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April 2017 Blog Posts

गलती

माना ये गलती मेरी थी पर

थोड़ी थोड़ी तेरी थी

ये दिल जो तेरा हो बैठा

कल तक ये जो मेरा था

तेरी वो बातूनी बातें

जैसे हो बरसात बिना छाते

होगा पश्चाताप तुम्हें तब

जिस दिन सोचे गलती तेरी थी

तुझसे महोब्बत कर बैठे

यही तो गलती मेरी थी

मेरी बातें तुम समझ ना पायी

यही तो गलती तेरी थी

यही तो गलती मेरी थी

मौलिक व अप्रकाशित

Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on April 15, 2017 at 8:49pm — No Comments

बस चला जा रहा हूँ...

बस चला जा रहा हूँ ...

मैं

समय के हाथ पर

चलता हुआ

गहन और निस्पंद एकांत में

तुम्हारे संकेत को

हृदय की

गहन कंदराओं में

अपने अंतर् के

चक्षुओं में समेटे

बस चला जा रहा हूँ

मैं

समय के हाथ पर

मधुरतम क्षणों का आभास

स्वयं का

अबोले संकेत में

विलय का विशवास

अपने अंतर् के

चक्षुओं में समेटे

बस चला जा रहा हूँ

मैं

समय के हाथ पर

वाह्य जगत के

कल ,आज और कल के

भेद…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 15, 2017 at 7:16pm — 12 Comments

हो सके मुस्कुरा दीजिये

212 212 212

चाहतों का सिला दीजिये ।

हो सके मुस्कुरा दीजिये ।।



टूट जाए न् ये जिंदगी।

हौसला कुछ बढा दीजिये।।



गफलतें हो चुकी हैं बहुत ।

रुख़ से पर्दा हटा दीजिये ।।



देखिए हाल बेहाल क्यूँ ।

आप ही कुछ दवा दीजिये ।।



बेवफा कह दिया क्यो उसे ।

राज है क्या बता दीजिये ।।



लूट कर ले गई सब नजर ।

यह रपट भी लिखा दीजिये ।।



टूटकर वह बिखर ही गई ।

जाइये घर बसा दीजिये ।।



है जरूरी मुलाकात भी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on April 15, 2017 at 1:00pm — 8 Comments

भीख और हक (लघुकथा)

कारपोरेशन की गाड़ी का हूटर बजा और लड़के ने गाड़ी से उतर कर डोर बैल बजाईं, जब मैं घर से बाहर आया तो मल्होत्रा ​​साहिब अपने घर में रखा कूड़ेदान लेकर बाहर आ उस लड़के की तरफ  बढ़ रहे थे ।

"हमारा कूड़ा सुबह सुबह पुराना रेहड़ी वाला ही उठा कि ही ले जाता है" ।

क्योंकि आप तो बहुत देर से आते हैं ।

जब आते हैं तब कोई भी घर नहीं होता "मैने कहा, बच्चे स्कूल व् हम दोनों ड्यूटी जा चुके होते हैं ।

पर वह लड़का अभी भी गेट के पास ही…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on April 15, 2017 at 11:00am — 3 Comments

ग़ज़ल...प्रीत का मौसम सुहाना आ गया

2122 2122 212
प्रीत का मौसम सुहाना आ गया
चोट खा के मुस्कुराना आ गया

चल रही पुरवा बसन्ती झूम के
टेसुओं को खिलखिलाना आ गया

खिल उठे मधुवन तुम्हारे नाम से
हर कली को गीत गाना आ गया

याद आई फिर तुम्हारी साँझ में
आँसुओं को गुनगुनाना आ गया

दीप ये किसने जलाये बाम पे
याद फिर गुजरा ज़माना आ गया

खिल उठी विस्तृत गगन में चाँदनी
रात को लोरी सुनाना आ गया
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 14, 2017 at 5:17pm — 12 Comments

अभिलाषाओं के ...

अभिलाषाओं के   ... 

थक जाते हैं

कदम

ग्रीष्म ऋतु की ऊषणता से

मगर

तप्ती राहें

कहाँ थकती हैं



अभिलाषाओं की तृषा

पल पल

हर पल

ग्रीष्म की ऊषणता को

धत्ता देती

अपने पूर्ण वेग से

बढ़ती रहती है

ज़िंदगी

सिर्फ़ छाँव की

अमानत नहीं

उस पर

धूप का भी अधिकार है

जाने क्यूँ

धूप का यथार्थ

जीव को स्वीकार्य नहीं



भ्रम की छाया में

यथार्थ के निवाले

भूल जाता है…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 14, 2017 at 3:44pm — 4 Comments

कहीं ये नीयत फिसल न् जाए

121 22 121 2 2 121 22 121 22



नई जवानी नई अदाएं

कहीं ये नीयत फिसल न् जाए ।।

जरा सँभालो अदब में पल्लू

कोई इरादा बदल न् जाए ।।



कबूल कर ले सलाम मेरा

ऐ हुस्न वाले तुझे है सज़दा ।

मेरी मुहब्बत का दौर यूं ही

तेरी ख़ता से निकल न् जाए ।।



बड़ी तमन्ना थी महफ़िलो की

ग़ज़ल में उसके पयाम होगा ।

उधर है दरिया में बेरुखी तो

इधर समंदर मचल न् जाए ।।



है क़त्ल का गर तेरा इरादा

तो दर्द देकर गुनाह मत कर ।

हराम होगा ये इश्क़… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on April 13, 2017 at 10:13pm — 11 Comments

रेंगती मौत : आधी कविता

चला जाता हूँ/

उस सड़क पर

जहां लिखा होता है-

"आगे जाना मना है।"



मुझे

खुद के अंदर

घुटन होती है

मैं समझता हूँ

लूई पास्चर को,

जिसने बताया की

करोड़ों बैक्टिरिया हमें अंदर ही अंदर खाते हैं

पर वो लाभदायक निकलते है

इसलिए

वो मेरी घुटन के जिम्मेदार नही हैं



कुछ और है जो मुझे खाता है/

चबा-चबा कर।

आपको भी खाता होगा कभी शायद

नींद में/जागते हुए/ या रोटी को तड़फते झुग्गी झोंपड़ियों के बच्चों को निहारती आपकी आँखों… Continue

Added by बृजमोहन स्वामी 'बैरागी' on April 13, 2017 at 3:01pm — 10 Comments

गजल के पाँव दाबे हैं तभी कुछ सीख पाये हैं ...तंज-ओ-मज़ाह

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२ 

.

हमारा साग बांसी है तुम्हारी भाजी ताजी है

जो इस में ऐब ढूँढेगा तो वो आतंकवादी है.

.

गजल के पाँव दाबे हैं तभी कुछ सीख पाये हैं 

इसे पाखण्ड कहना आप की जर्रानवाजी है.

.

तलफ्फुज को लगाओ आग, है ये कौन सी चिड़िया

हमारा राग अपना है हमारी अपनी ढपली है.

.

बहर पर क्यूँ कहर ढायें लिखे वो ही जो मन भाये

मगर इतना समझ लें, ये अदब से बेईमानी है.

.

शहर भर का जहर पीने के आदी हो चुके हैं…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on April 13, 2017 at 11:18am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -गली गली में कुछ अँधियारे, घूम रहे हैं - ( गिरिराज )

22   22  22   22   22  22 ( बहर ए मीर )

कटे हाथ लेकर बे चारे घूम रहे हैं

मांग रहे हैं, कहीं सहारे, घूम रहे हैं

कर्मों का लेखा उनका मत बाहर आये

इसी जुगत में डर के मारे, घूम रहे हैं

 

हाथों मे पत्थर हैं जिनके, उनके पीछे

छिपे हुये अब भी हत्यारे घूम रहे हैं

 

अँधियारा अब भी फैला है आंगन आंगन

क्यों ये सूरज, चंदा, तारे घूम रहे हैं

 

शब्द भटक जाते हैं उनके, अर्थ हीन हो

जिनके घर के अब चौबारे घूम रहे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on April 13, 2017 at 11:01am — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मैं , ओ बी ओ हूँ ... ( एक अतुकांत वैचारिक अभिव्यक्ति )

मैं , ओ बी ओ हूँ ...

***************

मैं , ओ बी ओ हूँ ...

मेरी छाया में हर विधा प्राण पाती रही ..

कितने ही शून्य आये

रहे

सीखे

और शून्य से अनगिनत हो गये

फर्श अर्श हुये



पर, मैं नहीं बदली , वही हूँ

वही रहूँगी

यही तो तय किया था मैंने



लेकिन, क्या ये सच नहीं

कि साज़िन्दे अगर सो जायें

बेसुरे हो ही जाते हैं गवैये ?

कितने भी सुरीले हों..



आज

मुझे सोचना पड़ रहा है ..

शब्द…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on April 13, 2017 at 6:30am — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दुआओं की पहुँच तो आसमाँ तक है

1222 1222 1222
दुआओं की पहुँच तो आसमाँ तक है
मगर तू बोल तेरी हद कहाँ तक है

तेरी ख़ामोशी तेरा घर जला देगी
अभी शोला पड़ोसी के मकाँ तक है

ज़माना चाँद को छू आया है लेकिन
तू अब भी जुगनुओं की दास्ताँ तक है

परस्तिश देखिए गौ माँ के भक्तों की
अक़ीदत सिर्फ़ उन सबकी ज़बाँ तक है

वहाँ से देखता हूँ दुनिया को ऐ जाँ
रसाई तेरी नज़रों की जहाँ तक है

Meaning:
परस्तिश - पूजा, अक़ीदत - श्रद्धा
रसाई - पहुँच
-मौलिक व अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on April 12, 2017 at 7:44pm — 8 Comments

लम्हों की कैद में .....

लम्हों की कैद में ......



लम्हे

जो शिलाओं पे गुजारे

पाषाण हो गए



स्पर्श

कम्पित देह के

विरह-निशा के

प्राण हो गए



शशांक

अवसन्न सा

मूक दर्शक बना

झील की सतह पर बैठ

काल की निष्ठुरता

देखता रहा



वो

देखता रहा

शिलाओं पर झरे हुए

स्वप्न पराग कणों को



वो

देखता रहा

संयोग वियोग की घाटियों में

विलीन होती

पगडंडियों को

जिनपर

मधुपलों की सुधियाँ

अबोली श्वासों…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 12, 2017 at 6:00pm — 6 Comments

ये हमारी शान है औ ये हमारा है वतन- बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

2122  2122  2122    212

 

जाग गहरी नींद से औ देख अपना ये चमन

ये हमारी शान है औ ये हमारा है वतन|

 

भोली सूरत देखकर या फिर किसी भी लोभ में

जो जलाते घर हमारे दो न तुम उनको शरण |

 

धर्म के जो नाम पर हमको लड़ाते आ रहे

आ गए फिर वोट लेने सोच कर करना चयन|

 

आदमी की शक्ल में जो हैं सरापा भेड़िये

कब तलक जुल्मों सितम उनके करेंगे हम सहन|

 

गर बचाना देश है तो मार दो गद्दार को

झट मिटा दो नाम अब तो मत करो…

Continue

Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on April 11, 2017 at 8:30pm — 6 Comments

ये तमाशा तो मेरे ज़ह’न के अन्दर निकला, ग़ज़ल नूर की

गा ल गा गा (ललगागा) / लल गागा/ ललगागा / गा गा (ललगा) 

.

ये तमाशा तो मेरे ज़ह’न के अन्दर निकला,

मैं बशर मैं ही ख़ुदा मैं ही पयम्बर निकला.

.

ये ज़मीं चाँद सितारे ये ख़ला.... सारा जहान, 

वुसअत-ए-फ़िक्र से मेरी ज़रा कमतर निकला.


.

संग-दिल होता जो मैं आप भी कुछ पा जाते,

क्या मेरी राख़ से पिघला हुआ पत्थर निकला?
 …

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on April 11, 2017 at 7:00pm — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सुन्दरी सवैया (राज )

११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ २

सुन्दरी सवैया (मापनीयुक्त वर्णिक)

वर्णिक मापनी - 112 X 8 + 2 



निकले घर से नदिया लहरी शुचि शीतलता पहने गहना है|

चलते रहना मृदु  नीर लिए हर मौसम में उसको बहना है|

कटना छिलना उठना गिरना निज पीर सभी हँसके सहना है|

अधिकार नहीं कुछ बोल सके अनुशासन में उसको रहना है| 

 

खुशबू जिसमे सच की बसती उससे बढ़के इक फूल नहीं है|

जननी रखती निज पाँव जहाँ उससे शुचि पावन धूल नहीं है|

जिसके रहते अरि फूल छुए…

Continue

Added by rajesh kumari on April 11, 2017 at 6:12pm — 7 Comments

गज़ल --आशिको के पास जाकर देखिये

2122 2122 212



मैकदों के पास आकर देखिये ।

तिश्नगी थोड़ी बढ़ाकर देखिये ।।



वह नई उल्फ़त या नागन है कोई ।

गौर से चिलमन हटाकर देखिये ।।



सर फरोसी की तमन्ना है अगर ।

बेवफा से दिल लगाकर देखिये ।।



आपकी जुल्फें सवंर जायेगी खुद ।

आशिकों के पास जाकर देखिये ।।



आस्तीनों में सपोले हैं छुपे ।

हाथ दुश्मन से मिलाकर देखिये ।।



जल न् जाऊँ मैं कहीं फिर इश्क़ में ।

इस तरह मत मुस्कुराकर देखिये ।।



होश खोने का…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on April 10, 2017 at 5:30pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
खड़े तनकर तुम्हारे सामने दीवार भी हम थे (ग़ज़ल 'राज')

बहा तुमको लिए जाती थी जो वो  धार भी हम थे

हमी साहिल तुम्हारी नाव के  पतवार भी हम थे

निगल जाता सरापा तुमको वो तूफ़ान था जालिम

खड़े तनकर  उसी के  सामने दीवार भी हम थे

मुक़द्दस फूल थे मेरे चमन के इक महकते गर 

छुपे बैठे हिफाज़त को तुम्हारी ख़ार भी हम थे

किया घायल तुम्हारा दिल अगर इल्जाम भी होता 

तुम्हारा  दर्द पीने  को वहाँ गमख्वार भी हम थे

रिवाजों की बनी जंजीर ने गर तुमको बांधा था

वहाँ मौजूद उसको काटने…

Continue

Added by rajesh kumari on April 9, 2017 at 8:30pm — 21 Comments

मनहरण घनाक्षरी...समीक्षार्थ..अबके चुनाव में...//अलका ललित

समीक्षार्थ

मनहरण घनाक्षरी ....(एक प्रयास)

***

भ्रष्टाचारियों से बड़ी

चोट खाई पीढ़ियों ने

चोट ये मिटानी होगी

अबकी चुनाव में  

.

दांव न लगाने देंगे

झूठे वादों का जी अब

हार भी चखानी होगी

अबकी  चुनाव में

.

मतदाता याद आए

पांच साल बाद जिसे

मात उसे खानी होगी

अबकी…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on April 9, 2017 at 5:00pm — 6 Comments

"मेरे दोस्त"

कई पेड़ों की तरह वह भी एक पेड़ था

शब्दों के खांचों से दूर.............



छुटपन में कभी कोई गुठली फेंक दिया था

प्रकृति ने अपना काम शुरू किया था



समय गुज़रा लाल कोंपल था दिखा

ख़ुशी हुई बच्चे ने बच्चे को देखा



एक पेड़ जो मुझे जन्म से देख रहा था

एक पेड़ जिसको जन्म से मैं देख रहा था



एक अनजान दरख़्त

एक थोड़ा जाना पहचाना ........



मेरे दुआर का पेड़ मेरी ऊँचाई लाँघ गया

ख़ुशी ख़ुशी मैं उसके कंधों पर भाग गया



बहुत से जीव मेरे… Continue

Added by ASHUTOSH JHA on April 9, 2017 at 4:26pm — 8 Comments

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