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2212 2122
मूरत बनी रंग भरते!
दोस्ती निभा दंग करते!
कोई बना कुछ रहा अब
कुछ तो नियम भंग करते।
उनकी कथा क्या कहूँ अब
हिन्दी हसीं तंग करते।
लिखते अलिपि आँख मूँदे
सब रंग बद रंग करते।
वह तो खड़ी, है भरी वह,
वे छेड़ क्यूँ अंग करते?
"मौलिक व अप्रकाशित"@ मनन
खड़ी=खड़ीबोली
छेड़=छेड़छाड़
अलिपि=लिपि से बाहर

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on August 27, 2015 at 6:15pm
आदरणीय गिरिराज भाई,मुझे भी ऐसा बी अहसास हुआ9; कुछ शेर जुड़ेंगे शायद अब।
Comment by Manan Kumar singh on August 27, 2015 at 6:11pm
आभार रवि जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 27, 2015 at 9:55am

आदरणीय मनन भाई , छोटी बह्र मे ग़ज़ल प्रयास के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ । बह्र बड़ी लिये होते तो शायद बात और अच्छे से कह पाते , ऐसा मुझे लगता है , छोटी बह्र में बात समा नही पाई ऐसा लगता है ।

Comment by Ravi Shukla on August 26, 2015 at 2:05pm

बधाई प्रयास के लिये आदरणीय मनन जी

Comment by Manan Kumar singh on August 26, 2015 at 10:14am
आदरणीय गोपाल भाई,मिथिलेश जी व आदरणीया कांता जी,प्रेरक टिप्पणी हेतु धन्यवाद ।गोपाल भाईजी,कुछ अवरुद्ध -सा है; गजल आगे बहेगी,कुछ और कहेगी,शायद।
Comment by kanta roy on August 25, 2015 at 9:03am

बढिया प्रस्तुति ....... बधाई आदरणीय मनन कुमार जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 24, 2015 at 12:07pm

प्रस्तुति हेतु बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 24, 2015 at 10:37am

कविता आगे  बढ़ते बढ़ते ठहर सी जाती है . सादर.

कृपया ध्यान दे...

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