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हालात उतने भी ख़राब नहीं ( लघुकथा)

हालात उतने भी खराब नहीं



घड़ी पर नज़र डाल शांता बुदबुदाई, “छः बज गए, श्वेता ने फोन नहीं किया अभी तक! कितनी बार कहा है कि ऑफिस में मनाही है तो क्या हुआ, बाहर निकलने पर तो तुरंत फोन कर दिया करे. पता है पापा भी घर पर नहीं हैं और मैं अकेली हूँ, पर ये आज कल के बच्चे माता-पिता की चिंता समझे तब ना!”

‘ओह! अब तो साड़े छः हो गए, मैं ही कर लूँ,’ सोच शांता ने फोन मिलाया

टिक-टिक-टिक ट्रिंग!

फोन कट गया. दुबारा मिलाने पर दो बार ट्रिंग-ट्रिंग हुई और फोन कट गया. फिर चार बार, आठ… Continue

Added by Seema Singh on March 14, 2016 at 9:49am — 10 Comments

मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाती नहीं हो- ग़ज़ल

122 122 122 122



निगाहें भला क्यूँ मिलाते नहीं हो।

मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाते नहीं हो।।



छिपाते हो तुम राज अपने जिया के।

बताओ मुझे क्यों बताते नहीं हो।।



हैं चेहरे पे क्यों ये उदासी की पर्तें।

भला नूर क्यूँ तुम दिखाते नहीं हो।।



सघन वेदना के जो घन हैं हृदय में।

भला फिर क्यूँ दरिया बहाते नहीं हो।।



मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है।

सिवा इसके तुम मुस्कुराते नहीं हो।।



है 'पंकज'का नाता अगर नीर ही से।

तो नैनों में…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 14, 2016 at 12:00am — 17 Comments

ग़ज़ल(एतबार न कर )

ग़ज़ल(एतबार न कर )

---------------------------

2122 ----1212 -----112

मान मेरी सलाह प्यार न कर |

हुस्न वालों का एतबार न कर |

हो न  जज़्बात  जाएँ   बेक़ाबू

जानेजां हद वफ़ा की पार न कर

बेच दी जिन सुख़नवरों ने क़लम

उनके जैसा मुझे  शुमार न कर|

हुस्न वाले  वफ़ा नहीं  करते

तू यक़ीं उनपे  बार बार न कर |

आँख भीगी है और हंसी लब  पर

राज़े उल्फ़त को आशकार न कर |

वक़्ते रुख़सत निगाह नम…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 13, 2016 at 9:20pm — 12 Comments

ग़ज़ल-आह उफ कर ले रू ब रू न आए।

२१२२ १२१२ २२

क्यूं मुझे मौत की ये बू न आये।
तेरी याद आए और तू न आये।

जख्म दर जख्म चींख,दर्द,आह,उफ।
हाल-ए-दिल,शे'र हू-ब-हू न आये।

रोज देखे किसी को छुप के हम।
आह उफ कर ले रू ब रू न आए।

रोज आए नजर से लब तक हम।
पर लबों तक ये आरजू न आये।

वो ग़ज़ल क्या ग़ज़ल जिसे सुनकर।
दर्द की आँख में लहू न आये।

होंठ पर फूल और दिल काला।
मुझको ये इल्मे गुफ्तगू न आये।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on March 13, 2016 at 9:00pm — 14 Comments

कैनवास ...

कैनवास ...

मुझे बहुत खुशी हुई थी

जब हर शख़्श

तुम्हें सलाम कर रहा था

तुम्हारे हर रंग की कद्र हो रही थी

तुम वाहवाही के नशे में गुम थे //



भीड़ में तन्हा

मैं तुम्हारे चहरे को निहार रही थी

इतने चहरे लिए

न जाने लोग कैसे जी लेते हैं

खुद को ज़िंदा रखने के लिए

न जाने

कितनों की खुशियाँ पी लेते हैं //



तुम कैसे पुरुष हो

औरत चाहते हो पर

उसे समझ नहीं पाते

उसके अहसासों से खिलवाड़ करते हो

न जाने कौन से…

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Added by Sushil Sarna on March 13, 2016 at 6:16pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल-वक्त का अब हिसाब कौन रखे

2122 1212 112/22



वक्त का अब हिसाब कौन रखे

अपनी आँखों में आब कौन रखे



वक्त आखिर गुज़र ही जायेगा

सो तबीअत ख़राब कौन रखे



जब मुअय्यन नहीं कि कल क्या हो

तो भला इज़्तिराब कौन रखे



जब हर इक नक़्श तेरा किस्सा है

साथ अपने क़िताब कौन रखे



मुस्कुराने के हैं सबब लाखों

रुख पे अपने नक़ाब कौन रखे



सच से क्यों हो गुरेज़-पा कोई

थाली में आफ़ताब कौन रखे



फूट ही जाना है रवाँ होकर

सत्ह-ए-दिल पर हुबाब कौन… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on March 13, 2016 at 3:30pm — 6 Comments

सोने की चिडिया - (लघुकथा ) -

सोने की चिडिया - (लघुकथा )  -

"भाई साहब, आपने  घनश्याम  के साथ बहुत बडा अन्याय कर दिया"!

"ऐसा क्या होगया छोटे,  कुछ साफ़ साफ़ बोल ना"!

"आपके इस फ़ैसले पर सारी बिरादरी और खानदान थू थू कर रहा है"!

"किस फ़ैसले की बात कर रहा है "!

" घनश्याम की शादी का फ़ैसला ! ऐसी बदसूरत लडकी आजतक पूरे समाज और रिश्तेदारी में नहीं आयी, ना रंग, ना रूप, पता नहीं घनश्याम  जैसे गोरे चिट्टे, सुंदर,सजीले , शिक्षित और प्रोफ़ेसर बेटे के लिये यही एक लडकी मिली थी आपको"!

" छोटे, कभी कभी…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 13, 2016 at 10:45am — 10 Comments

पूरा अधूरा वायदा

पूरा अधूरा वायदा

शब्दों के अभाव में कहे-अनकहे के

कढ़वे अन्तराल में

पार्क में पत्थर के बैंच को साक्षी बना

आसान था कितना

हम दोनों का अलविदा के समय कह देना ...

" हो सके तो भूल जाना  तुम  मुझको "

" तुम  भी ..."

उस शाम के मेघों की वाणी में कुछ था, कुछ कहा

अत: वायदा वह पूरा हो न सका, न तुमसे, न मुझसे

रुँधी हुई ज़िन्दगी में भुलाने के असफ़ल प्रयास में

स्मृतिओं  के धुँआते खंडहर के…

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Added by vijay nikore on March 13, 2016 at 6:35am — No Comments

सूर्य से जो लड़ा नहीं करता (ग़ज़ल)

२१२२ १२१२ २२

 

सूर्य से जो लड़ा नहीं करता

वक़्त उसको हरा नहीं करता

 

सड़ ही जाता है वो समर आख़िर

वक्त पर जो गिरा नहीं करता

 

जा के विस्फोट कीजिए उस पर

यूँ ही पर्वत झुका नहीं करता

 

लाख कोशिश करे दिमाग मगर

दिल किसी का बुरा नहीं करता

 

प्यार धरती का खींचता इसको

यूँ ही आँसू गिरा नहीं करता

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2016 at 11:22pm — 8 Comments

औरत

औरत .

सिर्फ एक

माँ, पत्नी, प्रेमिका

बेटी, बहू, सास,

दादी, नानी

ही नहीं.....

एक जीता जागता उदाहरण भी है

त्याग, ममता, बत्सलता

और संघर्ष का भी...........

एक निर्मात्री भी

मूल्यों , संस्कारों, परम्पराओं

और इतिहास की...............

एक इज्जत भी 

घर कुटुंब, गाँव 

और देश की.....

पर शायद अर्थहीन हो गया है 

उसका सब कुछ होना भी

सिमट गया है 

उसका बिरात स्वरुप 

सिर्फ…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on March 12, 2016 at 3:32pm — 3 Comments

ग़ज़ल -नूर- कहानी नहीं चली.

ग़ज़ल 

२२१/२१२/११२२/१२१२ 



कश्ती थी बादबानी, हवा ही नहीं चली,

मर्ज़ी नहीं थी रब की सो अपनी नहीं चली.

.

ज़ह’न-ओ-जिगर की, दिल की, अना की नहीं चली

मौला के दर पे क़िस्सा कहानी नहीं चली.  

.

कितने थे शाह कितने क़लन्दर क़तार में,

धमक़ी तो छोड़ दीजिये, अर्ज़ी नहीं चली.

.   

धुलवा दिए थे अश्क-ए-नदामत से सब गुनाह,   

चादर वहाँ ज़रा सी भी मैली नहीं चली.

.

होता रहा हिसाब-ए-अमल, रोज़-ए-हश्र, ‘नूर’  

कोई वहाँ पे बात किताबी नहीं…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 11, 2016 at 7:00pm — 18 Comments

बेटी

पहचान है,ईमान है,

अिभमान है बेटी ।

पिता की आन है,

माँ की जान है बेटी ।।

बगिया का चंदन है,

आँगन की तुलसी है ।

घर के हर कोने में,

मुस्कान है बेटी ।।

पुष्पों की माला है,

पूजा की थाली है ।

आरती है मंदिर की,

मस्जिद में अजान है बेटी ।।

सावन की राखी है,

भाईदूज की रोली है ।

दो कुलों का मान बडाये,

ऐसी भाग्यवान है बेटी ।।

गंगा का जल है,

शीतल और निर्मल है ।

क़ुरान की आयत है,

गीता ज्ञान है बेटी ।।

दुर्गा… Continue

Added by Jeevan s. Rajak on March 11, 2016 at 5:28pm — 3 Comments

ग़ज़ल: कांच के जज़्बात

कांच के जज़्बात, हिम्मत कांच की

यार ये कैसी है इज्जत कांच की

.

पालते हैं खोखले आदर्श हम-

माँगते हैं लोग मन्नत कांच की

.

पत्थरों के शहर में महफूज़ है-

देखिये अपनी भी किस्मत कांच की

.

चुभ…

Continue

Added by Ravindra Prabhat on March 11, 2016 at 2:53pm — 2 Comments

धूप का होना - ग़ज़ल

गजल/धूप

*************

1222 1222 1222 1222

**************************

करो  तय दोस्तो  थोड़ा  जिगर में  धूप का होना

मिटा सीलन को देता है कि घर में धूप का होना /1



दुआ मागी थी रिमझिम में जरा सी धूप तो दे दो

अखरता क्यों तुझे  है अब डगर में धूप का होना /2



जहाँ  देखो  वहीं  जलवा  करें  साए  इमारत के

पता चलता किसे है अब नगर में धूप का होना /3



चलो आँगन में रख आए चटखती हड्डियों को अब

जरूरी   है  बुढ़ापे   की   उमर  में   धूप   का  होना…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2016 at 11:52am — 18 Comments

शिल्पी और धूप

सदा सच से दूर भागते

धूप ताप सब सह जाते

भगवान की मूर्ति बनाते

पूजा के हैं नियम बनाते

धर्म के पीछे ढोग रचाते

धूप दीप और नैवेद चढ़ाते

हवन के नाम अन्न जलाते

पत्थर पर हैं दूध पिलाते

भूखे बालक दूध न पाते

शिल्पी इनको जरा न भाते

उसे मूर्ति को छूने नहीं देते

मूर्ति को भगवान बताते  

मंत्रो का उच्चारण करते

सुबह शाम आरती करते

शंख मजीरा ढ़ोल बजाते

सदा सुख की आशा करते  

नारायण की कथा…

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Added by Ram Ashery on March 11, 2016 at 9:00am — 5 Comments

बिटिया को अपने अगर देखते हैं

बह्र- 122-122-122-122
बिटिया को अपनी अगर देखते है।।
खुदा का करम अपने घर देखते है।।

वो नीली परी है खिलौना है घर का।
उसे जब भी देखूँ समर देखते है।।

जो सज धज के बेटी की डोली उठी तो।
पड़ोसी भी भर के नजर देखते है।।

अभी तक पिता की दुआ का असर था।
ये बेटे तो अक्सर ही जर देखते है।।

वो पुरखों ने सींचा कभी प्यार से जो।
वही आज सूखा शजर देखते हैं।।

मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2016 at 9:32pm — 3 Comments

तुम्ही से ये सारा बसर देखते हैं

बहर 122/122/122/122

निगाहे नशा बेख़बर देखते है।
तुम्हे आज कल आँख भर देखते है।।

तुम्हारी अदा से जिधर देखते है।
मुहब्बत का अपने नगर देखते है।।

रूमानी है आबो हवा यार तेरी।
भरी बज्म में भी हुनर देखते है।।

जो सीखें हैं पेंचों के हमने करीने।
चलो आज उनका असर देखते है।।

तुम्ही गांव हो और* गालियाँ हमारी।।
तुम्ही से ये सारा बसर देखते है।।
मौलिक ,अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2016 at 9:28pm — 4 Comments

गजल(व्यंग्य),मनन

2212 12 12
मछली बड़ी तो' जाल क्या?
निकली अगर मलाल क्या?
चारा बड़ा भला लगा
टोनाा गया बवाल क्या?
बंसी मगर रही कहूँ-
बेधार की,निहाल क्या?
पिटता रहा दफा दफा
पीटता अभी कपाल क्या?
घोंपे गये छुरे बहुत
बतला नमकहलाल क्या?
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on March 10, 2016 at 7:56pm — No Comments

कितना टूटा कितना हारा

कितना टूटा कितना हारा

ज़िन्दगी ने कितना मारा



हर घङी मातम है

मायूसी का आलम है

चारों ओर निराशा है

अश्रुमिश्रित भाषा है

कलम भी मेरी सब है जाने

दु:ख के मेरे क्या हैं माने

कि झूठे उद्गारों की ज़द में गर में

खुशी कभी जो लिखना भी चाहूँ

झूठ नहीं यह सहती है

'गम ही गम हैं' कहती है।

नादां है यह ये न जाने जग में

सच ही सदा न चलता है

सफेदपोशी का नक़ाब ओढे

सफेद झूठ मचलता है

ऐसे झूठे मोती पिरो के

माला बनाना चाहूँ… Continue

Added by Ashish Painuly on March 10, 2016 at 6:36pm — No Comments

अनचाहा (लघु कथा )

मानसिक रूप से तैयार न होने के बावजूद उसने बीज डाल दिया और अंकुर भी फूट गया ।नौ माह कैसे सिंचित हुआ,चूसता रहा रस परजीवी बन कर ।
"लो ये आ गया आपका कुल दीपक ।"
बच्चे को सास के सुपुर्द करते हुए।"अब सम्हालो इसे।"

छुट्टी खराब कर दी छः महीने की और छः स्ट्रेच निल की बोतल ।

.

पवन जैन,जबलपुर।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Pawan Jain on March 10, 2016 at 5:00pm — 3 Comments

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