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लघुकथा--लूट

भोला ने हाँफते-हाँफते घर में प्रवेश किया और माँ से बोला -" जल्दी से दे......जल्दी से दे....देर न कर...बाहर लूट मची है....लूट मची है... मुझे भी लूटकर लाना है.....।"

" मगर क्या दे दूँ..... किस चीज की लूट मची है....मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा बेटा....?"

" दो-चार खाली डिब्बे और कुछ प्लास्टिक की बोतलें दे दे ।'

" लेकिन क्यों ?"

" तू नहीं समझेगी माँ । कल रात अयोध्या में नई सरकार ने लाखों की संख्या में दीए जलाए थे । दीयों में बचा तेल हमारे जैसे कई गरीब के बच्चे लूट के ले जा रहे हैं… Continue

Added by Mohammed Arif on October 22, 2017 at 7:02am — 26 Comments

भरोसा क्या ?

कौन किस वक्त क़ौल से अपने

हट के फिर जायेगा भरोसा क्या ?

कब ये आकाश टूटकर मेरे

सर पे गिर जायेगा भरोसा क्या ?

दोस्ती को निबाहने वाले

हों तो इतिहास में ही जिन्दा हों

आज के दौर का कोई बन्दा

कब मुकर जायेगा भरोसा क्या ?

प्यार की बात, साथ जन्मों का

बोलना तो सरल मगर प्यारे

प्यार का फूल किस घटी,किस पल

झर बिखर जायेगा भरोसा क्या ?

चंद जुमले उछाल कर तुम तो

अपने मित्रों के सर ही चढ़ बैठे

याद रखियेगा,…

Continue

Added by नन्दकिशोर दुबे on October 20, 2017 at 9:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल - यूँ ही गाल बजाते रहिये

यूँ ही गाल बजाते रहिये।
भोंपू सा चिल्लाते रहिये।

अपना उल्लू सीधा करके,
दो का चार बनाते रहिये।

जिससे काम बने बस वो ही,
पट्टी रोज पढ़ाते रहिये।

सूरज उगने ही वाला है,
ये एहसास कराते रहिये।

हम प्रतिपालक हम हैं रक्षक,
चीख चीखकर गाते रहिये।

जीती बाजी हार न जायें,
दाँव पेंच दिखलाते रहिये।

जिनको राह के रोड़े समझें
उनको रोज हटाते रहिये।

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

Added by Ram Awadh VIshwakarma on October 20, 2017 at 7:50pm — 27 Comments

गजल(बाअदब सब....)

2122 2122 212

बाअदब सब हाथ जोड़े हैं खड़े

झाड़ते तकरीर बिगड़े मनचले।1



मामला लंबा चलेगा,सोचकर

कातिलों ने साक्ष्य ही निपटा दिए।2



फिर गवाहों को यहाँ ढूँढा गया,

जो जहाँ जैसे मिले,कटते रहे।3



थे विचाराधीन जो भी कैद में

देखिए अब तो बरी वे हो चले।4



फिर सिसकती आत्मा,कहने लगी---

'कब तलक मैं यूँ रहूँगी मुँह सिए?'5



आँख का अंधा हकीकत तोलता

है गुमां निर्दोष को फाँसी न दे।6



दे चुका अपनी गवाही आदमी

उज्र लाशों… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 20, 2017 at 6:59pm — 13 Comments

ग़ज़ल (सबसे छोटा क़ाफ़िया और सबसे लंबी रदीफ़ )

(फेलुन -फइलुन -फेलुन -फेलुन -फेलुन -फइलुन -फेलुन -फेलुन )

लल का न करे कोई चर्चा वो याद मुझे आ जाएँगे |

छल का न करे कोई चर्चा वो याद मुझे आ जाएँगे |

ज़ालिमकेमुक़ाबिल लब यारों मैं खोलभीदूँगाअपने मगर

बल का न करे कोई चर्चा वो याद मुझे आ जाएँगे |

लम्हे जो गुज़ारे उल्फ़त में मुश्किल से मैं उनको भूला हूँ

पल का न करे कोई चर्चा वो याद मुझे आ जाएँगे |

तूफ़ां से बचा कर कश्ती को लाया तो हूँ साहिल पर लेकिन

जल का न करे कोई…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 20, 2017 at 6:00pm — 6 Comments

डूबता जहाज

"सारा शहर दिवाली के जश्न में डूबा है और तुम किस सोच में डूबे हो" दिवाली की पूजा ख़त्म होने के बाद राहुल से मुलाकात करने गए उसके मित्र रोहित ने उसकी ओर मुखातिब होते हुए पूंछा।

" कुछ नहीं! दिवाली मनाते हुए तो सालों गुजर गए पर आज न जाने क्यों दिवाली मुझे मेरी पहली मुहब्बत सी लगी"

"वो कैसे"

" अरे!पहली बार मुहब्बत में आँखों को जो कुछ भी भाया था उसके खतरे को भी नाक ने सूँघा था और फिर सारा दर्द दिल को ही हुआ था। और आज आतिशबाजी देखकर नाक खतरे से आगाह कर रही है पर सारा दर्द सारी तकलीफ दिल… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on October 20, 2017 at 11:21am — 11 Comments

बावले (लघुकथा)

"अरे, इसे रोको तो ज़रा! कौन है यह? इस तरह कहां और क्यों दौड़ा चला जा रहा है ? कहीं यह वही 'विकास' तो नहीं?"

"नहीं!"

"तो क्या यह भी कोई 'राम' नामधारी है?"

"नहीं!"

"तो फिर कौन है यह? किसी 'राधा' का मीत?"

"नहीं, वह भी नहीं!"

"तो क्या 'गंगा' का सेवक?"

"नहीं भाई!"

"तो क्या तथाकथित 'सेवक'; जेहादी, हिन्दुत्व-प्रचारक, इस्लाम या ईसाइयत-प्रचारक?"

"नहीं, हरग़िज़ नहीं!"

"तो फिर कोई भ्रष्टाचारी, आतंकी या सब कुछ जीतने का इच्छुक कोई नया 'हिटलर'?"

"वैसा भी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 20, 2017 at 11:00am — 9 Comments

ग़ज़ल -दीपावली (दिल में चरागे इश्क़ तो पहले जलाइए )

मफऊल -फ़ाइलात -मफाईल -फाइलुन 

 

दिल में चरागे इश्क़ तो पहले जलाइए |

नफ़रत मिटा के दीपावली फिर मनाइए |

 

तहवार भाई चारे का अहले वतन है यह

लग कर गले से रस्मे महब्बत निभाइए|

 

होने लगीं हवाएँ भी ज़हरीली दोस्तों

आतिश फशाँ पटाखे न घर में चलाइए |

 

करवा के बंद हर तरफ होता हुआ जुआ

रुसवाइयों से दीपावली को बचाइए  |

 

फरहत ही जिस ग़रीब की मंहगाई खा गई

कैसे मनाए दीपावली वो बताइए…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 20, 2017 at 9:00am — 6 Comments

ग़ज़ल - सोचो कुछ उनके बारे में, जिनका दिया जला नहीं

मुफ्तइलुन मुफाइलुन  //  मुफ्तइलुन मुफाइलुन

2112       1212      //   2112      1212

क्या करें और क्यों करें, करके भी फायदा नहीं

दिल में जो दर्द है तो है, लब पे कोई गिला नहीं 

 

उसके कहे से हो गये, लाखों के घर तबाह पर 

उसने कहा कि उसने तो, कुछ भी कभी कहा नहीं

 

सच तो हमेशा राज था, सच था हमेशा सामने

सच तो सभी के पास था, ढूंढे से पर मिला नहीं 

 

दोनों के दोनों चुप थे पर, गहरे में कोई शोर था

दोनों ने ही…

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Added by Ajay Tiwari on October 20, 2017 at 7:47am — 23 Comments

सदी ऊपर का मुकद्दमा - डॉo विजय शंकर।

अदालत लगी हुयी थी। वकील साहब लोग अपनी अपनी कुर्सियों पर बैठ चुके थे। तभी एक मुवक्किल दौड़ता हुआ आया , सीधे अपने वकील साहब के पास पहुंचा और हाथ जोड़ कर बोला ,

" राम राम साहेब " ,

" राम राम " वकील साहेब ने कहा और उसे पीछे एक बेंच दिखा कर कहा , " वहां बैठ जाओ " . वह बैठ गया। दो चार आस पास बैठे लोगों को भी हाथ जोड़ कर वह राम राम करता रहा। तभी अर्दली ने अदालत की डॉयस पर आकर इत्तला दी ,

" साहेब पधार रहे हैं " .

सभी लोग अपने अपनी जगह पर उठ कर खड़े हो गए।

जज साहेब आये ,… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 19, 2017 at 10:00pm — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
दीप जला क्या // डॉ० प्राची

कभी रौशनी से टकराकर

बोल निशा तेरी चौखट पर

दीप जला क्या ?



प्रश्न पूछतीं तेरी भूरी-भूरी आँखे भोली-भाली,

क्या उत्तर दूँ क्या समझेगी

किसने घोली तेरे हर दिन में उगने से पहले ही

इन रातों जैसी स्याही काली...



सिर्फ़ ज़रूरी बात यही है-

तेरी पलकों में जुगनू बन

स्वप्न पला क्या ?



जटा-जटा बन छितर-बितर ये बाल धूल से मैले-मैले

नन्हे हाथों से पीछे कर

बीन-बान कर दीप, माँग कर इधर-उधर से थोड़ी उतरन

भर लाई घर कितने… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on October 19, 2017 at 2:40pm — 8 Comments

गीत-क्रंदन कर उठे हैं भावना के द्वार पर-बृजेश कुमार 'ब्रज'

सभी पंक्तियों का मात्रा भार

2122 2122   2122 212 के क्रम में



गीत क्रंदन कर उठे हैं

भावना के द्वार पर



वेदना में याचना के

शब्द गीले हो गए

यातना के काफिलों से

पथ सजीले हो गए

आँसुओं की बेबसी में

दर्द की मनुहार पर

गीत क्रंदन कर उठे हैं

भावना के द्वार पर



आदमी में आदमी सा

क्या बचा है सोचिये?

पीर क्या है मुफलिसों की?

ये कभी तो पूछिये

हो रही फाकाकशी हर

तीज पर त्यौहार पर

गीत क्रंदन कर उठे…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 19, 2017 at 1:00pm — 16 Comments

गजल(दीप जला...)

22 22 22 2
दीप जले, आभा निखरे
हर्षित हो जन- मन मचले।

नेह-निरूपित सुप्त मृदा
ज्योतित करती नेह पिए।

बिखरें किरणें,भेद कहाँ?
जलते हैं अनिमेष दिये।

कौन नियामित कर सकता?
ज्योति-कलश के कौन ठिये।

आज उझकती रश्मि रथी
किसने उसको पंख दिये?
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 19, 2017 at 12:11pm — 8 Comments

ग़ज़ल (दीपावली)

ग़ज़ल (दीपावली)
212×4

जगमगाते दियों से मही खिल उठी,
शह्र हो गाँव हो हर गली खिल उठी।

लायी खुशियाँ ये दीपावली झोली भर,
आज चेह्रों पे सब के हँसी खिल उठी।

आप देखो जिधर नव उमंगें उधर,
हर महल खिल उठा झोंपड़ी खिल उठी।

सुर्खियाँ सब के गालों पे ऐसी लगे,
कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठी।

ओ बी' ओ को बधाई 'नमन' पर्व की
मंच पर आज दीपावली खिल उठी।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 19, 2017 at 9:42am — 8 Comments

कहीं दीप जले, कहीं दिल (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"चलो दिल बहलाने के लिए अब शतरंज खेलते हैं!"

"ठीक है, लेकिन जीतोगी तो तुम ही!"

"ऐसा मत कहो, दिल बहुत भारी है, कोई भी जीते!"

"सच कहती हो, जीत और हार तो अब इस ताजमहल के इतिहास और हक़ीक़त की होनी है, मुमताज़!"

"आज मुझे अर्जुमंद ही कहो, मुमताज़ नहीं, मेरे ख़ुर्रम! ये इक्कीसवीं सदी का हिन्दुस्तान है, डार्लिंग! कुछ देर आज के लवर्स की तरह बातचीत कर लो न! कल यहां क्या हो, किसने जाना!"

"सही कहा तुमने! सुना है यहां का इतिहास बदलने की धमकियां दी जा रही हैं! तुम्हारा ये ताजमहल अब… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2017 at 5:00am — 13 Comments

सबसे बड़ी रदीफ़ में ग़ज़ल का प्रयास, सिर्फ रदीफ़ और क़ाफ़िया में पूरी ग़ज़ल - सलीम रज़ा रीवा

1222 1222 1222 1222

.....

वतन की बात  करनी हो तो मेरे पास आ जाओ .

अमन की बात करनी हो तो मेरे पास आ जाओ …

Continue

Added by SALIM RAZA REWA on October 19, 2017 at 12:30am — 29 Comments

ओबी ओ परिवार को समर्पित दीपावली की कुण्डलियाँ

आया फिर से सन्निकट दीप-पर्व अभिराम

बागी की शुभकामना सबके लिए प्रकाम

सबके लिय प्रकाम  हर्ष वैभव हो भारी

अवध पधारे राम  कहें राजेश कुमारी  

कहते है गोपाल चतुर्दिक सौरभ छाया

नभ का तारक–माल उतर धरती पर आया

 

प्राची के मन में भरा है गहरा संताप

शरद--इंदु जी किसलिए है इतने चुपचाप

है इतने चुपचाप निशा तमसावृत काली

दूर् किये सब पाप मना हमने दीवाली  

कहते है गोपाल बात शत-प्रतिशत साची

निज को रही संभाल प्रतीक्षारत है…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 18, 2017 at 10:30pm — 14 Comments

नई कमीज



माँ के निकाले हुए पुराने बर्तन बेचकर दीपावली त्योहार के लिए जरूरी सामान की सूची अनुसार पिताजी बाजार से पूजा का सामान, छोटे-छोटे पाँच फल, दो गन्ने, पाँव लड्डू-जलेबी, फूले-पतासे, लक्ष्मी जी का पाना, और रुई लाकर सामान माँ को देते हुए पूछा 21 की जगह 11 दीपक ही ले आता हूँ । इस पर माँ बोली -"मेरे पीहर के गांव कुंडा से कुम्हार आया था जो कल मना करने पर भी 21 दीपक रख गया है और पूछने पर भी रुपये नही बताये । अब उसे रुपये भाई-दूज के बाद दे आऊंगी । इस बार तो 21 दीपक ही…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 18, 2017 at 6:28pm — 18 Comments

बचपन

बचपन होता कितना प्यारा

लगता है हम सबको न्यारा

भेदभाव से है अनजाना

हर गम से होता बेगाना ll



खेलकूद कर हँसता गाता

स्नेह भाव से रखता नाता

नटखट रूप सदा मन भाये

नाचे गाये और बजाये ll



गेमतड़ी औ गिल्ली डंडा

पाये जीत लगा हथकंडा

आइस पाइस छुपन छुपाई

बचपन कितना प्यारा भाई ll



बचपन का हर पन्ना सादा

सीख रहा सबसे मर्यादा

मन की झिझक मिटाता जाता

खाता पीता हँसता गाता ll



मधुर घड़ी बचपन की होती

मात पिता बिन… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on October 18, 2017 at 4:33pm — 9 Comments

लघुकथा--मलिका

" कौन हो तुम ?"
" जन्म से मुस्लिम , मन से सच्चा हिन्दुस्तानी , तन से अधनंगा और पेट से भूखा हूँ ।"
"लेकिन आप यह सब क्यों पूछ रही हैं ?आप कौन हैं ?"
" हा! हा! हा ! हा ! हा !" ज़ोर का अट्टहास किया और बोली-" मुझे दंगों की दुनिया की बेताज मलिका "साम्प्रदायिकता" कहते हैं । " उसने बस इतना ही कहा और एकदम पिस्टल निकालकर दो-तीन गोलियाँ उसकी कनपटी में दाग दी और फरार हो गई ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on October 17, 2017 at 10:59pm — 33 Comments

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