For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

फिर ज़ख़्मों को ...संतोष

अरकान:-

फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फ़ा

फिर ज़ख़्मों को धोने का दिल करता है

चुपके चुपके रोने का दिल करता है

जब जब…

Continue

Added by santosh khirwadkar on August 22, 2018 at 10:09pm — 14 Comments

"ज़हनियत मुर्दाबाद!" (लघुकथा)

"ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद! जान ज़िन्दाबाद! .. ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद!"- सुंदर 'राष्ट्रीय राजमार्ग' पर मौत को करारी शिकस्त देती कुछ ज़िन्दगियां ख़ुशी की अश्रुधारा बहाती चिल्ला रहीं थीं। वहां दैनिक दिनचर्या तहत बेहद तीव्र गति में दौड़ रहे ट्रैफ़िक में एक बाइक को विपरीत दिशा से आते एक स्कूटर ने यूं टक्कर मारी कि दोनों पर सवार युवा किसी फुटबॉल या सिक्के माफ़िक टॉस करते हुए सड़क के डिवाइडर से टकराने के बावजूद चोटिल होकर ज़िंदा बच गये थे। वह बाइक अभी भी एक छोटे से बच्चे को यथावत बिठाले सड़क पर दौड़ती हुई डिवाइडर से…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 22, 2018 at 1:33pm — 8 Comments

आना मेरे दयार में कुर्बत अगर मिले

221 2121 1221 212

कुछ रंजो गम के दौर से फुर्सत अगर मिले ।

आना मेरे दयार में कुर्बत अगर मिले ।।1

यूँ हैं तमाम अर्जियां मेरी खुदा के पास ।

गुज़रे सुकूँ से वक्त भी रहमत अगर मिले ।।2

आई जुबाँ तलक जो ठहरती चली गयी ।

कह दूँ वो दिल की बात इजाज़त अगर मिले ।।3…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 22, 2018 at 1:25pm — 16 Comments

'सैलाब में प्रत्याशी, मतदाता या किसान!' (लघुकथा)

"कौन? ... कौन डूब रहा है इस सैलाब में इतने रेस्क्यू ऑपरेशंस के बावजूद?"

"आम आदमी साहिब! आम मतदाता डूब रहा है, उपेक्षा के सैलाब में या फिर अहसानात के सैलाब में... इस चुनावी सैलाब में!"

"रेस्कयू में हम कोई कसर नहीं छोड़ रहे ! धन, नौकरी, छोकरी, योजना, लोन-दान, वीजा-पासपोर्ट,  नये-नये बिल-क़ानून, पशु-रक्षा, धार्मिक-स्थल-मुद्दे, मीडिया-कवरेज , वाद-विवाद, पुलिस-समर्पण ... सब कुछ तो लगा दिया उनके लिए उनके हितार्थ! .. और क्या चाहिए!"

"जनता इनको चुनावी-हथकंडे मान रही है, रेस्क्यू नहीं!…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 22, 2018 at 12:30am — 5 Comments

आल्हा

आल्हा (वीर छन्द)

बरसे बादल उमड़ घुमड़ के,चहुँ दिशि गूँजे चीख पुकार

गाँव नगर सब डूब गया है,कुदरत की ऐसी है मार

विषम घड़ी आयी केरल में,बाढ़ मचाई है उत्पात

कांप उठा है कोना कोना, संकट से ना मिले निजात

भारी जन धन काल गाल में,कैसे सभी बचाएं जान

खेत सिवान झील में बदले,ध्वस्त हुए सारे अरमान

तहस नहस केरल की धरती,मची तबाही चारो ओर

नाव चले गलियों कूँचे में,काल क्रूर बन गया कठोर

जमींदोज सब भवन हो गए,आयी बाढ़ बड़ी…

Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on August 21, 2018 at 8:36pm — 14 Comments

ऐ आसमान ....

ऐ आसमान ....

क्या हो तुम

आज तक कोई नहीं

छू पाया तुम्हें

फिर भी तुम हो

ऐ आसमान

किसी बेघर की

छत हो

किसी का ख्वाब हो

किसी परिंदे का लक्ष्य हो

या

किसी रूह का

अंतिम धाम हो

क्या हो तुम

ऐ आसमान

नक्षत्रों का निवास हो

किसी चातक की प्यास हो

मेघों का क्रीड़ा स्थल हो

सूर्य का पथ हो

या

चाँद तारों का आवास हो

क्या हो तुम

ऐ आसमान

सुशील सरना

मौलिक एवं…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 21, 2018 at 1:53pm — 14 Comments

अब तुम नहीं हो इस दुनिया में-------

बेहद तेजी से प्रोफेशनल तरक्‍की

के रास्‍ते पर हो दोस्त,

बुन ली है तुमने अपने

आस पास एक ऐसी दुनिया,

जिसमें ना प्रवेश कर सकते  हैं  हम

और ना ही तुम आ सकते हो हम तक !

नहीं बची  है दूसरों के लिए करुणा,

प्रेम, स्‍नेह और आत्‍मीयता की कोई जगह,

तुम्हारी इस दुनिया में !

हंसना, मुस्‍कुराना तो कभी का

हो चुका था बंद,जब भी मिले,मिले…

Continue

Added by Naval Kishor Soni on August 21, 2018 at 12:00pm — 6 Comments

अबतक तो बस तन्हा हूँ - गजल ( लक्ष्मण धामी मुसाफिर)

२२ २२ २२ २



पूछ न इस  रुत कैसा हूँ

अबतक तो बस तन्हा हूँ।१।



बारिश तेरे  साथ गयी

दरिया होकर प्यासा हूँ।२।



आता जाता एक नहीं

मैं भी  कैसा  रस्ता हूँ।३।



जब तन्हाई डसती है

सारी रात भटकता हूँ।४।



हाथों में  चुभ  जाते हैं

काँटे जो भी चुनता हूँ।५।



जाने कौन चुनेगा अब

उतरन वाला कपड़ा हूँ।६।



तारों सँग कट जाती है

शरद अमावस रैना हूँ।७।



अनमोल भले बेकार…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 21, 2018 at 11:57am — 18 Comments

भटकना बेहतर (लघुकथा)

कितने ही सालों से भटकती उस रूह ने देखा कि लगभग नौ-दस साल की बच्ची की एक रूह पेड़ के पीछे छिपकर सिसक रही है। उस छोटी सी रूह को यूं रोते देख वह चौंकी और उसके पास जाकर पूछा, "क्यूँ रो रही हो?"

वह छोटी रूह सुबकते हुए बोली, "कोई मेरी बात नहीं सुन पा रहा है… मुझे देख भी नहीं पा रहा। कल से ममा-पापा दोनों बहुत रो रहे हैं… मैं उन्हें चुप भी नहीं करवा पा रही।"

वह रूह समझ गयी कि इस बच्ची की मृत्यु हाल ही में हुई है। उसने उस छोटी रूह से प्यार से कहा, "वे अब तुम्हारी आवाज़…

Continue

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 20, 2018 at 11:30pm — 10 Comments

जीवन के दोहे :

जीवन के दोहे :



बड़ा निराला मेल है, श्वास देह का संग।

जैसे चन्दन से लिपट, जीवित रहे भुजंग।1।

अजब जहाँ की रीत है, अज़ब यहाँ की प्रीत।

कब नैनों की रार से, उपजे जीवन गीत ।2।

बड़ा अनोखा ईश का, है आदम उत्पाद।

खुद को कहता है खुदा, वो आने के बाद।3।

झूठे रांझे अब यहां, झूठी उनकी हीर।

झूठा नैनन नीर है, झूठी उनकी पीर।4।

जैसे ही माँ ने रखा, बेटे के सर हाथ।

बह निकली फिर पीर की, गंगा जमुना…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 20, 2018 at 4:30pm — 24 Comments

नवगीत- लोकतंत्र

लोकतंत्र

 

अर्जी लिए खड़ा है बुधिया,

भूखा प्यासा खाली पेट.

राजा जी कुर्सी पर बैठे,

घुमा रहे हैं पेपरवेट.

 

कहने को तो लोक तंत्र है,

मगर लोक को जगह कहाँ है.

मंतर…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on August 20, 2018 at 1:29pm — 18 Comments

'ताटंक छंद अभ्यास'

[विषम चरण 16 मात्राएँ + यति+ सम चरण 14 मात्राएँ तुकांत पर तीन गुरु (222) सहित]

ओ री सखी नदी तुम भी हो, हुई न तुम वैसी गंदी।

हम सब पर तुम मर मिटती हो, सहकर भी सब पाबंदी।।

धुनाई-धुलाई हर पत्नी की, करते पति बस वस्त्रों सी।

मैल दिखाकर अपने मन का, पिटाई करते जब बच्चों सी।।

*

ताक-झांक बच्चे करते पीछे, दिखे आज बदले पापा।

झाग-दाग़ रिश्तों के छूटे, हृदय 'नदी' का जब नापा।।

दिन छुट्टी का अब ग़ज़ब हुआ, नदी से 'नदी' को जाना।

समय का अजब यह फेर हुआ, मां…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 20, 2018 at 4:00am — 11 Comments

विरह गीत

अश्रु भरे नैन,
नाहीं आवे मोहे चैन
कैसे कटें दिन रैन,
इस विरहा की मारी के...

मन में समायो है,
ये जसुदा को जायो
कोई ले चलो री गाम मोहे,
कृष्ण मुरारी के...

कर गयो टोना,
नंनबाबा को ये छोना
देख सांवरो सलौना,
गाऊँ गीत मल्हारी के...

व्याकुल सो मन
अकुलाये से नयन
बिन धीरज धरें ना
चितवन को निहारि के...

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by रक्षिता सिंह on August 19, 2018 at 8:58pm — 11 Comments

तेरे आने से आये दिन सुहाने ।

1222 1222 122

.

तेरे आने से आये दिन सुहाने ।

हैं लौटे फिर वही गुजरे ज़माने ।।

भरा अब तक नही है दिल हमारा ।

चले आया करो करके बहाने ।।

हमारे फख्र की ये इन्तिहाँ है ।

वो आये आज हमको आजमाने ।।

बड़ी शिद्दत से तुझको पढ़ रहा था ।

हवाएं फिर लगीं पन्ने उड़ाने ।।

शिकायत दर्ज जब दिल में कराया ।

अदाएँ तब लगीं पर्दा हटाने ।।

नज़र से लूट लेना चाहते हैं ।

हैं मिलते लोग अब कितने…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 19, 2018 at 8:30pm — 4 Comments

कुछ दोहे -लक्ष्मण धामी"मुसाफिर"

सुखिया को संसार में, सब कुछ मिलता मोल

पर दुखिया  के  वास्ते, सकल  जिन्दगी झोल।१।

हर देहरी  पर  चाह  ले, आँगन बैठे लोग

भूखों को दुत्कार नित, मंदिर मंदिर भोग।२।



पाले  कैसी  लालसा, हर  मानव मजबूर

हुआ पड़ोसी पास अब, सगा सहोदर दूर।३।



बिकने को कोई बिके, पर ये दुख का योग

औने-पौने  बिक  रहे, ऊँचे  कद  के  लोग।४।



घुट्टी में सँस्कार की, अब क्या क्या खास

रिश्तों से आने लगी, अब जो खट्टी बास।५।

मौलिक व…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 19, 2018 at 5:28pm — 12 Comments

प्रिय भाई डा० रामदरश मिश्र जी

आज १५ अगस्त... कई दिनों से प्रतीक्षा रही इस दिन की ... डा० रामदरश मिश्र जी का जन्म दिवस जो है । आज उनसे बात हुई तो उनकी आवाज़ में वही मिठास जो गत ५६ वर्ष से कानों में गूँजती रही है। उनका सदैव स्नेह से पूछना , “भारत कब आ रहे हैं ? ” ... सच, यह मुझको भारत आने के लिए और उतावला कर देता है  .. और मन में यह भी आता है कि आऊँगा तो प्रिय सरस्वती भाभी जी के हाथ का बना आम का अचार भी खाऊँगा ... बहुत ही अच्छा अचार बनाती हैं वह ।

कैसे कह दूँ उनके स्नेह से मुझको स्नेह नहीं है, जब उनकी मीठी…

Continue

Added by vijay nikore on August 19, 2018 at 6:19am — 4 Comments

"उन्नति और प्रत्युत्पन्नमति" (लघुकथा)

महिमा दिखने में अतिसुंदर किंतु मासूम थी। उच्च शिक्षा के बाद उच्च स्तरीय नौकरी हासिल करना उस मध्यमवर्गीय के लिए न तो आसानी से संभव था, न ही असंभव। जब दूसरे सक्षम लोग उसको नियंत्रित या 'स्टिअर' कर मनचाही दिशा देने की कोशिश करते तो उसे लगता कि वह पश्चिमी आधुनिकता की चपेट में आ रही है, कुछ समझौते कर कठपुतली सी बनायी या बनवाई जा रही है। आज वह लैपटॉप पर चैटिंग कर आभासी दुनिया के मशविरे लेने को विवश थी; पिता को सच बताने से डरती थी, किंतु 'सहेली सी' मां को भी तो सब कुछ उसने नहीं बताया था! हालांकि…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 19, 2018 at 2:49am — 4 Comments

नींव की ईंट--लघुकथा

"अरे लल्ला, साहब लोगन के लिए दुइ कप चाय तो बनवा दो", दशरथ ने आवाज लगाया.

"रहने दीजिये, अभी तो यहाँ खाना खाया, चाय की जरुरत नहीं है", उसने दशरथ को मना किया. तब तक बगल में बैठे मलखान ने लल्ला को आवाज़ लगायी "अरे चाय नहीं, काफ़ी बनवाओ, और हाँ कम शक्कर वाली", और उन्होंने मुस्कुराते हुए ऐसे देखा जैसे मन की बात पकड़ ली हो. उसने फिर से मना किया लेकिन तब तक लल्ला घर के अंदर घुस गया. गाँव में अभी भी काफी चहल पहल थी.

"साहब आपको १२ बजे आना था, असली मेला तो ओही समय था. कल से अखंड रामायण करवाए थे…

Continue

Added by विनय कुमार on August 18, 2018 at 10:43pm — 8 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
नवगीत : जग-जगती में // -- सौरभ

आग जला कर जग-जगती की  
धूनी तज कर
साँसें लेलें ! 
खप्पर का तो सुख नश्वर है 
चलो मसानी, रोटी बेलें !!
 
जगत प्रबल है दायित्वों का 
और सबलतम 
इसकी माया 
अँधियारे का प्रेम उपट कर 
तम से पाटे 
किया-कराया 
 
उलझन में चल
काया जोतें 
माया का भरमाया झेलें ! 
 
जस खाते,
तस जीते हैं…
Continue

Added by Saurabh Pandey on August 18, 2018 at 10:00pm — 20 Comments

गर्द (लघु रचना ) .....

गर्द (लघु रचना ) .....

वह्म है
पोंछ देने से
आँसू
मिट जाते हैं
दर्द
मोहब्बत के शह्र में
जब उड़ती है
यादों की गर्द

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 18, 2018 at 6:00pm — 4 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

sushil yadav posted blog posts
Oct 26
Sushil posted blog posts
Oct 26
vijay nikore posted a blog post

अनसुने अनकहे के बीच

                        अनसुने अनकहे के बीच.कहे अनसुने-से रहे कुछ जज़्बातउसपर अनकहे एहसासों का…See More
Oct 26
रोहित डोबरियाल "मल्हार" replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"1 लाख मासिक चाहिए ही क्यों भाई, वर्डप्रेस CRM में वेबसाइट को ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सालाना खर्च…"
Oct 15
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service