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प्रजातंत्र(लघुकथा)



'एक सेठ के पाँच पुत्र थे, दो खूब पढ़े-लिखे,एक कुछ-कुछ पढ़ा हुआ और शेष दो के लिए काला अक्षर भैंस बराबर था।सेठ के मरते समय की बात के अनुसार घर की मिल्कियत(मालिकाना हक) साल भर के लिए पाँचों भाइयों में से सर्वसम्मति से या बहुमत से चुने हुए एक भाई को सौंप दी जाती।वह घर का कामकाज देखता,अपने हिसाब से विभिन्न मदों में धन खर्च करता।कभी पहला पढ़ा-लिखा भाई मालिक होता,तो कभी दूसरा।बीच-बीच में तीसरा कम पढ़ा लिखा भी मालिक बन जाता,अन्य दो अँगूठाछाप भाइयों की मदद से।पर उसकी कुछ चल नहीं पाती।ढुलमुल रवैये…

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Added by Manan Kumar singh on July 8, 2018 at 8:30am — 6 Comments

आप पर किस की मिह्ऱबानी है

फाइलातुन _मफाइलुन_फेलुन)



आप पर किस की मिह्ऱबानी है ,

हर ग़ज़ल में जो ये रवानी है !!

ये ग़ज़ल उसके नाम करता हूँ

शायरी जिसकी मेहरबानी है

शायरी में नहीं है कुछ मेरा

हर ग़ज़ल यार की निशानी है

आप को छोड़ कर कहाँ जाएँ ,

आप के साथ ज़िन्दगानी है !!

आप मक्ते में साथ होते हो ,

हर ग़ज़ल आप की निशानी है !!

प्यार के ही तो सारे किस्से हैं

प्यार की ही तो हर कहानी है

उसको भी…

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Added by राज लाली बटाला on July 8, 2018 at 8:30am — 7 Comments

ग़ज़ल

(2122-2122-2122-212)

मुश्किलें कितनी हैं अपने दरमियाँ गिनता रहा ।

बैठ कर मैं राह की दुश्वारियाँ गिनता रहा ।

आँखों में अश्कों का दरिया चढ़ के जब उतरा तो फ़िर,

मैं तो बस ख़्वाबों की डूबी कश्तियाँ गिनता रहा ।

और करता भी तो क्या वो नौजवां बेरोज़गार,

दी हैं कितनी नौकरी कीअरज़ियाँ गिनता रहा ।

राजनेता को न था मतलब किसी इंसान से,

वो तो केवल धोतियाँ और टोपियाँ गिनता रहा ।

वो रहे गिनते मुनाफ़ा कारख़ाने का उधर,…

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Added by Gurpreet Singh jammu on July 8, 2018 at 7:50am — 18 Comments

"मानसून की पहली बारिश का मज़ा" (लघुकथा - हास्य व्यंग्य)

मौसम विभाग ने तो मई के अंतिम सप्ताह में ही सम्भावना व्यक्त कर दी थी कि इस साल औसत से कहीं अधिक बारिश होगी । सभी लोग इस खबर को पढ़ कर खुश भी थे ।   कल रात से ही मानसून का सिस्टम सक्रिय हो गया । बहुत तेज़ गरज के साथ बादलों की आवाजाही होने लगी। 

 एक दम काली घटा ने सारे आसमान पर जैसे क़ब्ज़ा जमा लिया हो। रात से ही मूसलाधार बारिश हो रही थी।   सौरभ जैसे ही सुबह दस बजे घर से आफिस के लिए कार में जैसे ही बैठा , श्रुति बारिश में भीगती आईं , कार के…
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Added by MUZAFFAR IQBAL SIDDIQUI on July 7, 2018 at 11:30pm — 9 Comments

'गुड टाइम, बैड टाइम' (लघुकथा)

"अब तो बता दो कि 'गुड टेररिज़्म (आतंकवाद)' और 'बैड टेररिज़्म' में वाक़ई क्या फ़र्क है?" एक धर्मावलंबी ने कहा।



"वही फ़र्क है न, जो इंसां की ज़िन्दगी में 'गुड टाइम' और 'बैड टाइम' में है; जो 'गुड ह्यूमन' और 'बैड ह्यूमन' के बीच में है!" दूसरे ने जवाब दिया।



"जी नहीं, अंतर वही है, जो 'गुड ह्यूमन' के 'बैड टाइम' और 'बैड ह्यूमन' के 'गुड टाइम' के बीच में है!" एक हारे हुए परेशां शिक्षित बेरोज़गार ने अपनी पथराई आंखों से दो बूंदे टपकाते हुए कहा - "नासमझी या दुर्भाग्य से 'गुड टाइम' किसी…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 7, 2018 at 6:30pm — 2 Comments

चन्दन सा महका कर मन को बरसे काले मेह

चन्दन सा महका कर मन को बरसे काले मेह

 

चन्दन सा महका कर मन को

बरसे काले मेह

बूँद-बूँद में व्यथा समेटे

दहके कोई देह

 

हर आहट के धोखे ने

मुझको तहस-नहस कर डाला

सूनी वेदी पर खड़ी रही मैं

लिए हाथ में वर की माला

आएगा कि नहीं? हृदय में

उठते सौ संदेह

 

चन्दन सा महका कर मन को

बरसे काले मेह

बूँद-बूँद में व्यथा समेटे

दहके कोई देह

 

प्यास प्रेम की वो पहचाने

जो…

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Added by SudhenduOjha on July 7, 2018 at 3:08pm — No Comments

ग़ज़ल

   

चाहा ये दिल तेरा पाना हम को।
महका के राहों को जाना हम को।

कहते कोई तो अफ़साना हम भी,
कैसे बुनता ताना बाना हम को।

आये जाये मिलकर बैठे बिछड़ें,
कहना जो भी होता पाना हम को।

कैसा होगा अब ये हम का जीना,
जब राहों इन आना जाना हम को।

औरत बन के तुझको भी आना होगा,
क्यूँ होता इलजाम निभाना हम को।

  1. मौलिक व अप्रकाशित

Added by Mohan Begowal on July 7, 2018 at 3:07pm — 8 Comments

न कोई तिश्नगी होती न कोई हादसा होता

1222 1222 1222 1222



यहां इंसानियत से गर सभी का राबिता होता ।।

यकीनन मुल्क का यह सर नहीं झुकता मिला होता ।।1

मुहब्बत के उसूलों को अगर उसने पढ़ा होता ।

न कोई तिश्नगी होती न कोई हादसा होता ।।2

बहुत बेचैन दरिया की उसे पहचान है शायद ।

वग़रना वह समंदर तो नदी को ढूढ़ता होता ।।3

तुम्हारी शर्त को हम मान लेते बेसबब यारों।

हमें अंजामे रुसवाई अगर इतना पता होता ।।4

सियासत दां…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 7, 2018 at 2:00pm — 13 Comments

होती नहीं  है भोर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ २१२१ २२२  १२१२



कहते  नहीं  हैं  आपसे  रस्ता  सुझाइये

राहों में  यूँ  न   देश  की  रोड़ा लगाइये।१।



आता है भेड़िया तो कुछ हरकत दिखाइये

कमजोर गर  ये  हाथ  हैं  हल्ला  मचाइये।२।



कहते हो दूसरों की  है  सूरत अगर मगर

खुद को भी रोशनी में ये दर्पण दिखाइये।३।



होती नहीं  है भोर इक सूरज उगे से ही

गर देखनी हो भोर तो खुद को जगाइये।४।



बातों को दिल की रोज  ही ऐ …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 7, 2018 at 12:00pm — 13 Comments

आग़ोश -ए-जवानी ...

आग़ोश -ए-जवानी ...


न, न
रहने दो
कुछ न कहो
ख़ामोश रहो
मैं
तुम्हारी ख़ामोशी में
तुम्हें सुन सकता हूँ
तुम
एक अथाह और
शांत सागर हो
मैं
चाहतों का सफ़ीना हूँ
इसे अल्फाज़ की मौजों पर
रवानी दे दो
मेरे वज़ूद को
आग़ोश -ए-जवानी दे दो

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 6, 2018 at 12:00pm — 6 Comments

'समय तू ढर्रे-ढर्रे मत चल' (लघुकथा)

"मैं ... मैं समय हूँ!"



"चुप कर यह "मैं .. मैं" ! मालूम है कि तू समय है और इस सृष्टि का सब कुछ मय समय है तय समय में!" विज्ञान और तकनीक ने एक स्वर में व्यंग्य किया।



"लेकिन तू कितनी भी फुर्ती से कहीं से भी फिसल ले, तुझे अपनी हथेली में किसी कठपुतली की तरह नचा सकते हैं हम, भले मुट्ठी में तुझे क़ैद न कर सकें, समझे!" 'तकनीक' ने 'विज्ञान' के कंधों पर टांगें पसारते हुए आगे की तरफ़ क़दमताल कर अपनी हथेली दिखा कर पलटाते हुए कहा।



"इतने आत्ममुग्ध मत हो! जीत-हार,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 6, 2018 at 9:59am — 5 Comments

अमानत (लघुकथा)

जमींदार रामलोचन की आर्थिक स्थिति उस स्तर पर पहुंच गई थी जहाँ कहा जाता है कि हाथी बिक गया जंजीर ढ़ो रहे हैं।

उधर गाँव के टेलर का लड़का हाथी खरीदने को आतुर था। तीनों पहर के भोजन की निश्चिंतता न थी, लेकिन बंगलौर के किसी फैशन संस्थान में नामांकन के लिए इंटरव्यू दे आया था । वहाँ फीस की रकम सुनकर ही समझ गया था ये रकम सीधे तरीके से वह हफ्ते भर में नहीं जुटा सकता ।

घर लौटने के रास्ते में उसने हर सीधे टेढ़े तरीके से सोचा तब उसे लगा जमींदार के घर में ही उसकी मंशा पूरी हो सकती है, वरना गाँव में…

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Added by Kumar Gourav on July 6, 2018 at 8:00am — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
पाँच दोहे (गणेश जी बाग़ी)

हाथ लगा जो गाल पर, पटकेंगे धर केश ।
दुनिया संग बदल रहा, गाँधी का ये देश।।

नैतिकता का पाठ अब, पढ़े-पढ़ाये कौन ?
मात-पिता-बच्चे सभी, ले मोबाइल मौन।।

'तुम' धन 'मैं' जब 'हम' हुए, दोनों हुए विशेष।
'हम' ऋण 'तुम' जैसे हुए, नहीं बचा अवशेष ।।

रीति जहां की देख कर, मन चंचल, मुख मौन।
मतलब के सधते सभी, पूछें तुम हो कौन ?

छप कर बिकता था कभी, जिंदा था आचार।
जबसे बिक छपने लगा, मृत लगते अखबार।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 5, 2018 at 9:51pm — 13 Comments

समय बड़ा बलवान - लघुकथा –

समय बड़ा बलवान - लघुकथा –

माँ मरणासन्न स्थिति में चारपाई पर पड़ी थी। संजीव चारपाई के पास बैठा आँसू बहा रहा था।

"क्यों रोये जा रहा है पगले? जाना तो सभी को एक दिन पड़ता ही है"।

"माँ, मैं इसलिये नहीं रो रहा हूँ। मेरे रोने की वज़ह कुछ और है"?

"अरे सब भूल जा अब। मेरा आखिरी वक्त है, खुशी खुशी विदा कर दे”|

"नहीं माँ, मैं जीवन भर सुशीला को माफ़ नहीं कर सकूंगा"?

"ओह, तो तू अपनी घरवाली सुशीला से नाराज है क्योंकि वह तेरे साथ मुझे देखने नहीं आई"?

"माँ, तू बहुत…

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Added by TEJ VEER SINGH on July 5, 2018 at 5:16pm — 16 Comments

जीवन यथार्थ

संवेगों के झंझावात में

बहती रही सारी खुशियाँ

इतनी क्षणिक सिद्ध हुईं

आंसुओं के समंदर

डुबोते चले गए यादों को

इतनी कमजोर निकलीं

खामोशियों के बीच

गुस्से बदल गए नफ़रतों में

इतने अप्रत्याशित थे

आशाएँ और अभिलाषाएं

सिसक रही कहीं

दम तोड़ती सी ज्यों

पर जीवन की जुगुत्सा

जूझना सिखाती परिस्थिति से

सबक का एहसास कराते

सौहर्द्र, प्रेम और संभावनाओं का

निरंतरता, यथार्थता , शाश्वतता

यही जीवन है…

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Added by Neelam Upadhyaya on July 5, 2018 at 3:20pm — 14 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६०

जनाब बशीर बद्र साहब की ग़ज़ल "ख़ुदा मुझको ऐसी ख़ुदाई न दे" की ज़मीन पे लिखी ये ग़ज़ल. 

122 122 122 12



ख़ुदा ग़र तू ग़म से रिहाई न दे

तो साँसों की मीठी दवाई न दे



भले अपनी सारी ख़ुदाई न दे

किसी को भी माँ की जुदाई न दे

मैं मर जाऊँ मिट जाऊँ हो जाऊँ ख़ाक़

मगर मुझको ख़ू ए गदाई न दे



तू रख सब असागिर को दुख से अलग

तू कोई भी…

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Added by राज़ नवादवी on July 5, 2018 at 10:30am — 5 Comments

दिल का साँचा

नींद आँखों से खफा –खफा है /

चली है ठंडी हवा वो याद आ रह है /

लिखा था मौसम किसी कागज़ पे/

टहलती आँख लफ्ज़ फड़फड़ा रहा है /

सिलवटें बिस्तरों पे नहीं सलामत /

दिल का साँचा हुबहू बचा हुआ है/

नक्ल करके नाम तो पा सकता हूँ /

पर मेरा वजूद इसमें क्या है?

वो आज भी रहता है मेरे आसपास /

मेरे बच्चे में मुस्कुरा रहा है |

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अमुद्रित…

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Added by somesh kumar on July 5, 2018 at 7:24am — 5 Comments

रहमत में हरम मागा- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ १२२२ २२१ १२२२



जितना भी सनम माँगा यूँ हमने है कम माँगा

मरने की नहीं हिम्मत जीने का ही दम माँगा।१।



होते ही सवेरा  नित  साया  भी डराता है

घबरा के उजाले से यूँ रात का तम माँगा।२।



सुनते हैं सभी कहते कम अक्ल हमें लेकिन

खुशियों में अकेले थे इस बात से गम माँगा।३।



चौपाल से बढ़ शायद महफूज लगा हो कुछ

ऐसे  ही  नहीं  उसने  रहमत  में  हरम माँगा।४।



ऐसे ही  नहीं  शबनम  पड़  जाती है रातों को

धरती का रह इक कोना…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2018 at 6:30am — 16 Comments

जुआ (लघुकथा)

 ड्यूटी के बाद मैं घर को पैदल चल पड़ा। ऐसा आजकल मैं अकसर ही करता हूँ। क्यूँ कि डाक्टर ने मुझे ज्यादातर पैदल चलने को कहा है। कुछ कदम चलते ही मेरे साथ रिक्शा इक रिक्शा भी चलने लगा।

चलते हुए बार बार रिक्शे वाला रिकशे पर बैठने को कहता रहा।

“बाऊ जी,दस दे देना,मगर मैं चलता रहा, फिर उसने पास आकर कहा,चलो पाँच ही दे देना।"

“अरे भाई, बात पाँच या दस की नहीं, मैंने कहा। मैं बैठना नहीं चाहता।"

मगर इस बार उस के कहने में एक तरला सा लगा, “बाऊ जी, बैठ जाओ न।“

आखिर, मैं रिक्शे…

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Added by Mohan Begowal on July 4, 2018 at 11:30pm — 9 Comments

अकेली ...

अकेली ...

मैं

एक रात

सेज पर

एक से

दो हो गयी

जब

गहन तम में

कंवारी केंचुली

ब्याही हो गयी

छोटा सा लम्हा

हिना से

रंगीन हो गया

मेरी साँसों का

कंवारा रहना

संगीन हो गया

एक अस्तित्व

उदय हुआ

एक विलीन

हो गया

और कोई

मेरे अस्तित्व की

ज़मीन हो गया

अजनबी स्पर्शों की

मैं

सहेली हो गयी

एक जान

दो हुई

एक

अकेली हो गयी

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on July 4, 2018 at 4:48pm — 11 Comments

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