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एक ग़ज़ल मनोज अहसास

2122 2122 2122 212

तोड़ डाला खुद को तेरी आशिकी के रोग में नहीं
तुम नहीं लिक्खे थे मेरी कुंडली के योग में

अब तेरी तस्वीर दिल से मिट गई है इस तरह
जैसे ईश्वर को भुला डाले कोई भवरोग में

तेरे ग़म की,इश्क़ की मूरत थी मुझमें,ढह गई
आ नहीं सकती ये मिट्टी अब किसी उपयोग में

मिल गया,कुछ खो गया, कुछ मिलके भी खोया रहा
साथ थी तक़दीर भी जीवन के हर संयोग में

चैन तेरे इश्क़ के बिन मिल नही पाया कहीं
तेरे ग़म में जो असर है योग में ना भोग में

अब किसे जाकर सुनाऊँ दर्द के ये तर्जुमा
तन्हा शाइर जल रहा है बेबसी में ,सोग में

ये समझ आता नही अपनो में बेगाना है कौन
मतलबी शर्तें जुड़ी है हर किसी सहयोग में

कर भला,होगा भला,अच्छा तू कर अच्छा मिले
ज़िन्दगी बेकार हो जाती है इस प्रयोग में

मौलिके और अप्रकाशित

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Comment by gumnaam pithoragarhi on Thursday

अच्छी  ग़ज़ल हुई है भाई जी बधाई.. .. .. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Thursday

आ. भाई मनोज जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाइ।

Comment by Manoj kumar Ahsaas on Tuesday

आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया

सादर

Comment by Manoj kumar Ahsaas on Tuesday

ग़ज़ल पर अपनी महत्वपूर्ण इस्लाह के लिए आदरणीय समर कबीर साहब का हार्दिक आभार

सादर

Comment by vijay nikore on Tuesday

अच्छी गज़ल के लिए बधाई

Comment by Ajay Kumar Sharma on July 15, 2018 at 8:28am

बहुत सुन्दर रचना.

बधाई स्वीकार करें..

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 14, 2018 at 8:46pm

वाह लाजबाब गजल, साथ में शानदार समीक्षा भी , वाह , बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 13, 2018 at 6:03pm

वाह बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय..बेहतरीन

Comment by Gurpreet Singh on July 13, 2018 at 4:13pm

बहुत खूब आदरणीय मनोज अहसास जी ,, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही आपने

Comment by Neelam Upadhyaya on July 13, 2018 at 3:47pm

 आदरणीय  मनोज कुमार जी, बढ़िया  ग़ज़ल की पेशकश के लिए बधाई स्वीकार करें  ।  

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