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ताटंक छंद

ताटंक छंद

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1

बुरे समय का खेला चलता, गुण की कीमत जाती है

लोग बुरे आगे बढ़ते हैं,अच्छों की मत जाती है

मक्कारी के घर भरते हैं,सच्चाई घबराई है

जनता देखो भूखी मरती,कुत्ता खात मलाई है।

2.

बहा पसीना खेत कमाता, पोषण सबका होता है

खुद का बच्चा तड़प तड़प कर, भूखा घर में सोता है

कुदरत ने तो मारा उसको,करता तंत्र पिसाई है

जनता देखो भूखी मरती,कुत्ता खात मलाई है।



3

जो करते हैं काम अनेकों ,नाम कभी क्या होता है,

काट लफंगे खा जाते… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 16, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

आ मेरे ख़यालों में हाज़िरी लगा दीजै (ग़ज़ल)

बह्र : २१२ १२२२ २१२ १२२२

 

आ मेरे ख़यालों में हाज़िरी लगा दीजै

मन की पाठशाला में मेरा जी लगा दीजै

 

फिर रही हैं आवारा ये इधर उधर सब पर

आप इन निगाहों की नौकरी लगा दीजै

 

दिल की कोठरी में जब आप घुस ही आये हैं

द्वार बंद कर फौरन सिटकिनी लगा दीजै

 

स्वाद भी जरूरी है अन्न हज़्म करने को

प्यार की चपाती में कुछ तो घी लगा दीजै

 

आग प्यार की बुझने लग गई हो गर ‘सज्जन’

फिर पुरानी यादों की धौंकनी लगा…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 16, 2016 at 9:00pm — 16 Comments

कि जब तुम लौट कर आओगे::एक स्मृति

हौसला टूट चुका है, अब यकीन कहीं जख्मी बेजान मिलेगा,

कि जब तुम लौट कर आओगे तो सब वीरान मिलेगा ll



वो बरगद का पेड़ जहां दोनों छुपकर मिला करते थे,

वो बाग जहां सब फूल तेरी हंसी से खिला करते थे,

वो खिड़की जहां से छुपकर तुम मुझे अक्सर देखा करती थी,

वो गलियां जो हम दोनों की ऐसी शोख दिली पर मरती थीं,

वो बरगद,वो गलियां, वो बाग बियाबान मिलेगा,

कि जब तुम लौट कर आओगे……………l



खेत-खलिहान तक तुमको बंजर मिलेगा,

मेरी दुनिया का बर्बाद मंजर…

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Added by Er Anand Sagar Pandey on August 16, 2016 at 6:30pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

२२१ २१२१ १२२१ २१२



पगडंडियों के भाग्य में कोई नगर कहाँ ?

मैदान गाँव खेत सफ़र किन्तु घर कहाँ ? 

 

होठों पे राह और सदा मंज़िलों की बात

पर इन लरजते पाँव से होगा सफ़र कहाँ ? 

 

हम रोज़ मर रहे हैं यहाँ, आ कभी तो देख..

किस कोठरी में दफ़्न हैं शम्सो-क़मर कहाँ ? 

 

सबके लिए दरख़्त ये साया लिये खड़ा

कब सोचता है धूप से मुहलत मगर कहाँ !

 

जो कृष्ण अब नही तो कहाँ द्रौपदी कहीं ?

सो, मित्रता की ताब में कोई असर कहाँ ? 

 

क़ातिल…

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Added by Saurabh Pandey on August 16, 2016 at 4:00pm — 27 Comments

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

1 .

एक पत्थर उठा

शैतां के लिए

एक पत्थर उठा

जहां के लिए

एक पत्थर उठा

मकां के लिए

देवता बन

जी उठा

एक पत्थर

इन्सां के लिए

...... ..... ..... .....

२.

मैं आज तक

वो रिक्तता

नहीं नाप सका

जिसमें

कोई माँ

अपने जन्मे को

तन्हा छोड़

ब्रह्मलीन हो जाती है

मन को शून्यता की

क़बा दे जाती है

..... ..... ..... ..... .....

३.

हमने

प्रवाहित कर दी थी…

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Added by Sushil Sarna on August 16, 2016 at 2:19pm — 10 Comments

अब भी कुछ संभावनाएँ शेष हैं (ग़ज़ल)

2122 2122 212



जानता हूँ आपदाएँ शेष हैं।

क्यों डरूँ?जब तक दुआएँ शेष हैं।



जन्म लेते ही रहेंगे राम-कृष्ण,

जब तलक धरती पे माँएँ शेष हैं।



कोशिशें तो आप सारी कर चुके,

अब तो केवल प्रार्थनाएँ शेष हैं।



सूर्य ढलने को अभी कुछ वक़्त है,

अब भी कुछ संभावनाएँ शेष हैं।



बोलिये! इस दौर में कैसे जिये?

जिसके दिल में भावनाएँ शेष हैं।



मंदिरों से देवता ग़ायब हुए,

मूर्तियों में आस्थाएँ शेष हैं।



बस्तियाँ तो बाढ़ में… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on August 16, 2016 at 1:16pm — 11 Comments

लालसा की चोरी /लघुकथा

मैदान के किनारे सड़क के पार टपरी के बाहर वह माथे पर शिकन लिये बेचैन -सा बैठा है।अंदर बच्चा पिछले कई घंटों से रोये जा रहा था। पिछले कई दिनों से उसे बुखार है। सरकारी दवाई बेअसर थी। सामने पूरे मैदान में शामियाना लगा हुआ है। बैंड-बाजे की आवाज शोर बनकर कान को फाड़ने पर तुली हुई थी।

उसके घर में आज समस्त फसाद की जड़ ये बैंड-बाजा ही थी। पकवानों की सुगंध अमीर -गरीब का घर कहाँ देखती , बिना पूछे सीधे अंदर घुस आई।

पकवानों की सुगंध से मचलता खाने को तरसता बीमार बच्चा ,अब उसे कैसे…

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Added by kanta roy on August 16, 2016 at 10:57am — 6 Comments

ताटक छ्न्द-सतविन्द्र

ताटंक छ्न्द



पास खड़ी है सजधज कर वह,दुल्हन सबसे प्यारी है

सबको वही पसन्द बहुत है,देखो सबसे न्यारी है

वरण किया जो लेकर आए,उसको वे मतवाले थे

आजादी की दुल्हन खातिर,खुद मिट जाने वाले थे।



देकर अपनी आहुति जो भी,आजादी को लाए थे

राग रंग और मौज मस्ती,क्या उन सबको भाए थे

कुछ तो तोड़ गये थे बेड़ी, जो गैरों ने डाली थी

अबतक भी है घोर गुलामी,जो अपनों ने पाली थी।



भूख बनी आदत जिसकी है,खाने को कब दाना है

तन सर्दी से ठिठुर रहा है,नहीं वस्त्र का… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 15, 2016 at 11:04pm — 6 Comments

बाल मज़दूरी ( लघुकथा)

मुझे पढ़ना है

"बाल मज़दूर ! यह क्या होता है अंकल । यह आप किसके लिये बोल रहे थे ।"

" ओह ! कल्लू तो तुमने हमारी बातें सुन ली । बच्चे मज़दूर माने मेहनत करने वाला । बाल मज़दूर माने बच्चा जो दिन भर मेहनत करके रोटी कमाये । "

" अच्छा ! पर मेरी अम्मी तो मुझे राजा बेटा बुलाती है और बाबा मुझे कहते है पैसे की खान । पर यह होता क्या है ? खान माने !! "

"अरे तुम्हारे बाबा भी है क्या ? वो क्या करते है ? "

" है न मेरे बाबा , वे तो घर में ही रहते हैं । अम्मी कहती हैं वो जुवारि हैं । कुछ काम… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 15, 2016 at 6:22pm — 1 Comment

ग़ज़ल ( जश्ने आज़ादी )

ग़ज़ल ( जश्ने आज़ादी )

---------------------------

शिकवे गिले भुलाकर उल्फत को हम बढ़ाएं ।

मिल जुल के आओ जश्ने आज़ादी हम मनाएं ।

तोड़ें न मंदिरों को मस्जिद नहीं गिराएं ।

माहौल एकता का हम देश में बनायें ।

क़ुर्बानियों से जिनकी आज़ाद हम हुए हैं

हम उनके हक़ में आओ दस्ते दुआ उठायें ।

उल्फत से हम रहेंगे झगड़ा नहीं करेंगे

क़ौमी निशाँ के नीचे आओ क़सम ये खाएं।

गैरों ने जिस अदा से अपने वतन को लूटा

अपनों को भा गयी हैं शायद वही अदाएं ।

बस…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on August 15, 2016 at 1:47pm — 12 Comments

आजादी के पावन पर्व पर....

आजादी के पावन पर्व पर.....

आजादी के पावन पर्व पर

तिरंगा हम फहराते हैं

मर मिटने को देश…

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Added by Sushil Sarna on August 15, 2016 at 11:31am — 8 Comments

‘बेच रहा है आज तिरंगा’

 

चौराहे नाके पर बालक

बेच रहा है आज तिरंगा

 

झंडे लेकर उससे इक दो

कुछ पैसे उसको दे डालो

फिर गाडी में उन्हें लगा कर

आज़ादी की रस्म निभा लो

 

खाली हाथों घर जो लौटा

बाप करेगा पी कर पंगा

 

शनि लेकर कल घूम रहा था

सरसों तेल व जलती बाती

भूखे बच्चे चौराहे पर

कब बीतेगी साढ़े साती

 

रोजी उसकी ही खा जाता 

खादी  जाली का हर दंगा

 

बीते न बस रस्मी…

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Added by pratibha pande on August 15, 2016 at 11:18am — 4 Comments

किस-किस का लेवल? (लघुकथा)

अशासकीय विद्यालय की प्राचार्य महोदया ने आज फिर चार-पांच छात्रों को डांटते हुए दंडित किया। स्टाफ़-रूम में शिक्षकगण इसी विषय पर विमर्श कर रहे थे। एक शिक्षक ने उग्र हो कर कहा- "जिस स्कूल की प्राचार्य ही क्रोध में छात्रों को 'जानवर' या 'बिगड़ैल औलाद' कहे उस स्कूल की नौकरी ही छोड़ देना चाहिए या ऐसी प्राचार्य को उसके घर पर बिठा देना चाहिए!"



"बिलकुल सही कहा आपने! इतनी बात ही नहीं है, सर! अंग्रेज़ी बोलना सिखाना और उसके लिए प्रोत्साहित करना अलग बात है और उसके पीछे मातृभाषा, अपनी ही राष्ट्र भाषा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 14, 2016 at 9:10pm — No Comments

कुण्डलिया

आजादी वह भाव है,जिससे सबको प्यार
इसको पाने के लिए,हुई बहुत तकरार
हुई बहुत तकरार,कई ने जान गँवाई
हुए शहीद अनेक,तभी आज़ादी पाई
सतविन्दर कविराय,रहे सुख से आबादी
है अद्भुत यह भाव,नाम जिसका आजादी

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 14, 2016 at 6:16pm — 8 Comments

भ्रम.....

भ्रम ....

कितनी देर तक

तुम अपने जाने से पहले

मुझे ढाढस बंधाते रहे

मेरी अनुनय विनय को

अपनी मजबूरियों के बोझ से

बार बार दबाते रहे

तुम्हारे दो टूक शब्दों का

मुझपर क्या असर होगा

तुमने एक बार भी न सोचा

बस कह दिया

मुझे जाना होगा

कब आना हो

कह नहीं सकता

मैं अबोध अंजान

क्या करती

सिर हिला दिया

नज़रें  झुका ली

अपनी व्यथा

पलकों में छुपा ली

तुम्हारे कठोर शब्दों का…

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Added by Sushil Sarna on August 14, 2016 at 4:30pm — 2 Comments

मानसकार का स्मरण

         

कुण्डलिया

 

 हुलसी माँ की गोद में सुन्दर सुत अभिराम

जन्म समय जिसने किया उच्चारण श्री राम

उच्चारण श्री राम      रामबोला कहलाया

सुख से था वैराग्य  कष्ट जीवन भर पाया

कहते हैं ‘गोपाल’ बना  तृण से वह तुलसी

जितना रहा अभाव भक्ति उतनी ही हुलसी

 

मनहर घनाक्षरी

 

किया रचना विचार भाषा में प्रथम बार

बह चली रस-धार भाव और भक्ति की

देख कविता का रंग  विदुष समाज दंग

हुई…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 14, 2016 at 3:26pm — 4 Comments

आदमी कब व्याधियों से मुक्त होगा रब ही जाने

2122    2122    2122    2122

शोध पेपर इक कहानी ऐसी बनते जा रहे हैं

जिसमे नित नव कल्पना के पंख लगते जा रहे है

सारी दुनिया के रसायन आज  हैराँ सोचकर ये

हम जहाँ जुड़ ही  नहीं सकते थे जुड़ते जा रहे हैं

आदमी कब व्याधियों से मुक्त होगा रब ही जाने

शोध', चूहे -खरहों के पर प्राण हरते जा रहे हैं

मोतियों से दांत दिखला पेस्ट जो करते प्रचारित

नीम की दातून से निज दांत घिसते जा रहे हैं

रोज अखबारों को पढ़कर दे रहे हैं…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on August 14, 2016 at 11:09am — 5 Comments

अनहोनी

बस अड्डे में बैठे हुए उसे दो घंटे हो चुके थे। आंधी - तूफ़ान और तेज बारिश ने सारे बसों के पहिंए रुकवा दिए थे। वह बार बार पूछताछ में जाती और अगली गाड़ी कब निकलेगी उसका पता करती। आज उसे अपरिहार्य करणो से देर हो गई थी और अँधेरा हो चुका था। अब उसकी माथे पर सिकन की लकीरे साफ़ देखी जा सकती थी।

कुछ मनचले भी उसे देख- देख कर उसके बातें बनाने लगे थे और बार-बार उसके इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे थे। उसे अब डर लगने लगा था। तभी उसकी बगल में एक अधेड़ उम्र का आदमी आकर बैठ गया जो उसे दूर एक चाय के होटल से बैठकर देख… Continue

Added by Er Nohar Singh Dhruv 'Narendra' on August 14, 2016 at 10:33am — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - क्या असभ्य को सच में तुम घायल पाये ( गिरिराज भंडारी )

क्या असभ्य को सच में तुम घायल पाये

22  22  22  22  22  2  --  बहरे मीर

तुमने भी अपने हिस्से के पल पाये

मिली भाव की आँच, कभी क्या गल पाये

 

शब्दों का हर बाण चलाया तुमने पर

क्या असभ्य को सच में तुम घायल पाये

 

तेल डाल कर दिया कर जला छोड़ दिया

वो जानें, वो जल पाये ना जल पाये  

 

समय इशारा किया हमेशा खतरों का

समझ इशारा कितने यहाँ सँभल पाये ?

 

खूब कोशिशें हुईं कि हम बदलें लेकिन

वर्तमान के…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on August 14, 2016 at 7:54am — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - मेरा ‘मै’ ही अनजाना सा लगता है - ( गिरिराज भंडारी )

22   22   22   22   22   2    -- बहरे मीर

सब कुछ जाना पहचाना सा लगता है

मेरा ‘मै’ ही अनजाना सा लगता है

 

जिसकी अपने अन्दर से पहचान हुई

वो फिर सबको दीवाना सा लगता है

 

मन का खाली पन फैला यूँ वुसअत में

जग सारा अब वीराना सा लगता है

 

घर के हर कमरे की चाहत अलग हुई

बूढ़ा छप्पर  गम ख़ाना सा लगता है

 

दिल का हर कोना दिखलाये हैं  लेकिन

हर दिल में इक तहखाना सा लगता है

 

अपनेपन के अंदर भी अब…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on August 14, 2016 at 7:30am — 12 Comments

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