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Rakshita Singh
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pratibha pande commented on Rakshita Singh's blog post आप बीती...
"बहुत खूब, बढ़िया प्रस्तुति रक्षिता जी बधाई स्वीकार करें"
3 hours ago
Rakshita Singh posted blog posts
3 hours ago
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post आप बीती...
"आदरणीया नीलम जी नमस्कार  आपकी शिर्कत के लिए बहुत बहुत धन्यवाद , आपके द्वारा बताइ त्रुटियों को मैं शीघ्र ही सुधारने का प्रयास करूँगी....कृपया  मार्गदर्शन बनायें  रखे...."
20 hours ago
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post आप बीती...
"आदरणीय श्याम जी नमस्कार    बहुत बहुत धन्यवाद ।"
20 hours ago
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post आप बीती...
"आदरणीय आरिफ जी नमस्कार  आपकी शिर्कत व हौसला अफजाई केलिए बहुत बहुत शुक्रिया ।"
20 hours ago
Neelam Upadhyaya commented on Rakshita Singh's blog post आप बीती...
"आदरणीय रक्षिता सिंह जी, नमस्कार । चंचलता और शोखी से भरी अच्छी कविता की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई।  छोटी छोटी वर्तनी संबन्धी कमियां सुधार  लें - घूमाँ की जगह घूमा,   लव की जगह लब, पाँओं की बजाय पाँवों,  जुवाँ की बजाये जुबाँ,…"
20 hours ago
Shyam Narain Verma commented on Rakshita Singh's blog post आप बीती...
"बहुत उम्दा ... बहुत बहुत बधाई   सादर "
22 hours ago
Mohammed Arif commented on Rakshita Singh's blog post आप बीती...
"आदरणीया रक्षिता सिंह जी आदाब,                               शोख-चंचल, स्वच्छंद अदाओं का अच्छा चित्रण । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
22 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Rakshita Singh's blog post बेबसी...
"बहुत ही खूब भावों से भरी हुई रचना में लिए बधाई आदरणीया..."
yesterday
Rakshita Singh posted blog posts
yesterday
SudhenduOjha left a comment for Rakshita Singh
"आदरणीया सुश्री रक्षिता सिंह जी, नमस्कार। रचना आपको पसंद आई, धन्यवाद...."
Wednesday
Mahendra Kumar commented on Rakshita Singh's blog post बेबसी...
"अच्छी कविता है आदरणीया रक्षिता जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। कृपया आदरणीय समर कबीर सर की बातों का संज्ञान लें। सादर। "
Wednesday
Neelam Upadhyaya commented on Rakshita Singh's blog post बेबसी...
"आदरणीय रक्षिता जी, नमस्कार।  बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना है । प्रस्तुति के लिए बधाई ।  "
Wednesday
Samar kabeer commented on Rakshita Singh's blog post बेबसी...
"मोहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,अच्छी कविता है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । 'किसी के आने का इन्तिज़ार में' इस पंक्ति में 'का' को "के" कर लें । 'तजुर्बों की गबाही दे रहे थे' इस पंक्ति में…"
Wednesday
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post बेबसी...
"आदरणीय तस्दीक़ जी नमस्कार,  आपकी शिर्कत व हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।"
Tuesday
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post तुम्हारे स्पर्श से....
"आदरणीय तस्दीक़ जी नमस्कार ,रचना पर आपकी शिर्कत के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।"
Tuesday

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At 10:25pm on June 20, 2018, SudhenduOjha said…

आदरणीया सुश्री रक्षिता सिंह जी, नमस्कार। रचना आपको पसंद आई, धन्यवाद....

Rakshita Singh's Blog

आप बीती...

इक आवारा तितली सी मैं

उड़ती फिरती थी सड़कों पे...



दौड़ा करती थी राहों पे

इक चंचल हिरनी के जैसे ...



इक कदम यहाँ इक कदम वहाँ

बेपरवाह घूमा करती थी...



कर उछल कूद ऊँचे वृक्षों के

पत्ते चूमा करती थी...



चलते चलते यूँ ही लब पर

जो गीत मधुर आ जाता था...



बदरंग हवाओं में जैसे

सुख का मंजर छा जाता था...



बीते पल की यादों से फिर

मैं मन ही मन भरमाती थी...



इठलाती थी बलखाती थी

लहराती फिर…

Continue

Posted on June 21, 2018 at 11:30pm — 7 Comments

बेबसी...

तपती धूप,

जर्जर शरीर,

फुटपाथ का किनारा,

बदन पर पसीना,

किसी के आने के इन्तजार में...

पथराई सी आँखें,

घुटनों पर मुँह रखे-

एक टक, एक ही दिशा में देख रही थीं...



- ना जाने कब से?



यूँ तो सामने दो छतरी पड़ी थीं, पर

कड़ी धूप में जल-जल के,

बदन काला पड़ गया था ....



रंग बिरंगे रूमाल -

सजे तो बहुत थे, पर

जिस्म पसीने में लथपथ था....



सफेद बाल,

तजुर्बों की गबाही दे रहे थे....

जिस्म पर लटकती खाल…

Continue

Posted on June 19, 2018 at 6:30am — 11 Comments

तुम्हारे स्पर्श से....

मैं संग चल दी उनके,

मेरा मन यहीं रह गया...

उन्होंने दिखाये होंगे हजारों ख्वाब,

पर इन आँखों में रौशनी कहाँ थी !!

कितने ही गीत सुनाये होंगे उन्होंने,

पर इन कानों के पट तो बंद हो चुके थे !!

उनके सबालों का,

जबाब भी ना दे पायी थी मैं....

क्योंकी इन होठों पे, तुम्हारा ही नाम रखा था!!

कितना आक्रोश था उनके ह्रदय में,

जब उन्होंने,

मेरे केशों को पकड़कर खींचा था...

और मैं पत्थर सी हो गयी थी,

किसी भी आघात की पीड़ा ना हुई…

Continue

Posted on June 15, 2018 at 5:12pm — 11 Comments

क्या वो लौटा सकता था ?

बड़े ही तैश में आकर'

उसने मेरे खत लौटा दिये...



वो अँगूठी !



वो अँगूठी भी उतार फेंकी-

जिसे आजीवन,

पास रखने का वादा किया था उसने!



कभी ईश्वर को साक्षी मानकर-

एक काला धागा,

पहनाया था उसने मुझे-



"अब तुम मेरी हो चुकी हो "

फिर ये कहकर,

बाहों मे भर लिया था...



आज,फर्श पर कुछ मोती-

औंधे पड़े हैं....

उस काले धागे के साथ !



एक तस्वीर थी जो,

साथ में -

आज उसे भी,

माँग बैठा था…

Continue

Posted on June 11, 2018 at 7:45am — 12 Comments

 
 
 

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