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 ड्यूटी के बाद मैं घर को पैदल चल पड़ा। ऐसा आजकल मैं अकसर ही करता हूँ। क्यूँ कि डाक्टर ने मुझे ज्यादातर पैदल चलने को कहा है। कुछ कदम चलते ही मेरे साथ रिक्शा इक रिक्शा भी चलने लगा।
चलते हुए बार बार रिक्शे वाला रिकशे पर बैठने को कहता रहा।
“बाऊ जी,दस दे देना,मगर मैं चलता रहा, फिर उसने पास आकर कहा,चलो पाँच ही दे देना।"
“अरे भाई, बात पाँच या दस की नहीं, मैंने कहा। मैं बैठना नहीं चाहता।"
मगर इस बार उस के कहने में एक तरला सा लगा, “बाऊ जी, बैठ जाओ न।“
आखिर, मैं रिक्शे पर बैठ कर घर की ओर चल पड़ा।
“बाऊ जी, अब ये तो जुआ है, अगर सवारी मिल गई तो जीत,वरना हार और ये हार कहाँ ले जाए, कुछ पता नहीं।
गेट पर खड़ी बीवी ने पूछा, "ठीक तो हो आप ।"
मैंने जेब से इक नोट निकाल कर उस को दिया।
गेट अंदर जाते हुए, सोच रहा हूँ कि जुआ हार जीत जाने की तरह, क्या रिक्शे वाला भी जीत गया कि हार गया इस खेल में ?

मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 7, 2018 at 11:25pm

बहुत ही उपेक्षित मुद्दे को उभारकर बेहतरीन उम्दा कथानक के साथ बढ़िया विचारोत्तेजक सृजन। हार्दिक बधाई और आभार आदरणीय मोहन बेगोवाल साहिब।

Comment by babitagupta on July 7, 2018 at 8:10pm

रिकशा वाला जीता जरूर लेकिन वास्तव में जीत बाबूजी की हुई।बेहतरीन लघु कथा, हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

Comment by नाथ सोनांचली on July 5, 2018 at 3:41pm

आद0 मोहन बोगोवाल जी सादर अभिवादन। बढ़िया विषय लिया आपने। अक्सर ऐसा होता है कि हमारी हार में भी जीत छुपी होती है। आपकी लघुकथा में शब्दों की कसावट की अभी कमीं है। सुधार के बावजूद आप बार बार पढ़िए और जहाँ त्रुटि लग रही है उसे नोट कीजिये। फिर सुधारिये। बहुत बहुत बधाई आपको। आद0 समर साहब की बातों को गम्भीरता से लीजिएगा।

Comment by Samar kabeer on July 5, 2018 at 2:29pm

'उस पास आकर कहा'

"उसने पास आकर कहा"

'और गेट अंदर जाते'

",गेट से अंदर जाते"

ऐसी कई त्रुटियाँ हैं अभी ।

जहाँ जुमला ख़त्म हो वहाँ फुल स्टॉप, जहाँ प्रश्न है वहाँ प्रश्न वाचक लगायें ,जहाँ पेराग्राफ बदलना है,वहाँ बदलें,ध्यानपूर्वक एक बार और इसे पढ़ें ।

Comment by Mohan Begowal on July 5, 2018 at 12:51pm

   ड्यूटी के बाद मैं घर को पैदल चल पड़ा। ऐसा आजकल मैं अकसर ही करता हूँ। कयूँकि डाक्टर ने मुझे ज्यादातर पैदल चलने को कहा है। कुछ कदम चलते ही मेरे साथ रिक्शा चलने लगा।
चलते हुए बार बार रिक्शे वाला बैठने को कहता।
इस बार उस के कहने में एक तरला कि बाऊ जी बैठ जाओ न । मगर मैं सिर हिला व इशारे के साथ न कर दी।
“बाऊ जी,दस दे देना,मगर मैं चलता रहा, फिर  उस पास आकर कहा,चलो पाँच ही दे देना।"
“अरे भाई, बात पाँच या दस की नहीं, मैंने कहा। मैं बैठना नहीं चाहता।"
आखिर मैं रिक्शे पर बैठ कर घर की तरफ चल पड़ा। “बाऊ जी, अब ये तो जुआ है, अगर सवारी मिल गई तो जीत, नहीं तो , हारा और ये हार कहाँ ले जाए, हमें कुछ पता नहीं।
गेट पर खड़ी बीवी ने पूछा, "ठीक तो हो आप ।"
मैंने जेब से नोट निकाल कर उसे दिया और गेट अंदर जाते हुए, सोच रहा हूँ कि जुआ हार जीत जाने की तरह, क्या रिक्शे वाला भी जीत गया कि हारा इस खेल में ?

Comment by Samar kabeer on July 5, 2018 at 12:14pm

मेरे निवेदन पर भी ध्यान दें भाई ।

Comment by Mohan Begowal on July 5, 2018 at 12:09pm

 आदरनीय समर जी, लघुकथा की तनकीद के लिए शुक्रिया ।अपनी इस कमी को सुधारने की कोशिश करूंगा।

Comment by Samar kabeer on July 5, 2018 at 11:53am

जनाब मोहन बेगोवाल जी आदाब, लघुकथा का प्रयास अच्छा हुआ है,लेकिन जुमले कुछ अधूरे से हैं, कुछ और कसावट की ज़रूरत है, बहरहाल कथानक अच्छा है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

एक निवेदन ये है कि मंच पर आई हुई रचनाएँ भी आपकी बहुमूल्य टिप्पणी की प्रतीक्षा में रहती हैं,उन पर भी ध्यान दें,और मंच पर अपनी सक्रियता दिखाएँ ।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 5, 2018 at 11:12am

सच है,  अगर सवारी मिल गई तो जीत नहीं तो हार होती है।  कुआं खोद कर पानी पीने जैसा है रिक्शेवाले की रोजमर्रा की जिंदगी। 
बहुत ही अच्छी लघुकथा  हुई  है। हार्दिक बधाई आदरणीय मोहन बेगोवाल जी । 

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