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चुप्पी

चुप्पी में
कई चीखते हुए सवाल हैं
शायद
जिनके उत्तर
किसी भी पोथी
किसी भी दिग्ग्दर्शिका
किसी भी धर्मग्रन्थ
में नहीं हैं
अगर रहे भी हों तो
उन्हें मिटा दिया गया है
हमेसा हमेसा के लिए
ताकि
इन चुप्पियों से
कोई आवाज़ न उठे
चुप कराने वालों के ख़िलाफ़

मुकेश इलाहबदी --------

मौलिक और अप्रकाशित

Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 4, 2016 at 11:11am — 13 Comments

उस पार ...

उस पार ...

सच मानिए

नदिया के उस पार तो

कुछ भी नहीं है

जो कुछ भी है

सब इस पार यहीं है

आरम्भ भी यहीं है

अंत भी यहीं है

खुद से मिलने का

खुद में समाया

जीव का अलौकिक

पंत भी यहीं है

उस पार तो

कुछ भी नहीं है //

एक घर से

दूसरे घर की दूरी

एक श्वास भर ही तो है //

एक स्वप्न और

यथार्थ की दूरी

एक श्वास भर ही तो है //

एक मिलन और

विछोह की दूरी

एक श्वास भर ही…

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Added by Sushil Sarna on February 3, 2016 at 8:40pm — 12 Comments

पिता

वो छुपाते रहे अपना दर्द

अपनी परेशानियाँ

यहाँ तक कि

अपनी बीमारी भी….

 

वो सोखते रहे परिवार का दर्द

कभी रिसने नहीं दिया

वो सुनते रहे हमारी शिकायतें

अपनी सफाई दिये बिना ….

 

वो समेटते रहे

बिखरे हुये पन्ने

हम सबकी ज़िंदगी के …..

 

हम सब बढ़ते रहे

उनका एहसान माने बिना

उन पर एहसान जताते हुये

वो चुपचाप जीते रहे

क्योंकि वो पेड़…

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Added by नादिर ख़ान on February 3, 2016 at 6:30pm — 12 Comments

बात आई गयी [लघु कथा ] प्रदीप कुमार पांडे

अपने बंगले के बगीचे की दीवार के पास जमा भीड़ देखकर उसने गाड़ी रोक दी I

" क्या हुआ "? बाहर निकल उसने पूछा I

"कोई भिखारी मर गया "I

" कैसे ?"

" कैसे क्या साहब ,ठण्ड से अकड़ कर I पिछले कुछ दिनों से  यहीं पड़ा रहता था दीवार के पास I"

गाड़ी  में  बैठते उसे लगा ,उसका सारा शरीर ठण्ड से जमा जा रहा है I चार दिन पहले पत्नी ने कहा था कि पुराने गर्म कपडे कम्बल  काफी जमा हो गए हैं , कहीं दान करने चलना है I और फिर बात आई गयी हो गयी थी I

" अरे, अब क्या चद्दर डाल रहे हो…

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Added by Pradeep kumar pandey on February 3, 2016 at 6:18pm — 7 Comments

ढोर( लघुकथा)राहिला

सांझ ढले एक गडरिया अपनी भेड़े चरा कर लौट रहा था।रास्ते में एक बाजार से गुजर हुआ।वहां एक दुकान मे लगे काले शीशे में अपना अक्स देख,सबसे आगे चल रही भेड़ को दुकान के अंदर दूसरी भेड़ होने का भ्रम क्या हुआ,वो तो दुकान में घुसी ही,साथ उसके भेड़चाल से सारी की सारी भेड़े भी जा घुसी । देखते ही देखते अंदर धमाचौकड़ी मच गई । काफी जतन के बाद जैसे-तैसे उन्हें बाहर निकाला गया ।लेकिन इस घटना के चलते दुकानदार का काफी नुकसान हुआ और नौबत झगड़े तक पहुँच गई । लेकिन कुछ सियाने लोगों के हस्तक्षेप से मामला तूल नहीं… Continue

Added by Rahila on February 3, 2016 at 6:05pm — 29 Comments

शनि (लघुकथा)

विवाद समाप्त होते न देख,मामले को कोर्ट के सुपुर्द कर दिया।शनि को भी पार्टी बनाया गया,बकायदा समन भेजा गया।निर्धारित तारीख पर कोर्ट में उपस्थिति हेतु आवाज लगाई।सभी पार्टियां मुस्कुरा रही थी,हूंह अब शनि आयेंगे गवाही देने।तत्क्षण विटनेस बाक्स में भुजंग काला सुगठित शरीर,गदा लिए,दिव्य प्रकाश के साथ उपस्थित हुए।विस्मय से चकित न्यायाधीश ने शपथ की कार्रवाई कराई ।

"सत्य बोलूंगा,सत्य के सिवा कुछ नहीं बोलूंगा,जो भ्रमित है ,उन्हें भी सत्य पर चलना सिखाता हूँ।"

" तो प्रवेश पर रोक क्यों…

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Added by Pawan Jain on February 3, 2016 at 8:47am — 15 Comments

उपेक्षित......

उपेक्षित....

दसों दिशाओं में डंका बजाता

चक्रवर्ती सम्राट......दिन!

यशस्वी-प्रकाशवान

निरंतर गतिमान

नित्य महासमर के उपरांत शिथिल,

क्लांत वश पिघल जाता

रक्त का कण-कण

संगठित करता लाल सागर

विचलित होती आत्मा

अश्रु आश्चर्यचकित...!

कपोलों पर ठिठके...

हवाएं अट्टहास करती

मचलती ज्वार-भाटा आदत से…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 3, 2016 at 7:12am — 9 Comments

भर कर जेबें रोज चढ़े है - ( ग़ज़ल ) -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर "

2222    2222     2222    222



सुनते सुनते  गीत प्रेम का क्या सूझी पुरवाई को

कोयल आँसू भर भर देखे आग लगी अमराई को /1



बात कहूँ तो बन जाएगी जग की यार हँसाई को

जैसे तैसे झेल रहा  हूँ  जालिम की रूसवाई को /2



दिन तो बीते आस में यारो शायद चलती राह मिले

किन्तु पुराने खत पढ़  काटा  रातों की तनहाई को /3



वो साहिल की रेत देख कर चाहे यूँ ही लौट गया

ख्वाबों में  देखेगा  लेकिन  दरिया की गहराई को /4



भर कर जेबें  रोज चढ़े है मस्ती  को सैलानी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2016 at 12:05am — 16 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
यशोधरा.......अतुकांत // डॉ० प्राची

सुधि-बुधि बिसराई

व्याकुल पनीली आँखें,

अधखुले केश, बेसुध आँचल

अस्त-व्यस्त आभूषण...

कराहती सिसकती चीत्कारती

पल-पल जमती जाती करुण वाणी से

कहाँ-कहाँ नहीं पुकारा-

पर,

लौट-लौट आती थी

हर पुकार की कर्णपटों को बेधती

हृदय विदारक प्रतिध्वनि...

लिख चुकी थी नियति

यशोधरा के भाग्य में

अंतहीन  निष्ठुर विरह...

कितनी प्रबल रही होगी

सत्यान्वेषण को आतुर

अंतरात्मा की वो पुकार,

कि नहीं थम…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 2, 2016 at 11:30pm — 4 Comments

ख़िज़ाओं का नहीं होता दरख़्तों पर असर कोई (ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222



गया है सींचकर जो बाग़-ए-दिल को, इक नज़र कोई

ख़िज़ाओं का नहीं होता दरख़्तों पर असर कोई



दिलों के दरमिया इक़रार कोई हो गया था,पर

न थी उनको ख़बर कोई, नहीं मुझको ख़बर कोई



मुक़द्दर हर किसी पे मेह्रबां होता नहीं यारो

कहीं क़दमों में है मंज़िल, भटकता दर-ब-दर कोई



भरोसा है हमें चारागरी पर हद से भी ज़्यादा

मरीज़-ए-इश्क़ पालेगा न मर्ज़ अब उम्र-भर कोई



सियासत खून पीने की बड़ी शौक़ीन लगती है

छुड़ा पाता ये चस्का खून का ऐ काश अगर… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on February 2, 2016 at 8:30pm — 23 Comments

वेदना और तृप्ति (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"सही कहा जाता है कि दिन सभी के बदलते हैं।"

"कहाँ से कहाँ-कहाँ पहुँच गए थे! क्या से क्या हो गए थे हम!"

"आख़िर अब साथ साथ यहाँ पहुँच ही गए!"

"कितना सुकून मिलता है यहाँ आकर, सारी हसरतें पूरी हो जाती हैं, है न! "

'रिसेप्शन (प्रीति-भोज)' के शानदार काउन्टरों के चमकते डिशों से वेस्टबिन तक पहुँची जूठनें अब भूखे भिखारियों और बाल-मज़दूरों की क्षुधा शांत कर रहीं थीं।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 2, 2016 at 8:17pm — 4 Comments

रुक गई बहती नदी (नवगीत)

काम सारे

ख़त्म करके

रुक गई बहती नदी

ओढ़ कर

कुहरे की चादर

देर तक सोती रही

 

सूर्य बाबा

उठ सवेरे

हाथ मुँह धो आ गये

जो दिखा उनको

उसी से

चाय माँगे जा रहे

 

धूप कमरे में घुसी

तो हड़बड़ाकर

उठ गई

 

गर्म होते

सूर्य बाबा ने

कहा कुछ धूप से

धूप तो

सब जानती थी

गुदगुदा आई उसे

 

उठ गई

झटपट नहाकर

वो रसोई में…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 2, 2016 at 3:44pm — 12 Comments

ये शबे -गम किसने दी दिल को / गजल

ये शबे-गम किसने  दिया  दिल को

किसने अपना बना लिया दिल को



मेरी नजरों में तेरे ख्वाब सनम

कह रहे हैं ये शुकरिया दिल को



इश्क तुमसे किया है शिद्दत से

और बे चैन कर लिया दिल को



पीला-पीला बसंती सा आंचल

मिस्ल-ए-गुलशन बना गया दिल को



चाँदनी दूर जा के चमके कहीं

हमने अब तो जला लिया दिल को



रूठी तकदीर आज जागी है

कौई तकदीर दे गया दिल को



छुप गया चाँद रात होने पर

उसने जब प्यार से छुआ दिल को



तंग…

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Added by kanta roy on February 2, 2016 at 1:00pm — 5 Comments

कायम जड़ें (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"सर, आज इसको भी आतंकवादियों ने निपटा दिया!"

"देखो, शायद जान बाक़ी है इसमें!"

"सर, इसका तो पूरा धड़ उड़ा दिया हत्यारों ने!"

"लेकिन पैर हैं, जड़ें कायम हैं, आहार मिलेगा तो शायद जी उठे!"

बच्चे पुलिस-पुलिस और सी.आइ.डी. का खेल खेलते हुए पेड़ के बचे ठूंठ पर ऐसा बोल गये जैसे कि किसी धर्म और संस्कृति पर बात हुई हो!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 2, 2016 at 9:25am — 7 Comments

अनवरत संघर्ष ( लघु-कथा ) - डॉo विजय शंकर

ऋग्वेद से लेकर पुराणोँ तक में देव-दानवों के युद्ध के वर्णन मिलते हैं। दानवों से त्रस्त देवता प्रायः ब्रह्मा के पास मार्ग- दर्शन , सहायता और सहयोग के लिए जाते हुए चित्रित मिलते हैं। युद्ध और युद्ध में शस्त्र की महत्ता को स्वीकार करते हुये देवता दधीच ऋषि के पास भी जाते हुए दर्शाये गए हैं। देवता विजयी भी होते थे पर न दानव समाप्त हुए न देवता अकेले रह कर सदैव के लिए अपना वर्चस्व ही स्थापित कर पाये। वास्तव में ये दोनों अच्छाई और बुराई के प्रतीक के रूप में देखें जाएँ तो स्थिति अधिक स्पष्ट होती नज़र… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 2, 2016 at 8:21am — 5 Comments

सनसनाते हुए बाण: लघुकथा :हरि प्रकाश दुबे

 

शाम का समय था और गाँव के बाजार में अचानक किसी ने मास्टर जी की साईकिल को पीछे से पकड़ कर रोक लिया और बोला, “अरे पहचानिए–पहचानिए ।’’

 

“अच्छा रुकिये जरा नजदीक से देखने दीजिये -मास्टर जी ने अपना चश्मा लगाया और बोले -अरे रामजी मिश्रा, तुम! कब आये दिल्ली से? और बताओ, कर क्या रहे हो आजकल ?”

 

“रिक्शा ठेल रहा हूँ साले तुम्हारी कृपा से, साला जिंदगी नरक हो गयी है दिल्ली की सड़कों पर, जिसको देखो वही १-२ रुपयों के लिए लतिया कर चल देता है, न ढंग की जगह है रहने को, न…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on February 2, 2016 at 12:52am — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कुछ दोहे .....( प्राची )

नहीं इतर इससे कभी, ना कम ना अतिरिक्त

जीवन प्रभु की प्रीत से, रहे सदा संसिक्त



मन के कञ्चन भाव सब, आँके ना निर्मोल

सौदागर की लो प्रथम, नीयत ज़रा टटोल



पंछी उड़ उन्मुक्त अब, अपने पंख पसार

खींच लकीरें आज नव, अम्बर के उस पार



दृढ़ इच्छित पग थाप पर, पर्वत देंगे राह

मूर्त ढले हर कामना, प्रबल रहे जो चाह



बन जाओ दिनमान के, स्वतः एक पर्याय

उज्वल स्वर्णिम तेजमय, लिख दो हर अध्याय



सरल सहज व्यक्तित्व हो, बातें सब हों गूढ़

मन अंतर… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on January 31, 2016 at 2:46pm — 9 Comments

ग़ज़ल ( पत्थर निकला)

ग़ज़ल (पत्थर निकला ) -------------------------

- 2122 ---1122 ---1122 --22

मेरि बर्बाद मुहब्बत का  ये   मंज़र    निकला  /

 जिसको उल्फत का ख़ुदा समझा वो पत्थर निकला /

दिल को तस्कीन तो हासिल हुई हमदर्दी   से

पर निगाहों  से नहीं  ग़म का समुन्दर  निकला /

ज़ुल्म ने जब भी ज़माने में उठाया है सर

लेके ख़ुद्दार क़लम अपना सुख़नवर   निकला /

नीम शब मिलने की तदबीर भी बेकार गयी

सुबह होते ही गली कूचे में महशर  निकला…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 31, 2016 at 12:56pm — 21 Comments

मोहब्बत का रंग

रंगों की दुनिया में असुरक्षा का माहौल बनता देख लाल ,पीले और नीले रंग के मंत्रियों ने सफ़ेद रंग के सरदार से आपात मीटिंग बुलाने को कहा /हर तरह के रंगों को आमंत्रित किया गया /.... मीटिंग शुरू हुई --मुद्दा था ऐसा क्या करें कि हर वर्ग हमें प्यार से देखे /..... लाल और पीले रंग बोल उठे ,हमारे रंग को हिन्दुओं ने पसंद कर लिया ,मुसलमान हमारी तरफ अजीब नज़रों से देखते हैं /.... नीले और पीले एक साथ  कहने लगे हम दोनों से बने हरे रंग को मुसलमानों ने अपना लिया , हिन्दू हमें नफरत की नज़र से देखते हैं /.....…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 31, 2016 at 10:00am — 7 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122 212

दोष उनको दे रहे क्यूँ आप कुछ तो बोलिये

मौन यह कबतक चलेगाआज मुँह तो खोलिये।1



सिर रहे धुन क्या मिला आगे मिलेगा और क्या

याद करनाआप क्यूँ ऐसे किसीके हो लिये।2

पर्व था जनतंत्र का चलते जरा आगे कहीं

मिल गये नाले समझ नद आपने मुँह धो लिये।3

हाथ में डोरी पड़ी थी हाँकते रथ और भी

घिर गयी क्षणभर घटा ढीले पड़े फिर सो लिये।4

आपके वरदान से राजा बने कितने सभी

मिल गया थोड़ा कहीं फिर तो बहुत कुछ खो…

Continue

Added by Manan Kumar singh on January 31, 2016 at 8:30am — 14 Comments

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