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गजल(रेत कण से...)

2122 2122 2122 2

रेत- कण से इक घरौंदा मैं बनाता हूँ

अनछुए सब ख्वाब फिर उसमें सजाता हूँ।1



कोशिशें कितनी हुई हैं चाँद पाने की

हर दफा बिखरा पसीने में नहाता हूँ।2



हर लहर आभार कहकर लौट जाती है

प्यास का मारा हुआ मैं तिलमिलाता हूँ।3



बादलों की बदगुमानी का रहा कायल

बूँद पड़ जाये जरा नजरें गड़ाता हूँ।4



कह गयी बदली हवा अब रुत बदलनी है

मैं लुटा गठरी,हमेशा ही लजाता हूँ।5



सच कहा जाता नहीं, सब लोग कहते हैं,

आँच अंतर की… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 3, 2017 at 8:56am — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५४

ग़ज़ल-  १२२२ १२२२ १२२२ १२२२२

मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन

 

मुनासिब है ज़रूरत सब ख़ुदा से ही रजा करना

कि है कुफ़्रे अक़ीदा हर किसी से भी दुआ करना

 

ग़मों के कोह के एवज़ मुहब्बत ही अदा करना

नहीं है आपके वश में किसी से यूँ वफ़ा करना

 

नई क्या बात है इसमें, शिकायत क्यों करे कोई

शग़ल है ख़ूबरूओं का गिला करना जफ़ा करना

 

अगर खुशियाँ नहीं ठहरीं तो ग़म भी जाएँगे इकदिन

ज़रा सी बात पे क्योंकर ख़ुदी को…

Continue

Added by राज़ नवादवी on October 3, 2017 at 12:32am — 17 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५3

ग़ज़ल-  १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

किसी ने क्यों कतर डाले हैं परवाज़ों के पर मेरे

फ़रिश्ते भी हैं उक़बा में अज़ल से मुंतज़र मेरे

 

हुजूमे ग़ैर से कोई तवक़्क़ो क्या करूँगा मैं

मेरी क़ीमत न कुछ  समझें ज़माने में अगर मेरे

 

फ़क़ीरी में गुज़ारी है ये हस्ती भी तुम्हारी है  

तेरी ज़र्रा नवाज़ी है कभी आये जो घर मेरे

 

कहूँ क्या हाय शर्मों में छुपी उसकी मुहब्बत को

वो घबरा के जो देखे है इधर मेरे उधर मेरे

 

कहाँ तुझको…

Continue

Added by राज़ नवादवी on October 3, 2017 at 12:21am — 6 Comments

लघुकथा - ज़िद - -

लघुकथा - ज़िद - -

गाँव के सरपंच बंशीलाल के बेटे शुभम  की शादी शहर में रहने वाले परिवार की लड़की सुजाता से हुई।

सुजाता ने गाँव में पहली बार में कुछ  परेशानियों का सामना किया तो गौने पर विदा कराने गये शुभम और उसके साथियों को बैरंग लौटा दिया। कहला दिया कि जब तक घर में शौचालय की व्यवस्था नहीं होगी, वह गांव नहीं आयेगी। शुभम भी गुस्से में धमकी देकर चला आया कि अब वह कभी भी उसे लेने नहीं आयेगा।

लेकिन धीरे धीरे सरपंच जी को अपनी भूल का अहसास हुआ और सामाजिक दबाव के देखते हुए शौचालय…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on October 2, 2017 at 8:02pm — 10 Comments

उनकी नज़र से पीना कोई मयकशी नहीं - सलीम रज़ा रीवा

221 2121 1221 212

........

नश्शा नहीं सुरूर नहीं बे खुदी नहीं.

उनकी नज़र से पीना कोई मयकशी नहीं.

.

गुलशन में फूल तो है मगर ताज़गी नहीं.…

Continue

Added by SALIM RAZA REWA on October 2, 2017 at 7:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 122

तिजारत हुक्मरानी हो गई है।
कहीं गुम शादमानी हो गई है।।

न अब गांधी न शास्त्री से हैं रहबर।
शहादत उनकी फ़ानी हो गई है।।

तेरा तो हुश्न ही दुश्मन है नारी।
कठिन इज्जत बचानी हो गई है।।

लगी जब बोलने बिटिया हमारी।
वो घर में सबकी नानी हो गई है।।

हमीं से चार लेकर एक दे कर।
'नमन' सरकार दानी हो गई है।।


मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 2, 2017 at 4:00pm — 8 Comments

पॉकिटमेन (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"जी नहीं, आर्मी की यूनीफोर्म जैसी नहीं, मेरी सुविधा के अनुसार ही कुछ जेबों वाली शर्ट और पैंट दिखाइये!" अपने कंधे उचकाते हुए स्मार्टमेन ने दुकानदार से कहा। तुरंत ही उसका स्मार्टसन डिमांड स्पष्ट करते हुए बोल पड़ा - "अंकल जी, अच्छे-खासे ब्रांड की ऐसी ड्रेस हो, जिसमें हमारे मोबाइल या टैबलेट वगैरह अच्छी तरह से समा जायें!"

दुकानदार आंखें फाड़कर उन दोनों और उनके पहनावे को घूरने लगा। फिर चार-पांच महंगी शर्ट्स दिखाते हुए बोला -"वैसे कितने मोबाइलों के लिए किस-किस पोजीशन पर जेबें चाहिए… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 2, 2017 at 2:42pm — 6 Comments

मैं हुआ बूढ़ा मगर अनुभव हुआ कुछ भी नहीं (तरही ग़ज़ल)

अरकान- फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन



हर तरफ शिक़वा गिला है औऱ क्या कुछ भी नहीं

रात दिन की दौड़ में आख़िर मिला कुछ भी नहीं ||



इक नियम बदलाव का यारों सनातन सत्य है,

कल मिला है आज से पर राब्ता कुछ भी नहीं



ज़ीस्त का सच देख गोया बन्द मुट्ठी खुल गयी,

साथ अपने अंत में वह ले गया कुछ भी नहीं



बचपना लिपटा रहा ता---उम्र मुझसे इस क़दर,

मैं हुआ बूढ़ा मगर अनुभव हुआ कुछ भी नहीं



दूर होगी मुफ़लिसी यह सोचना तू छोड़ दे,

ये सियासी ख़्वाब… Continue

Added by नाथ सोनांचली on October 2, 2017 at 5:04am — 21 Comments

एक ख्वाहिश

एक ख्वाहिश पूरी कर दे तू इबादत के बगैर

वो आ कर गले लगा ले मेरी इजाजत के बगैर

ऐ खुदा हुस्न और दौलत तो तेरी कुदरत है

मैं मानूँ अगर वो अपना ले मुझे इनके बगैर

बोल कर इज़हार क्यों करूँ अपने इश्क़ का

मैं मानूँ अगर वो जान जाये इशारे किए बगैर

यूँ तो आदत नही किसी को देखूं मुड़ कर

पर दिल करता है देखूं तुझे पलकें गिरे बगैर

शौक लगा उसी दिन मुहब्बत का मुझे यारों

दिल खो गया था जिस दिन खोये बगैर

कोई उम्मीद,दिलासा दे दे मुलाकात…

Continue

Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on October 1, 2017 at 10:26pm — 4 Comments

शरद्पूर्णिमा (कविता)

ज्यों खटक जाता है

किसी चित्रकार को

स्वरचित सफल चित्र पर

अचानक रंगो का बिखर 

जाना !

.

ज्यों खटक जाता है

ज्येष्ठी धूप में तपे प्यासे मानव को

सम्मुख आ सजल पात्र का

अकस्मात ही लुढ़क जाना !.

ज्यों खटक जाता है

प्रणयी युगल को

मधुर प्रणय मिलन 

के मध्य

किसी अन्य का

अप्रत्याशित आ जाना !

.

त्यों ही खटक रहा है मुझको

शरद्पूर्णिमा के चंद्र पर

निगोड़े मेघो का छा जाना !! …



Continue

Added by नन्दकिशोर दुबे on October 1, 2017 at 9:00pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
इस ज़माने से कई राज़ छुपा रक्खे हैं (ग़ज़ल 'राज')

बहरे रमल मुसम्मिन मख़बून महजूफ़ मक़तूअ--    

2122   1122  1122  22 

एक चेह्रे पे कई चेह्रे लगा रक्खे हैं 

इस ज़माने से कई राज़ छुपा रक्खे हैं 



अश्क आँखों में लिये और हँसी चेह्रे पर 

दर्द हमने कई सीने में दबा रक्खे हैं 



टूट जाएँ न कहीँ अश्क जमीं पर गिरकर 

अपनी पलकों पे करीने से सजा रक्खे हैं 



इस ज़माने को कभी ख्वाब मेरे रास आएँ 

सोचकर…

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Added by rajesh kumari on October 1, 2017 at 1:31pm — 15 Comments

जला पुतला सभी ने पाप की कर दी विदाई है//अलका 'कृष्णांशी'

1222 1222 1222 1222 

.

हमारे सामने सबने कसम गीता की खाई है

जला पुतला सभी ने पाप की कर दी विदाई है

.

सभी ये बेटियाँ बहनें सुरक्षित आज से होंगी

अजी रावण की रावण ने यहां कर दी पिटाई है

.

बड़ी बातें सभी करते नही है राम कोई भी

कहीं हिन्दू कहीं सिख है यहाँ कोई ईसाई है

.

न होती धर्म की सेवा न है संस्कार से नाता

दया बसती नही दिल में दिखावे की भलाई है

.

लगाकर हाथ आँचल को वहीं खींसे…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on October 1, 2017 at 1:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल -दुश्मनों को मिटा’ देना यही’ काल अच्छा है

काफिया : आल ; रदीफ़ अच्छा है

बहर : २१२२  ११२२  ११२२  २२(११२)

      ११२२

दुश्मनों को मिटा’ देना यही’ काल अच्छा है

खुद करो भूल, अदू को सज़ा’ ख्याल अच्छा है |

नाम है रहनुमा’ क्या राह दिखाई  किसी’ को

झूठ पर झूठ, तुम्हारा ये’ कमाल अच्छा है |

आज कोई नहीं’ सुनते किसी’ की  दुनिया में

उत्तरी कोरिया’ का बम्ब धमाल अच्छा है |

चाँद में दाग है’, मालूम है’ दुनिया को भी

प्रियतमा मेरी' तो' बेदाग़ जमाल अच्छा है…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on October 1, 2017 at 11:00am — 9 Comments

जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोन:[कालिदास कृत ‘मेघदूत’ की कथा-वस्तु-प्रथम भाग] - डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव

 यक्षराज कुबेर की राजधानी अलकापुरी में वास करने वाला एक यक्ष प्रमादवश सेवा में हुई किसी चूक के कारण यक्षराज के कोप का भाजन बना . कुबेर ने उसे शाप दिया कि वह वर्ष पर्यंत निर्वासित रहकर अपनी पत्नी का वियोग सहे. यक्ष का प्रमाद कालिदास ने स्पष्ट नही किया . कितु टीकाकारों ने निज अनुमान से कई बड़े ही विदग्ध निष्कर्ष  निकाले हैं. इनमे सबसे प्रचलित और बहुमान्य निष्कर्ष यह है कि कालिदास का अभागा शापित यक्ष कुबेर का बागबान था और उसके प्रमाद से इंद्र का विश्रुत हाथी ऐरावत एक दिन कुबेर…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 30, 2017 at 10:03pm — 2 Comments

विकास का सफ़र (व्यंग्य)राहिला

छः पहियाँ की रेलगाड़ी ,

पब्लिक उसमें बैठी ,ठाड़ी।

आगे -पीछे ,ऊपर- नीचे,

भरे पड़े थे नर और नारी।।



दबा-दबा के ठसा -ठसा के ,

मुँह सुकोड़े नाक दबा के।

एक पे पांच, एक पे पाँच

कंडेक्टर ठूँसे बुला- बुला के।।



पसीना चू रहा ,आ रही बास,

बीड़ी जल रही आस -पास।।

उसपर चूरन कृपा हत्यारी,

दूभर हो गया लेना सांस।।



पंखा झल रहे, फूं-फूं कर रहे,

बच्चा बिलख कर कूं -कूं कर रहे।।

क्वार महीना,चटक पसीना

बस में सब अंडे से उबल… Continue

Added by Rahila on September 30, 2017 at 9:51pm — 10 Comments

जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोन:[कालिदास कृत ‘मेघदूत’ की कथा-वस्तु-प्रथम भाग] - डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव

 यक्षराज कुबेर की राजधानी अलकापुरी में वास करने वाला एक यक्ष प्रमादवश सेवा में हुई किसी चूक के कारण यक्षराज के कोप का भाजन बना . कुबेर ने उसे शाप दिया कि वह वर्ष पर्यंत निर्वासित रहकर अपनी पत्नी का वियोग सहे. यक्ष का प्रमाद कालिदास ने स्पष्ट नही किया . कितु टीकाकारों ने निज अनुमान से कई बड़े ही विदग्ध निष्कर्ष  निकाले हैं. इनमे सबसे प्रचलित और बहुमान्य निष्कर्ष यह है कि कालिदास का अभागा शापित यक्ष कुबेर का बागबान था और उसके प्रमाद से इंद्र का विश्रुत हाथी ऐरावत एक दिन कुबेर…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 30, 2017 at 9:51pm — 1 Comment

" उसको कहते किसान है यारों "

" उसको कहते किसान है यारों "



बहर - 2122 1212 22/112





सबसे जो मूल्यवान है यारों ....

उसको कहते किसान है यारों ....



मौला महफ़ूज आप सब को रखें

आप .....भारत कि शान है यारों ..



फेक दी जिसने बेटी कचरे में

माँ वो कितनी महान है यारों ...



जिंदगी से कहीं ज़ियादा , क्यों

प्यारा लगता श्मशान है यारों ...



झूठ देखों यहाँ पे चीखे और

सच... बना बेजुबान है यारों ...



तीर बस प्यार का चले जिस से

आप...... ऐसी… Continue

Added by पंकजोम " प्रेम " on September 30, 2017 at 7:30pm — 3 Comments

इंतज़ार – लघुकथा -

  इंतज़ार  – लघुकथा  -

 "नीरू बिटिया, आजा मेरी बच्ची, क्यों दरवाजे पर टकटकी लगाये बैठी है। रज्जन अब कभी नहीं लौट कर आनेवाला" स्वर्गीय रज्जन की अम्मा ने अपनी पुत्र वधू निर्मला को साँत्वना देने के लहज़े में पुकारा |

"अम्मा, यह बात तो हम भी जानते हैं। बार बार क्यों दोहराते हो? वह जब फ़ौज़ में गया था तभी हम अपना मन पक्का कर लिये थे। पर ऐसे उसका अंत होगा कि मृत शरीर भी देखने को नहीं मिलेगा , यह कभी नहीं सोचा था"।

"बिटिया, आतंकियों ने बम से चिथड़े  चिथड़े कर दिये मेरे बच्चे के। शायद…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on September 30, 2017 at 2:42pm — 8 Comments

इंतज़ार – लघुकथा -

  इंतज़ार  – लघुकथा  -

 "नीरू बिटिया, आजा मेरी बच्ची, क्यों दरवाजे पर टकटकी लगाये बैठी है। रज्जन अब कभी नहीं लौट कर आनेवाला" स्वर्गीय रज्जन की अम्मा ने अपनी पुत्र वधू निर्मला को साँत्वना देने के लहज़े में पुकारा |

"अम्मा, यह बात तो हम भी जानते हैं। बार बार क्यों दोहराते हो? वह जब फ़ौज़ में गया था तभी हम अपना मन पक्का कर लिये थे। पर ऐसे उसका अंत होगा कि मृत शरीर भी देखने को नहीं मिलेगा , यह कभी नहीं सोचा था"।

"बिटिया, आतंकियों ने बम से चिथड़े  चिथड़े कर दिये मेरे बच्चे के। शायद…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on September 30, 2017 at 2:41pm — 4 Comments

रावण का चेहरा (लघुकथा)

हर साल की तरह इस साल भी वह रावण का पुतला बना रहा था। विशेष रंगों का प्रयोग कर उसने उस पुतले के चेहरे को जीवंत जैसा कर दिया था। लगभग पूरा बन चुके पुतले को निहारते हुए उसके चेहरे पर हल्की सी दर्द भरी मुस्कान आ गयी और उसने उस पुतले की बांह टटोलते हुए कहा, "इतनी मेहनत से तुझे ज़िन्दा करता हूँ... ताकि दो दिनों बाद तू जल कर खत्म हो जाये! कुछ ही क्षणों की जिंदगी है तेरी..." 

कहकर वह मुड़ने ही वाला था कि उसके कान बजने लगे, आवाज़ आई,

"कुछ क्षण?"

वह एक भारी स्वर था जो उसके कान में…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 30, 2017 at 12:30pm — 4 Comments

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