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मेरी यह छोटी बहर की ग़ज़ल

दरवाजों पर ताले रखना

चाबी जरा संभाले रखना।

 

ठंडी होगयी चाय सुबह की

पानी और उबाले रखना।

 

संसद में घेरेंगे तुझको

तू भी प्रश्न उछाले रखना।

 

गाँवों का सावन है फीका

नीम पर झूले डाले रखना।

 

चिडियों की चीं चीं खेतों में

कुछ गौरैयाँ पाले रखना|

 

दूर ना होना अपनों से तू

रिश्ते सभी संभाले रखना।

...आभा 

अप्रकाशित एवं  मौलिक 

 

 

                  ....आभा

 

 

Views: 608

Comment

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Comment by Abha saxena Doonwi on September 19, 2016 at 8:43am

आदरणीय आशीष सिंह ठाकुर जी नमस्कार मेरी रचना को सराहने के लिए  बहुत बहुत शुक्रिया आपका ...

Comment by Abha saxena Doonwi on September 19, 2016 at 8:41am

आदरणीया rajesh कुमारी  जी  शुक्रिया आपका ..आइन्दा इस  बात  का ख्याल  रखूंगी कि  बहर  का नाम भी  लिखा करूं शुक्रिया  आपका ..

Comment by Abha saxena Doonwi on September 19, 2016 at 8:40am

आदरणीय समर कबीर जी नमस्कार, आपका मैं तहे दिल से आभार व्यक्त करती हूँ जो आपने मेरी इस रचना को सराहा और पसंद किया ....आपके हस्ताक्षर मेरी रचना पर मेरे लिए संबल का काम करते  हैं शुक्रिया ...

Comment by आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' on September 16, 2016 at 3:51pm

अच्छी रचना है महोदया आभा सक्सेना जी !!!!
बधाईयां !!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 15, 2016 at 4:19pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है आभा जी जैसा की यहाँ का दस्तूर है ग़ज़ल लिखते हुए बह्र जरूर लिख दिया करें उससे समीक्षा करने में सुविधा होती है | चाबी शब्द ठीक कर लीजियेगा  बहुत- बहुत बधाई, 

Comment by Samar kabeer on September 15, 2016 at 3:55pm
मोहतरमा आभा सक्सेना जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
मतले में 'चाभी' या "चाबी" ?

कृपया ध्यान दे...

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