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हम भी दबंग हैं, दमदार किसम के

221 122 221 122

एक नए किस्म की- नए प्रयोग वाली ग़ज़ल
=======================================
मुस्कान दिखा के, बे-हाल बना के।
होंठों की लकीरों, का जाल बिछा के।।

यूँ आँख मिला के, जो तीर चलाया।
आया हूँ मैं जाना, दरख्वास्त लिखा के।।

जाओ न ज़रा तुम, जाओगे कहाँ अब।
दीवाने दरोगा, की नींद उड़ा के।।

संगीन दफ़ा है, चालान करेंगे।
करना है हवाले, तुमको वफ़ा के।।

तुम्हें प्रेम पाश में, गिरफ्तार करेंगे।
हम भी दबंग हैं, दमदार जहाँ के।।

मुजरिम हो मगर तुम, कुछ और तरह के।
अरदास करेंगे,हम दिल में बसा के।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 27, 2015 at 10:08am
हर्ष महाजन सर सादर आभार।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 27, 2015 at 10:07am
जी भंडारी सर सादर आभार।
Comment by Harash Mahajan on August 27, 2015 at 9:26am
आदरणीय पंकज जी ग़ज़ल में नये प्रयोग हेतु बधाई । सादर ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 27, 2015 at 7:32am

आदरणीय पंकज भाई , गज़ल के प्रयास के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ । मुझ्हे लगता है अभी यहाँ उपलब्ध पाठों का अभी और अध्ययन करना चाहिये , बहर भी अपने हिसाब से लेने के बजाये जो बहर मान्य हैं उन पर गज़ल कहने का प्रयास करें तो अच्छा होगा ।

Comment by Ravi Shukla on August 26, 2015 at 2:24pm

आदरणीय पंकज जी नये प्रयोग के लिये बधाई स्‍वीकार करें

तुम्हें प्रेम पाश में, गिरफ्तार करेंगे।
हम भी दबंग हैं, दमदार जहाँ के।। बह्र के मुताबिक इस शेर को फिर से देख सकते है तो हमें भी आसानी हो जाएगी ।

Comment by kanta roy on August 25, 2015 at 9:15am

मुजरिम हो मगर तुम, कुछ और तरह के। अरदास करेंगे,हम दिल में बसा के....... वाह !!!!! बडी़ सिपहियाना स्टाईल में ये गजल हुई है आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी ..... बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 24, 2015 at 10:29am
आदरणीय गोपाल सर बस सीख रहा हूँ अभी; ऊर्जान्वित करनें के लिए सादर आभार।

वामनकर सर मैंने यहाँ भी आपके सुझाव के अनुरूप सुधार किया है।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 24, 2015 at 10:26am

पंकज जी

आपकी प्रयोगधर्मिता आश्वस्त करती है  .

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 11:23pm
हाँ सही कह रहे हैं वामनकर सर;सुधर दूंगा जल्दी ही

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 23, 2015 at 11:20pm

आदरणीय पंकज जी, मतले में काफिया 'आ' और रदीफ़ 'के' बनाने के बाद आप उसे बिलकुल भूल गए. प्रयोग पर पुनर्विचार निवेदित है.

मतला यूं किया जा सकता है -

मुस्कान दिखा के, बे-हाल बनाये 
होंठों की लकीरों, का जाल बिछा के

बहरहाल बढ़िया प्रयोग हुआ है. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई ...सादर 

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