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गजल(काश मुझको....)

बहर-रमल मुसद्दस सामिन

2122 2122 2122

+++

काश मुझको भी मिला उस्ताद होता!

शाइरी का इक जहाँ आबाद होता।1



हर्फ अपने बात हर दिल की पिरोते,

तालियाँ पिटतीं बहुत इरशाद होता।2



राबिते ढ़ल काफिये मिलते जमीं से

हर बहर में प्यार का संवाद होता।3



फिर कहाँ कोई भटकता रूक्न होता,

नित नया इक शेर तब ईजाद होता।4



रूप का डंका बजाते फिर रहे सब,

हुश्न हर ताबीर से आजाद होता।5



मानती अपनी गजल कविता सुहाती,

फिर नहीं मन में… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 15, 2016 at 8:30pm — 9 Comments

परीक्षा सिर पर (लघुकथा) / (हिन्दी पखवाड़े पर) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

कक्षा दसवीं के छात्रों को कुछ अंग्रेज़ी शब्दों के बनने का इतिहास और उनके सही मानक उच्चारण बताते हुए अंग्रेज़ी के शिक्षक कहने लगे- "इसलिए मैं कहता हूँ कि कोई दम नहीं है अंग्रेज़ी भाषा में, विश्व की दूसरी भाषाओं के शब्दों से कभी उलझती, कभी संवरती सी बड़ी ही वाहियात भाषा है ये!" भावावेश में इतना कहकर वे छात्रों को अंग्रेज़ी के स्वर व व्यञ्जनों, उनसे शब्द-निर्माण और सही उच्चारण आदि का विस्तृत ज्ञान देते हुए छात्रों से सही उच्चारण का अभ्यास कराने लगे। छात्र असफल रहे, तो अपना सिर पीटते हुए छात्रों से… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 15, 2016 at 8:21pm — 3 Comments

आज अपनों से हुआ अब सामना है (एक प्रयास ) /अलका चंगा

2122 2122 2122



जो हुई पाहुन कभी अपने हि घर में

आज अपनों से हुआ अब सामना है

हर जनम का साथ चाहा है दिलों ने

तीन लफ़्ज़ों को नहीं अब थामना है

हाथ जो भरते है उसकी मांग सूनी

उम्र भर का साथ ही अब कामना है



डोलियां उठती है जो शहनाइयों में

अर्थियां उनकी सजाना हाँ... मना है

चाहतें अपनी तभी तक हैं अधूरी

इश्क में अश्कों भरा दिल गर सना है

 "मौलिक व…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on September 15, 2016 at 7:30pm — 11 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
यार, ठीक हूँ, सब अच्छा है ! (नवगीत) // --सौरभ

लोगों से अब मिलते-जुलते

अनायास ही कह देता हूँ--

यार, ठीक हूँ..

सब अच्छा है !..

 

किससे अब क्या कहना-सुनना

कौन सगा जो मन से खुलना

सबके इंगित तो तिर्यक हैं

मतलब फिर क्या मिलना-जुलना

गौरइया क्या साथ निभाये

मर्कट-भाव लिए अपने हैं

भाव-शून्य-सी घड़ी हुआ मन

क्यों फिर करनी किनसे तुलना

 

कौन समझने आता किसकी

हर अगला तो ऐंठ रहा है

रात हादसे-अंदेसे में--

गुजरे, या सब

यदृच्छा है !

 

आँखों में कल…

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Added by Saurabh Pandey on September 15, 2016 at 5:30pm — 23 Comments

दोहे (एक प्रयास ) /अलका चंगा

छोटे मुँह की बात भी,ऊँची राह सुझाय ।
सीख कहीं से भी मिले, सीखो ध्यान लगाय ।।

औरन को अपना कहें , सुनते उनकी बात ।
अपनों की सुध है नहीं, उनसे करते घात।।

ऐसा नाम कमाइए, मन के खोले द्धार ।
अपनों की सुध लीजिये, बढे प्रेम व्यव्हार ।।

खुशियों की खामोशियां , खा जाती सुख चैन।
यादें ना हो साथ तो ,दिन बीते ना रैन ।।

.

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by अलका 'कृष्णांशी' on September 15, 2016 at 4:00pm — 6 Comments

सिंदूरी हो गयी ... (क्षणिकाएं )....

सिंदूरी हो गयी ... (क्षणिकाएं )....

१.

ठहर जाती है

ज़िदंगी

जब

लंबी हो जाती है

अपने से

अपनी

परछाईं

...... .... .... .... ....

२.

एक सिंदूर

क्या रूठा

ज़िन्दगी

बेनूरी हो गयी

इक नज़र

क्या बन्द हुई

हर नज़र

सिंदूरी हो गयी

..... ..... ..... ..... ..... ....

३.

ज़ख्म

भर जाते हैं

समय के साथ

शेष

रह जाते हैं

अवशेष

घरौंदों में

स्मृतियों के

इक अनबोली

टीस के…

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Added by Sushil Sarna on September 15, 2016 at 3:55pm — 2 Comments

कुण्डलिया- हिंदी दिवस के सम्बन्ध में

हिन्दी तो अनमोल है, मीठी सुगढ़ सुजान।

देवतुल्य पूजन करो, मात-पिता सम मान।।

मात-पिता सम मान, करो इसकी सब सेवा।

मिले मधुर परिणाम, कि जैसे फल औ मेवा।।

कहे पवन ये बात, सुहागन की ये बिन्दी।

इतराता साहित्य, अगर भाषा हो हिन्दी।१।

 

दुर्दिन जो हैं दिख रहे, इनके कारण कौन।

सबकी मति है हर गई, सब ठाढ़े हैं मौन।।

सब ठाढ़े हैं मौन, बांध हाथों को अपने।

चमत्कार की आस, देखते दिन में सपने।।

सुनो पवन की बात, प्रीत ना होती उर बिन।

होती सच्ची चाह, न…

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Added by डॉ पवन मिश्र on September 14, 2016 at 9:30pm — 13 Comments

हिंदी

हिंदी सभ्यता मूल पुरातन भाषा है

संस्कृति के जीवित रहने की आशा है

एक चिरंतन अभिव्यक्ति का साधन है

भारत माता का अविरल आराधन है

हिंदी पावनता का एक उदाहरण है

मातृभूमि की अखंडता का कारण है

उत्तर से दक्षिण पूरब से पश्चिम तक

सारी बोलीं हिंदी माता की चारण हैं

हिंदी सरस्वती, दुर्गा माँ काली है

संस्कृति की पोषक माँ एक निराली है

पूरब में उगते सूरज की आभा है

पश्चिम में छिपते सूरज की लाली है

जन मन की अभिव्यक्ति की…

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Added by Aditya Kumar on September 14, 2016 at 8:51pm — 11 Comments

दोहे(प्रेम पियूष)22

प्रेम सुमन का है गहन ,हवा चल रही मंद।
मैं अलि सम पीता फिरूँ,मधुर-मधुर मकरंद।।

तुम बिन किससे हो प्रिये,अपने दिल की बात।
नहीं बीतता दिवस अब,नहीं बितती रात।।

अधरों पर फिर से खिली,मृदुल मौन मुस्कान।
सच कहता हूँ हे प्रिये,लोगी मेरी जान।

ढाई आखर प्रेम का,लिए हाथ में हाथ।
जीवन भर चलना प्रिये,हरदम मेरे साथ।।

खुद को मीरा कह रही,मुझको माखनचोर।
दिखता मैं उसको सदा,कण कण में चहु ओर।।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 14, 2016 at 8:14pm — 10 Comments

बेजुबान - लघु कथा

आज सुबह सुबह ही सब लोग ईद की तैयारी में लग गएI अब्दुल मियां एक बकरी का बच्चा लाये और क़ुरबानी की तैयारियां शुरू हुई,

अब्दुल का दस साल का लड़का सलीम गुमसुम सा ये सब देख रहा था,…

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Added by harikishan ojha on September 14, 2016 at 6:00pm — 10 Comments

हिंदी

हम हिन्दू हैं सिक्ख हैं या हैं मुसलमान,

लेकिन हिंदी से बना है हिन्दुस्तान।



हिंदी है एक ऐसी भाषा

जो जगाती प्यार की आशा

हिमाचल जम्मू हरियाणा

पंजाब यू पी हो या बिहार

चाहे कोई भी हो प्रान्त पर

हिंदी है हमारी शान

लेकिन हिंदी से बना है हिन्दुस्तान।



विश्व में है ये बोली जाती

कहीं पारया कहीं नैताली

फिजी में बोलते हैं फिजीबात

सरनाम में कहें सरनामी

फिजी मारिशस ट्रिनिडाड

गुयाना हो या सूरीनाम

लेकिन हिंदी से बना है… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 14, 2016 at 5:23pm — 4 Comments

हिन्दी दिवस पर दो कुकुभ छंद एक ताटंक

कुकुभ छंद -२

देश की एकता, अखण्डता, सबकी वाहक है हिंदी

भाव, विचार, पूर्णता, संस्कृति, सभी का प्रतिरूप हिंदी |

आम जन की मधुर भाषा है, भारत को नई दिशा दी

है विदेश में भी यह अति प्रिय, लोग सिख रहे हैं हिंदी ||

सहज सरल है लिखना पढ़ना, सरल है हिन्द की बोली

संस्कृत तो माता है सबकी, बाकी इसकी हम जोली |

हिंदी में छुपी हुई मानो, आम लोग की अभिलाषा  

जोड़ी समाज की कड़ी कड़ी, हिंदी जन-जन की भाषा ||

ताटंक -१

देश की…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on September 14, 2016 at 3:57pm — 4 Comments

मेरी यह छोटी बहर की ग़ज़ल

दरवाजों पर ताले रखना

चाबी जरा संभाले रखना।

 

ठंडी होगयी चाय सुबह की

पानी और उबाले रखना।

 

संसद में घेरेंगे तुझको

तू भी प्रश्न उछाले रखना।

 

गाँवों का सावन है फीका

नीम पर झूले डाले रखना।

 

चिडियों की चीं चीं खेतों में

कुछ गौरैयाँ पाले रखना|

 

दूर ना होना अपनों से तू

रिश्ते सभी संभाले रखना।

...आभा 

अप्रकाशित एवं  मौलिक 

 

 

                 …

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Added by Abha saxena Doonwi on September 14, 2016 at 1:00pm — 6 Comments

भाषा यह हिन्द (त्रिभंगी छंद)

भाषा यह हिन्दी, बनकर बिन्दी, भारत माँ के, माथ भरे ।
जन-मन की आशा, हिन्दी भाषा, जाति धर्म को, एक करे ।।
कोयल की बानी, देव जुबानी, संस्कृत तनया, पूज्य बने ।
क्यों पर्व मनायें,क्यों न बतायें, हिन्दी निशदिन, कंठ सने ।।

Added by रमेश कुमार चौहान on September 14, 2016 at 12:00pm — 5 Comments

हमें बढ़ाना मान (दोहे)

हिंदी दिवस की शुभ कामनाओं के साथ  कुछ दोहे -

हमें बढ़ाना मान (दोहे)

=================

हिंदी में साहित्य का, बढ़ा खूब भण्डार 

हम संस्कृति का देखते, शब्दों में श्रृंगार |

कविता दोहा छंद में, सप्त सुरों का राग 

गीत गीतिका छंद में, भरें प्रेम अनुराग…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 14, 2016 at 11:30am — 12 Comments

सावन सूखी रह गई

सावन

सूखी रह गई,

सूखे भादो मास

विरहन प्यासी धरती कब से,

पथ तक कर हार गई

पनघट पूछे बाँह पसारे,

बदरा क्यों मार गई

पनिहारिन

भी पोछती

अपनी अंजन-सार

रक्त तप्त अभिसप्त गगन यह,

निगल रहे फसलों को

बूँद-बूँद कर जल को निगले,

क्या दें हम नसलों को

धूँ-धूँ कर

अब जल रही

हम सबकी अँकवार

कब तक रूठी रहेगी हमसे,

अपना मुँह यूॅं फेरे

हम तो तेरे द्वार खड़े हैं

हृदय हाथ में…

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Added by रमेश कुमार चौहान on September 14, 2016 at 11:27am — 3 Comments

बुढ़ापे का सफ़र

बुढ़ापे की पुकार



सहम जाता हूँ मैं

रात के सन्नाटे से

ना छोड़ना मुझे बेटा

कभी किसी बहाने से

मैं तब भी था भूखा जब

तेरी पैंट फट गयी थी

और तू ले गया था

पैसे मेरे सरहाने से

तब तू रोया करता था

हँसी हमें सूझती थी

आज हँसी तुझे भी

आती हैं पर

मेरे रो जाने से

मालूम है मुझे भी

कंधों पर बोझ तेरे

ज़रूरत से ज़्यादा है

पर मेरे कंधों के भोज

से तेरा बोझ आधा है

तुम तीनों बच्चे और

तेरे दादा दादी साथ थे

घर… Continue

Added by S.S Dipu on September 14, 2016 at 4:46am — 10 Comments

ऐसा भी हो

ऐसा भी हो 
स्वंय से मिले निगाहें जब- जब 
गर्व से सीना तन पाए 
ग्लानि  हो न मीलों  तक 
इतिहास भले न रच पाए …
Continue

Added by amita tiwari on September 14, 2016 at 3:05am — 5 Comments

पहाड़ी के बीच

पहाड़ी के बीच

**************************

ऊँची नीची पहाड़ी पगडंडियों में

बल खाती घुमावदार सड़कों के बीच

दिखती है एक चाय की दुकान

यह दुकान होती है

छोटे मोटे मकानों में

किसी भी पगडंडी पर

किसी खोखे जैसी दुकान

उस में चाय भी बनती है

आलू प्याज के बनते हैं पकौड़े भी

यहाँ कभी कभी टहलते हुये

होते हैं लोग इकट्ठा

करतें हैं अपने ऊँची चोटी पर बसे गाँव की बातें

इसी बीच इन्हीं दुकानों पर

वे कर लेते…

Continue

Added by Abha saxena Doonwi on September 13, 2016 at 11:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल...आँसुओं की आँख से सौगात बैरन आ गई

2122     2122     2122      212

तुम पिया आये नहीं बरसात बैरन आ गई 

दिन गुजारा बेबसी में रात बैरन आ गई

था हवाओं ने कहा मनमीत का सन्देश है 

ले जुदाई बेशरम की बात बैरन आ गई

ढोल ताशे बज उठे हैं गूंजती शहनाइयाँ 

हाय रे महबूब की बारात बैरन आ गई

मुट्ठियों में दिल समेटा होंठ भी भींचे खड़े 

आँसुओं की आँख से सौगात बैरन आ गई

भाइचारा भूल जाओ अब मियाँ तकरीर में 

धर्म मजहब आदमी की जात बैरन आ…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 13, 2016 at 8:00pm — 12 Comments

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