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सिंदूरी हो गयी ... (क्षणिकाएं )....

सिंदूरी हो गयी ... (क्षणिकाएं )....
१.
ठहर जाती है
ज़िदंगी
जब
लंबी हो जाती है
अपने से
अपनी
परछाईं
...... .... .... .... ....
२.
एक सिंदूर
क्या रूठा
ज़िन्दगी
बेनूरी हो गयी
इक नज़र
क्या बन्द हुई
हर नज़र
सिंदूरी हो गयी
..... ..... ..... ..... ..... ....
३.
ज़ख्म
भर जाते हैं
समय के साथ
शेष
रह जाते हैं
अवशेष
घरौंदों में
स्मृतियों के
इक अनबोली
टीस के साथ

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 16, 2016 at 8:50pm

आदरणीय सुरेश कुमार कल्याण जी प्रस्तुति में निहित भावों को अपनी प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया से सुशोभित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 15, 2016 at 8:20pm
आदरणीय श्री सुशील सरना जी बहुत ही सुन्दर क्षणिकाओं के लिए हार्दिक बधाई प्रेषित है । सादर ।

कृपया ध्यान दे...

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