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एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए

2122    2122    2122   212

एक ताज़ा ग़ज़ल

जो भी जग में साथ हैं सब छूट जाने के लिए
क्यों हो तेरा ज़िक्र फिर दिल को दुखाने के लिए

दिल्लगी में शायद तेरी रह गई थी कुछ कमी
भेजा है क़ासिद को मेरा हाल पाने के लिए

इसलिए महसूस तेरी बेरुखी होती नहीं
मुझमें कुछ बाकी नहीं तुझको सुनाने के लिए

रात गहरी कट गई फिर भी न पाई रोशनी
आ गई बरसात मेरा दिल जलाने के लिए

आज कल मायूस होकर घूमता हूं दर बदर
इक खिलौना बन गया हूँ मैं जमाने के लिए

कोई सपना भी नजर में देर तक ठहरा नहीं
कुछ छुपाने के लिए थे कुछ बहाने के लिए

हर दफा खोटा ही निकला जौहरियों की जांच में
आप भी आए थे मुझको आजमाने के लिए

हौसलों की हो हिफाज़त इश्क की परवाह में
जिंदा भी रहना है हमको घर चलाने के लिए

कितना सन्नाटा खुला है इस अंधेरी रात में
शेर कोई चाहिए तुझको सुनाने के लिए

बस तेरा अहसास मुझ में देर तक ठहरा रहा
या तू ही हासिल है मुझको भूल जाने के लिए

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on December 3, 2018 at 8:43am

समस्त मित्रों को हार्दिक आभार,सादर

आदरणीय कबीर साहब आपकी बेशकीमती इस्लाह का हार्दिक शुक्रिया

सदैव कृपा बनाये रक्खे

सादर

Comment by Samar kabeer on December 1, 2018 at 11:29am

जनाब मनोज अहसास साहिब आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'  दिल्लगी में शायद तेरी रह गई थी कुछ कमी '

ये मिसरा लय में नहीं है,इसे यूँ कर सकते हैं:-

'दिल्लगी में तेरी शायद रह गई थी कुछ कमी'

'  कोई सपना भी नजर में देर तक ठहरा नहीं
कुछ छुपाने के लिए थे कुछ बहाने के लिए'

इस शैर में शुतरगुरबा देखें,ऊला में 'सपना' एक वचन सनी में बहुवचन,ऊला मिसरा यूँ कर सकते हैं:-

'आँख में सपने भी मेरी देर तक ठहरे नहीं'

Comment by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 10:55am

आदरणीय मनोज कुमार जी आदाब, ग़ज़ल की सुन्दर प्रस्तुति के लिए दाद के साथ मुबारकबाद. सादर. 

Comment by narendrasinh chauhan on November 30, 2018 at 4:11pm

खूब सुंदर रचना 

Comment by Mohammed Arif on November 30, 2018 at 1:11pm

आदरणीय मनोज कुमार जी आदाब,

                     बहुत दिनोंं बाद आपकी कोई ग़ज़ल पढ़ रहा हूँ, पढ़कर अच्छा लगा । शे'र दर शे'र दाल के साथ दिली मुबारकबाद कुबूल करें । बाक़ी उस्ताद शाइर अपनी राय देंगे , इंतज़ार कीजिए ।

कृपया ध्यान दे...

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