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शिल्पी और धूप

सदा सच से दूर भागते

धूप ताप सब सह जाते

भगवान की मूर्ति बनाते

पूजा के हैं नियम बनाते

धर्म के पीछे ढोग रचाते

धूप दीप और नैवेद चढ़ाते

हवन के नाम अन्न जलाते

पत्थर पर हैं दूध पिलाते

भूखे बालक दूध न पाते

शिल्पी इनको जरा न भाते

उसे मूर्ति को छूने नहीं देते

मूर्ति को भगवान बताते  

मंत्रो का उच्चारण करते

सुबह शाम आरती करते

शंख मजीरा ढ़ोल बजाते

सदा सुख की आशा करते  

नारायण की कथा सुनाते

फल फूलों का भोग लगाते

प्रभु दर्शन को पंक्ति बनाते

घंटों धूप में खड़े रह जाते

अज्ञानी किस्मत को रोते

ढ़ोगी को सब धन दे देते

मूर्ख श्राप का धौस जमाते  

झूठों की सब बात मानते,

सभी जगह साथ निभाते

जान की भी बाजी लगाते

गलत को सब सही बताते

पैसे के बल न्याय खरीदते

साम, दाम, दंड, भेद लगाते

दिन दोपहर को रात बताते

न्यायाधीश को पैसे पकड़ाते

सदा सच से सब दूर भागते

 

  मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 484

Comment

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Comment by Ram Ashery on March 13, 2016 at 5:04pm

आपको सहृदय  धन्यवाद ,अपना अमूल्य समय मेरी रचना को पढ़ने के लिए दिया 

Comment by Samar kabeer on March 13, 2016 at 2:58pm
जनाब राम अशरी जी आदाब,इस प्रस्तुति के लिये बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Ram Ashery on March 11, 2016 at 7:21pm

मेरी रचना को पढ़ने और बधाई संदेश लिखने के लिए आपको मेरी ओर से सहृदय धन्यवाद 

Comment by Dr.varsha choubey on March 11, 2016 at 3:17pm
बधाई आपको
Comment by Ram Ashery on March 11, 2016 at 11:53am

सहृदय धन्यवाद मेरी रचना को लोगों तक पहुँचने के लिए । 

कृपया ध्यान दे...

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