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ख्वाब कोई तो मचलना चाहिए

मापनी - 2122 2122 2122 212



जिन्दगी में ख्वाब कोई तो मचलना चाहिए

गर लगी ठोकर तो’ क्या, फिर से सँभलना चाहिए



सीखना ही जिन्दगी है उम्र का बंधन कहाँ

लोग बदलें या न बदलें, खुद बदलना चाहिए…



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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 16, 2018 at 9:30am — 12 Comments

आ भी जा चितचोर

उमड़-घुमड़ बदरा नभ छाये,

नाचें वन में मोर.

बाट जोहते भीगीं अँखियाँ,    

आ भी जा चितचोर.

 

तेज हवा के झोंके आकर,

खोल गए खिड़की.

तभी कडकती बिजली ने भी,…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 14, 2018 at 8:44pm — 10 Comments

'स्वावलंबन, भारतीयता या आज़ादी' (लघुकथा)

अपने इस मुकाम पर वह अब अपनी डायरी और फोटो-एलबम के पन्ने पलट कर आत्मावलोकन कर रही थी।

"सांस्कृतिक परंपरागत रस्म-ओ-रिवाज़ों को निबाहती हुई मैं सलवार-कुर्ते-दुपट्टे से जींस-टॉप के फैशन की चपेट में आई और फिर आधुनिक कसी पोशाकों को अपनाती हुई वाटर-पार्क व स्वीमिंगपूलों के लुत्फ़ लेती हुई अत्याधुनिक स्वीमिंग सूट तक पहुंच ही गई!" तारीख़ों पर नज़रें दौड़ाती हुई एक आह सी भरती हुई उसने अपनी आपबीती पर ग़ौर फ़रमाते हुए अपने आप से कहा - "ओह, धन-दौलत और नाम कमाने की लालच में फैशनों का अंधानुकरण…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 14, 2018 at 7:27pm — 8 Comments

घाव समय के

अस्तित्व की शाखाओं पर बैठे

अनगिन घाव

जो वास्तव में भरे नहीं

समय को बहकाते रहे

पपड़ी के पीछे थे हरे

आए-गए रिसते रहे 



कोई बात, कोई गीत, कोई मीत

या…

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Added by vijay nikore on July 14, 2018 at 5:36pm — 22 Comments

हार ....

हार ....

ज़ख्म की
हर टीस पर
उनके अक्स
उभर आते हैं
लम्हे
कुछ ज़हन में
अंगार बन जाते हैं
उन्स में बीती रातें
भला कौन भूल पाता है
ख़ुशनसीब होते हैं वो
जो
बाज़ी जीत के भी
हार जाते हैं

उन्स=मोहब्बत

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 13, 2018 at 6:41pm — 13 Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212

इन्साफ का हिसाब लगाया करे कोई।

होता कहीं तलाक़ हलाला करे कोई।।

उनको तो अपने वोट से मतलब था दोस्तों ।

जिन्दा रखे कोई भी या मारा करे कोई।।

मजहब को नोच नोच के बाबा वो खा गया ।

बगुला भगत के भेष में धोका करे कोई ।।

लूटी गई हैं ख़ूब गरीबों की झोलियाँ ।

हम से न दूर और निवाला करे कोई ।।

सत्ता में बैठ कर वो बहुत माल खा रहा ।

यह बात भी कहीं तो उछाला करे कोई ।।

आ जाइये हुजूर जरा अब ज़मीन…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 13, 2018 at 2:20pm — 15 Comments

ग़ज़ल --- ख़ुद-परस्ती का दायरा क्या था / दिनेश कुमार

2122---1212---22

ख़ुद-परस्ती का दायरा क्या था

मैं ही मैं था, मेरे सिवा क्या था

.

झूठ बोला तो बच गई गरदन

हक़-बयानी का फ़ाएदा क्या था

.

चाह मंज़िल की थी निगाहों में

ठोकरें क्या थीं आबला क्या था

.

पर निकलते ही थे उड़े ताइर !

ये रिवायत थी, सानेहा क्या था

.

दर्द, ग़ुस्सा, मलाल, मजबूरी

आख़िर उस चश्मे-तर में क्या क्या था

.

क्यों मैं बर्बादियों का सोग करूँ

जब मैं आया, यहाँ मेरा क्या…

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Added by दिनेश कुमार on July 13, 2018 at 12:30am — 14 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास

2122 2122 2122 212

तोड़ डाला खुद को तेरी आशिकी के रोग में नहीं

तुम नहीं लिक्खे थे मेरी कुंडली के योग में

अब तेरी तस्वीर दिल से मिट गई है इस तरह

जैसे ईश्वर को भुला डाले कोई भवरोग में

तेरे ग़म की,इश्क़ की मूरत थी मुझमें,ढह गई

आ नहीं सकती ये मिट्टी अब किसी उपयोग में

मिल गया,कुछ खो गया, कुछ मिलके भी खोया रहा

साथ थी तक़दीर भी जीवन के हर संयोग में

चैन तेरे इश्क़ के बिन मिल नही पाया कहीं

तेरे ग़म में जो…

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Added by मनोज अहसास on July 12, 2018 at 10:30pm — 13 Comments

कुछ कही कुछ अनकही है

गजल २१२२ २१२२ 
बात जो मन में तही है
कुछ कही कुछ अनकही है
भार ढोती है जगत का
तब धरा यह पुज रही है…
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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 12, 2018 at 3:57pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये (ग़ज़ल राज)

बेसबब बेसाख़्ता रफ़्तार है कुछ कीजिये 

लड़खड़ाती जिंदगी हर बार है कुछ कीजिये 



उठ रही हैं उँगलियाँ सब आपके घर की तरफ़ 

हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये 



वक्त आते ही डसेगा एक दिन वो आपको 

आस्तीं में पल रहा मक्कार है कुछ कीजिये 



आपके घर की तरफ़ से आ रहे पत्थर सभी 

आपके घर में छुपा गद्दार है कुछ कीजिये 



इस तरह तो मुफ़्लिसी दम तोड़ देगी भूख से 

आसमां को छू रहा बाज़ार है कुछ कीजिये



हैं मुखालिफ़ कुछ हवायें हो रही कमजोर…

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Added by rajesh kumari on July 11, 2018 at 9:57pm — 32 Comments

जनाब निलेश 'नूर' की ज़मीन में ग़ज़ल नम्बर 2 (कुछ नये क़वाफ़ी के साथ)

मैं तो उसकी पे ब पे अंगड़ाइयाँ गिनता रहा

और वो दामन की मेरे धज्जियाँ गिनता रहा

सौ गुनह होते ही पूरे मारना था इसलिये

मैं भी इक शिशुपाल की बदकारियाँ गिनता रहा

मेरे सीने पर सितम की मश्क़ वो करते रहे

और मैं मासूम दिल की किर्चियाँ गिनता रहा

काम जब कुछ भी नहीं था ओबीओ पर दोस्तो

'नूर' साहिब की मैं कूड़ेदानियाँ गिनता रहा

मेरी बर्बादी पे ख़ुश होकर अज़ीज़ों ने "समर"

कितनी…

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Added by Samar kabeer on July 11, 2018 at 10:00am — 31 Comments

अनावरण या आडंबर [लघु कथा]

तड़के सुबह से ही रिश्तेदारों का आगमन हो रहा था.आज निशा की माँ कमला की पुण्यतिथि थी. फैक्ट्री के मुख्यद्वार से लेकर अंदर तक सजावट की गई थी.कुछ समय पश्चात मूर्ति का कमला के पति,महेश के हाथो अनावरण किया गया.

कमला की मूर्ति को सोने के जेवरों से सजाया गया था.एकत्र हुए रिश्तेदार समाज के लोग मूर्ति देख विस्मय से तारीफ़ महेश से किये जा रहे थे. …

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Added by babitagupta on July 10, 2018 at 8:00pm — 7 Comments

तेरी-मेरी कहाँ सियासत ?

जुमले बाजी का नाम सियासत |

मक्कारों का काम सियासत |

जाति,धर्म पर लड़वाने में

सबसे आगे आज सियासत |

रोजगार के ख्वाब  दिखाकर

लूटे सरे आम  सियासत |

घोटालों में लिप्त है नेता

बेमानी का नाम सियासत |

बेटियों की लुटती  आबरू

चुप बैठी है  आज सियासत |

 लाज-शर्म को गिरवी रखकर

करती नंगा नाच सियासत |

भाई-भतीजावाद है हावी

तेरी-मेरी कहाँ सियासत ?

"मौलिक एवं…

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Added by Naval Kishor Soni on July 10, 2018 at 5:00pm — 11 Comments

हाइकू

न कर जिक्र

जब तक है जान

काहे की फिक्र

 

मन अंतस

जजवातों से भरा

पर अकेला

 

धरते धीर

शिखर पहुँचते

बैसाखी पर

  

क्या पा लिया था

ये तब जाना, जब

उसे खो दिया

खुशी ही नहीं

तल्खियाँ भी देती हैं

तनहाईयाँ

 

… मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on July 10, 2018 at 4:00pm — 17 Comments

निकम्मा - लघुकथा –

निकम्मा - लघुकथा –

 धर्मचंद जी शिक्षा विभाग से रिटायर अधीक्षक थे। चार बेटे थे। सभी पढ़े लिखे थे। सबसे बड़ा डाक्टर था जो अमेरिका में बस गया था। दूसरा इंजीनियर आस्ट्रेलिया में था। तीसरा दिल्ली में प्रोफ़ेसर था। चौथा बेटा भी पूर्ण रूप से शिक्षित था। जॉब भी मिल रहे थे मगर दूसरे शहरों में। लेकिन वह माँ बापू को अकेले छोड़ने के पक्ष में नहीं था।अतः वह इसी प्रयास में था कि उसे अपने ही शहर में नौकरी मिले।लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंततः उसने पिता की सलाह पर मकान के बाहरी हिस्से में एक मेडीकल स्टोर खोल…

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Added by TEJ VEER SINGH on July 10, 2018 at 1:21pm — 15 Comments

ग़ज़ल

मुहब्बत में हमीं मुजरिम हैं हम ये मान लेते हैं

चलो अब तुम कहो तुमसे तुम्हारी जान लेते हैं



ज़रा हम भी तो देखें धार उन क़ातिल निगाहों की

सुना है वो इसी ख़ंजर से सबकी जान लेते हैं



जो फिर देखो उन्हें तो वो जुदा लगते हैं पहले से

कहें कैसे कि हम उनको सही पहचान लेते हैं



कभी गुस्सा कभी आँसू कभी फिर रूठना उनका

वो कितने इम्तिहाँ मुझसे मेरे भगवान लेते हैं



तो फिर दुनिया क्या इस दुनिया का रखवाला भी झुकता है

मुहब्बत करने वाले भी अगर ज़िद ठान… Continue

Added by Alok Rawat on July 9, 2018 at 6:54pm — 20 Comments

माँ   ....

माँ   .... 

बताओ न

तुम कहाँ हो

माँ

दीवारों में

स्याह रातों में

अकेली बातों में

आंसूओं के

प्रपातों में

बताओं न

आखिर

तुम कहाँ हो

माँ

मेरे जिस्म पर ज़िंदा

तुम्हारे स्पर्शों में

आँगन में गूंजती

आवाज़ों में

तुम्हारी डाँट में छुपे

प्यार में

बताओं न

आखिर

तुम कहाँ हो

माँ

बुझे चूल्हे के पास

या

रंभाती गाय के पास

पानी के मटके के पास…

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Added by Sushil Sarna on July 9, 2018 at 5:33pm — 11 Comments

'दो सितारों का मिलन' (लघुकथा)

"हैलो! आदाब! ठीक तो हैं न! कहां तक पहुंच गईं आप? ज़रा अपनी घड़ी साहिबा पर भी इक नज़र तो डालियेगा!" शायर 'राज़' साहिब ने साहित्यिक सम्मेलन परिसर के मुख्य द्वार पर अगली सिगरेट का अगला लम्बा कश लेते हुए मोबाइल फ़ोन पर एक बार में ये सवाल दाग़ दिये!



"आदाब राज़ साहिब! मैं वहीं हूं अपनी क़लम संग, जहां मुझे इस वक़्त होना चाहिए!" दूसरी तरफ़ से चिर-परिचित सुरीली आवाज़ में सोशल मीडिया की आभासी सहेली शायरा शबाना ने आश्चर्य-मिश्रित लहज़े में कहा - "माना कि आप घड़ी नहीं पहनते, लेकिन अपने मोबाइल पर मेरे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 8, 2018 at 9:19pm — 6 Comments

सदा बिखरी रहे ये हंसी..

हँसमुखी चेहरे पर ये कोलगेट की मुस्कान,

बिखरी रहे ये हँसी,दमकता रहे हमेशा चेहरा,

दामन तेरा खुशियों से भरा रहे,

सपनों की दुनियां आबाद बनी रहे,

हँसती हुई आँखें कभी नम न पड़े,

कालजयी जमाना कभी आँख मिचौली न खेले,…

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Added by babitagupta on July 8, 2018 at 5:00pm — 9 Comments

जिंदगी की उधेड़बुन (लघुकथा )

सुबह आठ बजे से उसका साईकल इस एवन्यु में घूम रहा था । उसके भोंपू की आवाज़ एवन्यु के हर कोने तक पहुंच चुकी थी।

मगर न कोठी से कोई भी औरत न ही माँ के साथ बच्चा बाहर आया। उसके साईकल पर लगे बड़े, छोटे गुबारे, छोटी बड़ी कार या कोई बजाने वाले खिलौने सभी उस की तरफ झाक रहे थे । दो घंटे हो गए थे इस एवन्यु दाखल हुए। साईकल की रफ्तार भी धीमी हो चली थी। चेहरा उदास और आँखों में नमी बढने लगी अचानक ही उस ने इक कोठी के आगे साईकल आ लगाई, इक बार बेल्ल बजाई कोई जवाब नहीं आया। उसने फिर बेल्ल बजाई। थोड़ी देर बाद…

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Added by Mohan Begowal on July 8, 2018 at 1:00pm — 5 Comments

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