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रहमत में हरम मागा- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ १२२२ २२१ १२२२


जितना भी सनम माँगा यूँ हमने है कम माँगा
मरने की नहीं हिम्मत जीने का ही दम माँगा।१।


होते ही सवेरा  नित  साया  भी डराता है
घबरा के उजाले से यूँ रात का तम माँगा।२।


सुनते हैं सभी कहते कम अक्ल हमें लेकिन
खुशियों में अकेले थे इस बात से गम माँगा।३।


चौपाल से बढ़ शायद महफूज लगा हो कुछ
ऐसे  ही  नहीं  उसने  रहमत  में  हरम माँगा।४।


ऐसे ही  नहीं  शबनम  पड़  जाती है रातों को
धरती का रह इक कोना बीजों ने है नम माँगा।५।


जीवन या मरण इस दर अपनी ये नहीं फितरत
इस बुत से कसम खायी उस बुत से करम माँगा।६।


मजबूर बड़ा उससे है कौन "मुसाफिर" कह
जो मौत के साये  से  जीने  का भरम माँगा ।७।


मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 13, 2018 at 9:35pm

आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by vijay nikore on July 13, 2018 at 10:02am

बहुत ही खूबसूरत गज़ल लिखी है। बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 6, 2018 at 12:14pm

आ. भाई राज नवादवी जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by राज़ नवादवी on July 6, 2018 at 11:33am

जनाब लक्ष्मण धामी जी, आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए बधाई क़ुबूल करें. सादर. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2018 at 7:49pm

आ. भाई गुमनाम जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 5, 2018 at 7:27pm

वाह भाई जी वाह,,,,-&७बहुत खूब,

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2018 at 6:41pm

आ. भाई बृजेंद्र जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2018 at 6:38pm

आ. भाई आरिफ जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2018 at 6:36pm

आ. भाई सुरेंद्र जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार । 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 5, 2018 at 5:54pm

वाह बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..सादर

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