

पूँछ लेता है वो हर दर्द पुराना मुझसे ।

अब तलक मुझको कहाँ बात छुपानी आई ।।

तीर नजरों से चला कर के यहां छुप जाना ।

नींद मेरी भी तुझे खूब चुरानी आई ।।

मुद्दतों बाद जो गुजरा था गली से इकदिन ।

याद मुझको तेरी हर एक निशानी आई…

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Added by Naveen Mani Tripathi on October 22, 2018 at 8:00pm — 6 Comments

नए आयाम ....

नए आयाम ....

मुझे

नहीं सुननी

कोई आवाज़

मैंने अपने अन्तस् से

हर आवाज़ के साथ जुड़े हुए

अपनेपन की अनुभूति को

तम की काली कोठरी में

दफ़्न कर दिया है

अपनेपन का बोध

कब का मिटा दिया है

अपनेपन की सारी निधियाँ

लुटा चुका हूँ

अब तो मैं

किसी स्मृति का अवशेष हूँ

आवाज़ों के मोह बंधन में

मुझे मत बाँधो

हम दोनों के मन

एक दूसरे की अनुभूतियों के

अव्यक्त स्वरों से

गुंजित हैं

आवाज़ों को चिल्लाने दो…

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Added by Sushil Sarna on October 22, 2018 at 7:42pm — 6 Comments

आस्था "

हर घर में एक राम है रहता।

हर घर में एक रावण भी॥

जैसी जिसकी सोच है रहती।

उसको दिखता वो वैसा ही॥

 

टूट शिला से छोटा टुकड़ा।

लुढ़क रहा मंदिर की ओर॥

कोई देखता उसको पत्थर।

कोई देखता भगवन को॥

 

आस्था और विश्वास जहां हो।

तर्क नहीं देते कुछ काम॥

मानो या न मानो लेकिन।

बनते सबके बिगड़े काम॥

 

धर्म-अधर्म सब अंदर अपने।

पीर पड़े लगे राम को जपने॥

वर्षो से यही रीत चल रही।

इच्छाओं की गति…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on October 22, 2018 at 5:30pm — 1 Comment

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