For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

बाल श्रमिक (कविता)

हरिया का बेटा हरिलाल

उम्र यही कुछ आठ साल

पढ़ता था तीसरी कक्षा में

आता था प्रथम प्रत्येक साल।।



बापू ने लगा दिया उसको

पास ही के इक भट्ठे पर

भरी जीवन का कुछ बोझा

लाद दिया उसके सर पर।।



वह बालक जिसकी उम्र यही

पढ़ लिख कर कुछ बननें की थी

जिसके जीवन की गिनती

मात्र अभी थी शुरू हुई।।



वह हाथ लिए फरसा झौव्वा

अब नित्य काम पर जाता था

बदले में रोटी की ख़ातिर

कुछ कमा धमा कर लाता था।।



समझाया मैंने हरिया… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 25, 2015 at 9:57pm — 5 Comments

ग़ज़ल :- महल के सामने मिट्टी का घर अच्छा नहीं लगता

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन



सभी कहते हैं मुझको भी 'समर' अच्छा नहीं लगता

महल के सामने मिट्टी का घर अच्छा नहीं लगता



ख़ुदा का दीन सबको अम्न का पैग़ाम देता है

हो बे अमनी ख़ुदा के नाम पर अच्छा नहीं लगता



जो हैं नादान वो इसके लिये लड़ते हैं आपस में

जो दाना हैं उन्हें ये माल-ओ-ज़र अच्छा नहीं लगता



मेरी इस बात की यारों दलील-ए-मुस्तनद ये है

वो मेरे साथ क्यों होते अगर अच्छा नहीं लगता



शरारत और शौख़ी ही भली मालूम होती है

किसी भी… Continue

Added by Samar kabeer on August 25, 2015 at 5:18pm — 19 Comments

ख़्वाब :......

ख़्वाब :....

हकीकत के बिछोने पर

हर ख़्वाब ने दम तोड़ा है

नहीं, नहीं

ख़्वाब कहाँ दम तोड़ते हैं

हमेशा इंसान ने ही दम तोड़ा है

हर टूटता ख़्वाब

इक नए ख़्वाब का आगाज़ होता है

हर नया ख़्वाब

फिर इक तड़प दे जाता है

और चलता रहता है

सूखे हुए गुलाबों की

सूखी महक में जीने का सिलसिला

इंसान को शबनमी ख़्वाबों में

फ़ना होने की

आदत सी हो गई है

बस, ख्वाब को मंज़िल समझ

अंधेरों से लिपट कर जीता है

दर्द को साँसों में घोल…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 25, 2015 at 3:57pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दुनिया बिलकुल छोटी है (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

22---22---22---2

 

फूलों में सरगोशी है

सच की खुशबू फैली है

 

मुमकिन को भी मायूसी

नामुमकिन कर देती…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on August 25, 2015 at 3:30pm — 19 Comments

मेरा गॉंव

अपने गॉंव पर एक गीत लिखने का प्रयास

बहर 1222   1222    1222   1222 छूट नियमानुसार लेने का प्रयास

कहानी आज गहमर की सुनो सबको सुनाते है

बना तस्‍वीर इक प्‍यारी सभी को हम दिखाते है



बकस बाबा का है मंदिर, लिये बस नाम जो आता ।

न मरता साँप का काटा, खुशी मन से वो घर जाता।

बचाने में गौ माता को, गई थी जान ही जिसकी ।

न उस बरसाल को भूले, करें पूजा सभी उसकी ।।

हमारे गाँव में गंगा, लगे मेला यहाँ हरदम ।

बने हैं घाट सब पक्के, न शहरो से दिखे कुछ…

Continue

Added by Akhand Gahmari on August 25, 2015 at 9:37am — 3 Comments

डस्ट-बिन....(लघुकथा)

“अरे बिटिया यह क्या..? पूरे कमरे में  पैकिंग वाले कागजों का कचरा फैला रखा है..”

“मम्मी!! वो क्या है कि मुझे एक-दो दिन हो गये , मेरा टाईम आये.  आप कहती थी, न. कि ऐसे समय में पति की बहुत जरुरत होती है, हर नवविवाहिता को. तो मैं उनके पास जाने की तैयारी कर रही थी.."

“हाँ..बिटिया ! आदमी को तो रोज औरत चाहिए, और औरत का बस यही टाईम मजबूर करता है . बस! तू एक बार उसे, संयुक्त परिवार से निकाल ले. क्यूंकि मैं अपनी तरह तुझे भी, खुश देखना चाहती हूँ. तू अभी जा, फिर मैं बुला लूंगी किसी…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on August 25, 2015 at 3:30am — 3 Comments

चुनौती /लघुकथा /कान्ता राॅय

आज कोचिंग से निकलने में देर हो गई थी , इसलिए घर जल्दी पहुँचने के लिए उसने मेन रोड छोड़ इसी गली से निकलने का फैसला किया था । हालांकि रात में इस गली से निकलने के लिए मम्मी ने मना किया था लेकिन आज बडी़ ही मजबूरी हो चली थी । कलाई पर बंधी घड़ी की सुई पर नजर पडते ही वो सहम उठी । गली सुनसान -सन्नाटा हुआ जा रहा था । करीब दस फर्लांग ही आगे बढीं होगी कि पीछे से आहट आई । उसे भान हुआ कि कोई पीछे आ रहा है । पलट कर देखा । दो लडके थे । स्थिति को भाँप वो लम्बी - लम्बी डग भरने लगी । पीछे से पदचाप की आवाजें…

Continue

Added by kanta roy on August 24, 2015 at 11:30pm — 17 Comments

बैठे-ठाले

तन्हाई चीखती है कहीं

पगलाई-सी हवा धमक पड़ती है ।

अंधेरे में भी दरवाजे तक पहुँच कर

बेतहाशा कुंडियाँ खटखटाती है।

अकेला सोया पड़ा इंसान अपने ही भीतर हो रहे शोर से

घबड़ा कर उठ बैठता है ।

मोबाइल में चौंक कर देखता है समय

“रात के ढ़ाई ही तो अभी बजे हैं “ बुदबुदाता है।

सन्नाटा उसकी दशा पर मुस्कुराता है।

उधर दुनिया के कहीं कोने में

भीड़ भूख-प्यास से बेकाबू हो कर सड़को पर नहीं निकलती,

सामूहिक आत्महत्याएं कर रही होती…

Continue

Added by MAHIMA SHREE on August 24, 2015 at 8:30pm — 9 Comments

फ़ास्ट फॉरवर्ड [लघु कथा ]

"यहाँ आम ,यहाँ अमरुद और वहां पर पपाया के पेड़ लगायेंगे ,ठीक मम्मा ? पेड़ लगाने के लिए उसके दस साल के बेटे का उत्साह फूटा पड़ रहा था I

एक महीने पहले ही वो लोग अपने इस नए बने घर में आये थे Iबगीचे वाले घर का उसका बचपन का सपना अब आकार  ले रहा थाI क्यारियाँ तैयार थीं ,बस पौधे  रोपने थे I

"मम्मा ,अपना बगीचा भी बुआ दादी के बगीचे जैसा बन जायेगा ना एक दिन ?खूब सारे बड़े बड़े पेड़ और ...."I

बेटे की चेहरे की चमक ने एकदम उसके दिमाग का फ़ास्ट फॉरवर्ड का बटन दबा दिया ...Iबेटा बहु  ,पोते पोती…

Continue

Added by pratibha pande on August 24, 2015 at 6:30pm — 14 Comments

खाली खाली सी ज़िन्दगी (मुक्त कविता)

जिंदगी कुछ खाली खाली सी लगती है 

दुनिया अचानक सुनसान सी लगती है 

खुशियों में आज इक तड़प सी क्यों है 

दिल दर्द के बिना परेशान सा क्यों है 

तुझ से कुछ भी तो नहीं माँगा ऐ खुदा 

फिर आसपास हंसी की फुहारे क्यों है 

चाहत नहीं हँसते नजारों की अल्लाह 

फिर सूनी सी बगिया में बहारें क्यों है 

नशा जो मांगती हूँ ग़म-ए-मुहब्बत का 

ऐ मेरे खुदा, फिर आज आंख में आंसू 

और इन जख्मों में मवाद कम क्यों है 

जिन्हें पाने की आस में तड़पे थे रात दिन 

वो दूरियां…

Continue

Added by Nidhi Agrawal on August 24, 2015 at 1:00pm — 8 Comments

कलयुग हैं , कलियुगी होना चाहिए ---डॉo विजय शंकर

आदमी को समय के साथ चलना चाहिए

कलयुग में हैं तो कलियुगी होना चाहिये ॥

चालाकियां होश्यारियां हुनर सब अपने लिए हैं

काम दूसरे का हो तो मासूम बन जाना चाहिए ॥

अपने सब काम क़ानून को ताख पर रख कर कर लें

दूसरे को सारे नियम क़ानून बताना चाहिए ॥

बात किसी की कभी काटनी नहीं चाहिए

काम किसी का भी हो करना नहीं चाहिए ॥

कहना किसी का भी हो मोड़ना नहीं चाहिए

तिनका किसी के लिए भी तोड़ना नही चाहिए ॥

आदमी को समय के साथ साथ चलना चाहिए

कलयुग में हैं तो घोर कलियुगी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 24, 2015 at 8:30am — 16 Comments

गजल(मनन)

2212 2122
मूरत बनी रंग भरते!
दोस्ती निभा दंग करते!
कोई बना कुछ रहा अब
कुछ तो नियम भंग करते।
उनकी कथा क्या कहूँ अब
हिन्दी हसीं तंग करते।
लिखते अलिपि आँख मूँदे
सब रंग बद रंग करते।
वह तो खड़ी, है भरी वह,
वे छेड़ क्यूँ अंग करते?
"मौलिक व अप्रकाशित"@ मनन
खड़ी=खड़ीबोली
छेड़=छेड़छाड़
अलिपि=लिपि से बाहर

Added by Manan Kumar singh on August 23, 2015 at 10:30pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
नाम माशूक का तो खूँ से लिखा करते थे(तरही ग़ज़ल 'राज')

चीर चट्टान के सीने को मिला करते थे

तब मुहब्बत में सनम लोग वफ़ा करते थे  

 

काट देता था ज़माना भले ही पर नाजुक 

होंसलों से नई परवाज़ भरा करते थे

 

दिल के ज़ज्बात कबूतर के परों पर लिखकर

प्यार का अपने वो  इजहार किया करते थे

 

कैस फ़रहाद या राँझा कई दीवाने तब   

नाम माशूक का तो खूँ से लिखा करते थे

 

एक हम थे  जो जमाने  की नजर से डरकर

जल्द खुर्शीद के ढलने की दुआ करते थे 

 

आज वो रह गए केवल मेरा…

Continue

Added by rajesh kumari on August 23, 2015 at 10:00pm — 19 Comments

हम भी दबंग हैं, दमदार किसम के

221 122 221 122



एक नए किस्म की- नए प्रयोग वाली ग़ज़ल

=======================================

मुस्कान दिखा के, बे-हाल बना के।

होंठों की लकीरों, का जाल बिछा के।।



यूँ आँख मिला के, जो तीर चलाया।

आया हूँ मैं जाना, दरख्वास्त लिखा के।।



जाओ न ज़रा तुम, जाओगे कहाँ अब।

दीवाने दरोगा, की नींद उड़ा के।।



संगीन दफ़ा है, चालान करेंगे।

करना है हवाले, तुमको वफ़ा के।।



तुम्हें प्रेम पाश में, गिरफ्तार करेंगे।

हम भी दबंग हैं, दमदार… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 11:30am — 13 Comments

होश खोने की तलब है और मयखाना वहाँ

होश खोने की तलब है और मयखाना वहाँ।

है असम्भव आदतों को छोड़ दे पाना यहाँ।।



किस तरह तन्हा गुज़ारें ज़िंदगी का ये सफ़र।

नींद आँखों में नहीं कैसे हो सो जाना यहाँ।।



राह सुनी ही रही अब तक निगाहें हैं खुली।

आज भी हासिल रहा उनका नहीं आना यहाँ।।



चैन का आलम न पूछें नब्ज़ में तूफ़ान है।

है कठिन बरसात के मौसम को रुकवाना यहाँ।।



हसरतों की नाव सागर के हवाले छोड़ना।

एक मांझी की ख़ता मुश्किल है बतलाना यहाँ।।



कोई उनको बोलिये नैनों के सागर के… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 11:30am — 13 Comments

दर्द (लघुकथा)

"दामादजी को छोड़ना चाहवे है, अरे! पति बिना भी कोई जगह होवे है औरत की।" पति को छोड़ मायके आयी बेटी को माँ समझाना चाह रही थी।

"माँ! मैं कोई भी काम कर अपनी बच्ची पाल लूँगीं लेकिन अब वापिस नही जाऊँगी।"

"ये क्या कह रही है तु छोरी, ऐसा आखिर क्या हो गया?"

बस माँ। मैं 'उस नशेबाज' को और बर्दाश्त नही कर सकती, सारा दिन बस पीना, हंगामा करना और.......।"

"तो क्या हुआ छोरी, तेरा बापू न पिये, मैंने तो न छोड़ दिया उसे।" माँ ने कुछ तमक कर बेटी की बात काट…

Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on August 23, 2015 at 11:00am — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कुछ तो कहो, कुछ जवाब दो -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

221—2121—1221—212

 

जुगनू से मांगने को चला है कि ताब दो

बेचैन हो गया है बशर  फिर नकाब दो

 

इस तिश्नगी से हम न कभी मुतमईन थे…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on August 23, 2015 at 9:30am — 20 Comments

ग़ज़ल : उनकी आँखों में झील सा कुछ है

बह्र : २१२२ १२१२ २२

-------------

उनकी आँखों में झील सा कुछ है

बाकी आँखों में चील सा कुछ है

 

सुन्न पड़ता है अंग अंग मेरा

उनके हाथों में ईल सा कुछ है

 

फैसले ख़ुद-ब-ख़ुद बदलते हैं

उनका चेहरा अपील सा कुछ है

 

हार जाते हैं लोग दिल अकसर

हुस्न उनका दलील सा कुछ है

 

ज्यूँ अँधेरा हुआ, हुईं रोशन

उनकी यादों में रील सा कुछ है

--------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 23, 2015 at 12:00am — 16 Comments

हम "पत्थर" भी पूजे जाते

आ जाते इक बार अगर जो

तुम हमको भी चूमे जाते।

कई शिलाएं देव हुई हैं

हम "पत्थर" भी पूजे जाते।।



राहों में बेजान पड़े हैं

अपनी गति को ढूंढ रहे हैं।

कभी इधर तो कभी उधर को

राहों में बस घूम रहे हैं।।



अपने सुर्ख गुलाबी वाले

मुझमें रंग जो भरके जाते।

कई शिलाएं देव हुई हैं

हम "पत्थर" भी पूजे जाते।।1।।



ये तन है पर प्राण नहीं है

सांस का कुछ भी पता नहीं है।

दिल तो है पर शांत बहुत है

जीवित हूँ यह एक भ्रान्ति… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 21, 2015 at 10:06pm — 15 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
1 hour ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
2 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
2 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
2 hours ago
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service