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Rakshita Singh
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Rakshita Singh commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post ग़ज़ल - ज़माने के लिए
"आदरणीय बसंत जी बहुत ही खूबसूरत गज़ल। बहुत बहुत बधाई"
Sep 15
Pradeep Devisharan Bhatt commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"गीत सुंदर बन पड़ा है। शुभकामनाएँ"
Aug 24
santosh khirwadkar commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"वाह्ह्ह क्या बात है ...बहुत सुंदर गीत!! बधाई!"
Aug 22
डॉ छोटेलाल सिंह commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"आदरणीया रक्षिता जी विरह गीत पढ़कर बहुत आनन्द आया बहुत बहुत बधाई"
Aug 22
Naveen Mani Tripathi commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"आ0 रक्षिता सिंहः जी बहुत अच्छी रचना के लिए बधाई आपको ।"
Aug 22
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"आ. रक्षिता जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Aug 20
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"सुंदर रचना हुई है | हार्दिक बधाई आदरणीया |"
Aug 20
Samar kabeer commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"मुहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । पटल पर बहुत समय बाद आपका आना हुआ,पिछली पोस्ट पर आपके प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा है ।"
Aug 20
Neelam Upadhyaya commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"बहुत ही अच्छी  रचना ।  प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें रक्षिता जी। "
Aug 20
Mohammed Arif commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"आदरणीया रक्षिता जी आदाब,                         बहुत ही लाजवाब विरह गीत । अच्छा किया जो आपने ने केंद्र में मुरारी को रख लिया । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 20
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"आदरणीय मिर्ज़ा जी, बहुत बहुत धन्यवाद!!"
Aug 19
mirza javed baig commented on Rakshita Singh's blog post विरह गीत
"उत्तम रचना के लिए बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 19
Rakshita Singh posted a blog post

विरह गीत

अश्रु भरे नैन,नाहीं आवे मोहे चैनकैसे कटें दिन रैन,इस विरहा की मारी के...मन में समायो है, ये जसुदा को जायोकोई ले चलो री गाम मोहे,कृष्ण मुरारी के...कर गयो टोना,नंनबाबा को ये छोनादेख सांवरो सलौना,गाऊँ गीत मल्हारी के...व्याकुल सो मनअकुलाये से नयनबिन धीरज धरें नाचितवन को निहारि के...(मौलिक व अप्रकाशित)See More
Aug 19
राज़ नवादवी commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"आदरणीय रक्षिता जी, सुन्दर ग़ज़ल के प्रयास के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें. ये ग़ज़ल १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ की बह्र में हैं. चुनांचे नीचे के शेर पे गौर कीजिएगा. क्या ये बह्र में हैं? दानिस्ता दिल जला के यूँ तेरा पर्दानशीं होना !है तीर-ए-नीमकश इसको जिगर के…"
Jul 1
Samar kabeer commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,आप ओबीओ के पुराने सदस्य होने के नाते ये बात अच्छी तरह जानते हैं कि इतनी मुख़्तसर टिप्पणी देना ओबीओ की परिपाटी नहीं है,उम्मीद है आप मेरी बात पर ध्यान अवश्य देंगे ।"
Jul 1
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rakshita Singh's blog post जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)
"हार्दिक बधाई .."
Jul 1

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Female
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Noida
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Ujhani
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About me
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At 10:25pm on June 20, 2018, SudhenduOjha said…

आदरणीया सुश्री रक्षिता सिंह जी, नमस्कार। रचना आपको पसंद आई, धन्यवाद....

Rakshita Singh's Blog

विरह गीत

अश्रु भरे नैन,
नाहीं आवे मोहे चैन
कैसे कटें दिन रैन,
इस विरहा की मारी के...

मन में समायो है,
ये जसुदा को जायो
कोई ले चलो री गाम मोहे,
कृष्ण मुरारी के...

कर गयो टोना,
नंनबाबा को ये छोना
देख सांवरो सलौना,
गाऊँ गीत मल्हारी के...

व्याकुल सो मन
अकुलाये से नयन
बिन धीरज धरें ना
चितवन को निहारि के...

(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on August 19, 2018 at 8:58pm — 11 Comments

जरा ज़ुल्फें हटाओ....(ग़ज़ल)

जरा ज़ुल्फें हटाओ चाँद का दीदार मैं कर लूँ !

बस्ल की रात है तुमसे जरा सा प्यार मैं कर लूँ !!



बड़ी शोखी लिए बैठा हूँ यूँ तो अपने दामन में !

इजाजत हो अगरतो इनको हदके पार मैंकरलूँ!!



मुआलिज है तू दर्दे दिल का ये अग़यार कहते हैं!

हरीमे यार में खुद को जरा बीमार मैं कर लूँ !!



यूँ ही बैठे रहें इकदूजे के आगोश में शबभर !

जमाना देख ना पाये कोई दीवार मैं कर लूँ !!



तुझे लेकर के बाहों में लब-ए-शीरीं को मैं चूमूँ !

कि होके बेगरज़ अब इकनहीं…

Continue

Posted on June 28, 2018 at 3:16pm — 11 Comments

आप बीती...

इक आवारा तितली सी मैं

उड़ती फिरती थी सड़कों पे...



दौड़ा करती थी राहों पे

इक चंचल हिरनी के जैसे ...



इक कदम यहाँ इक कदम वहाँ

बेपरवाह घूमा करती थी...



कर उछल कूद ऊँचे वृक्षों के

पत्ते चूमा करती थी...



चलते चलते यूँ ही लब पर

जो गीत मधुर आ जाता था...



बदरंग हवाओं में जैसे

सुख का मंजर छा जाता था...



बीते पल की यादों से फिर

मैं मन ही मन भरमाती थी...



इठलाती थी बलखाती थी

लहराती फिर…

Continue

Posted on June 21, 2018 at 11:30pm — 16 Comments

बेबसी...

तपती धूप,

जर्जर शरीर,

फुटपाथ का किनारा,

बदन पर पसीना,

किसी के आने के इन्तजार में...

पथराई सी आँखें,

घुटनों पर मुँह रखे-

एक टक, एक ही दिशा में देख रही थीं...



- ना जाने कब से?



यूँ तो सामने दो छतरी पड़ी थीं, पर

कड़ी धूप में जल-जल के,

बदन काला पड़ गया था ....



रंग बिरंगे रूमाल -

सजे तो बहुत थे, पर

जिस्म पसीने में लथपथ था....



सफेद बाल,

तजुर्बों की गबाही दे रहे थे....

जिस्म पर लटकती खाल…

Continue

Posted on June 19, 2018 at 6:30am — 11 Comments

 
 
 

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