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कैसे जाएगी याद दिल को बताऊं कैसे - शीवेन्द्र

कैसे जाएगी याद दिल को बताऊं कैसे
मेरी नजरों में बसी तस्वीर हटाऊं कैसे।


उसने आवाज तलक भी नहीं दी मुझे
खुद के जीने के लिए सांस जुटाऊं कैसे।


की बड़ी दूर से थी मौहब्बत हमने
जख्म उनको मैं दिखाकर रूलाऊं कैसे।


अब हवाओं से दीवार यहां हिलती है
अपने सपनों की तस्वीर लगाऊं कैसे।


उनकी हर बात का हमने तो भरम रखा है
तोड़कर वो ही कसम आंख मिलाऊं कैसे।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shivendra on May 11, 2015 at 5:00pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
है कहाँ पहचान तेरी सादगी को क्या हुआ- शिज्जु शकूर

2122/ 2122/ 2122/212

है कहाँ पहचान तेरी सादगी को क्या हुआ

शोखियों को क्या हुआ तेरी हँसी को क्या हुआ

 

मुब्तला खुदगर्ज़ियों में हो गये जज़्बात सब

क्या कहूँ अब आजकल की दोस्ती को क्या हुआ

 

रास्ते भी थम गये हैं मंज़िलें भी खो गईं

रुक गई इक मोड़ पर ये ज़िन्दगी को क्या हुआ

 

अपनी हस्ती को मिटाता जा रहा है बेखिरद

किसको फुरसत सोचने की आदमी को क्या हुआ

 

सुब्ह पहले सी नहीं मौसम भी पहले सा नहीं

हो गई…

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Added by शिज्जु "शकूर" on May 11, 2015 at 4:30pm — 32 Comments

समय : लघु कथा : हरि प्रकाश दुबे

“साहब एक जरूरी बात करनी है !”

“देख नहीं रहे हो कितना व्यस्त हूँ ,अभी मेरे पास किसी भी बात के लिए समय नहीं है,जाओ बाद में आना !”

“पर साहब लगता है आपकी पत्नी के पास भी समय नहीं है, उनका अभी कुछ देर पहले ही एक्सिडेंट हो गया है, और मैं उनको अस्पताल में.. और उनके पर्स से आपका विजिटिंग कार्ड मिला, आपका फ़ोन बंद था ,तभी मुझे अपने सब काम छोड़कर आपको बताने आना पड़ा !”

“अरे भाईसाहब जल्दी ले चलो मुझे आपका बहुत एहसान होगा !”

“समय की परिभाषा बदल चुकी थी !”

© हरि प्रकाश…

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Added by Hari Prakash Dubey on May 11, 2015 at 9:04am — 13 Comments

अम्मी

हम बड़े हो रहे थे

लेकिन आप हमें

बच्चा ही समझती थीं

और जब हम अकड दिखाते

बात-बेबात बहस करते

तो आप खामोश हमें ताकते रहतीं

हम अपने मन की करते

और आपकी खामोश आँखें करतीं

हमारी सलामती की दुवाएं..



आज आप नहीं हैं

और इस संसार में

हम यूँ फिर रहे हैं

जैसे कोई फल हों

सड़क किनारे पेड़ के

जिसपर हर कोई

आजमाता है पत्थर...

हम बड़े ज़रूर हुए हैं अम्मी

लेकिन ममता की ऊष्मा से

वंचित हैं…

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Added by anwar suhail on May 10, 2015 at 7:00pm — 5 Comments

बेखुदी_______मनोज कुमार अहसास

ज़िन्दगी में गीत सारे दिल जलाने को लिखे

या फिर अपने इश्क़ को ही आज़माने को लिखे



बेखुदी में लिख दिया तेरे नाम का पहला हरुफ़

जाने कितने नाम फिर तुझको छिपाने को लिखे

(या)

बेखुदी में लिख दिया मेरे नाम का पहला हरुफ़

जाने कितने नाम फिर मुझको छिपाने को लिखे



और हमारी बेबसी का एक वाक्या ये भी है

हमने तुझको ख़त भी तो तुझसे छिपाने को लिखे



जिसने ये लिखकर दिया उम्मीद पर कायम है सब

वो घडी मिलने की भी अब दिल बचाने को लिखे



हम इसी दुनिया… Continue

Added by मनोज अहसास on May 10, 2015 at 5:20pm — 5 Comments

माँ

माँ छोटू के सो जाने के बाद भी उसे देर तक जगाती, किचेन से दूध का एक बड़ा भरा गिलास जबरदस्ती पकड़ाते हुए कहती,जल्दी पी जा नहीं बुढ़िया आ जाएगी.! और छोटू डर के मारे एक ही साँस में पूरा दूध पी जाता ! छोटू बड़ा हो गया है, माँ की अवस्था हो चली है ! माँ बीमार रहती है डॉक्टर ने दवाइयों के साथ दूध पीने को भी कहा है ! माँ दूध नहीं पीती तब छोटू माँ से कहता "माँ जल्दी दूध पी जाओ नहीं बुढ़िया आ जाएगी.! माँ उसके बालपन पे मुस्कराती है और धीरे-धीरे पूरा दूध पी जाती…

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Added by Jitendra Upadhyay on May 10, 2015 at 4:30pm — 4 Comments

मातृ दिवस पर रचित दोहें

मातृ दिवस की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं  

जग की वह आधार (दोहें)



माँ ममता ही कोख में, सहती रहती पीर 

माँ का जैसा कौन है, जिसमें इतना धीर |- 1



माँ ही ईश की प्रतिनिधि,  देवी  सा सम्मान

ब्रह्मा विष्णु महेश भी, करते है गुणगान |-2

उठते ही नित भोर में, माँ को करें प्रणाम,

माँ के चरणों में बसे, चारों तीरथ धाम | - 3

पलता माँ की गोद में, बालक एक अबोध,

माँ से ही होता उसे, सब रिश्तों का बोध | -…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 10, 2015 at 2:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल :-लुक़्मा समझ के हम को मज़ेदार खा गई

बह्र :- मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन



लुक़्मा समझ के हम को मज़ेदार खा गई

दुनिया है एक डायन-ए-बदकार खा गई



निकला जो चाँद मैंने ये समझा कि आप हैं

धोका मेरी नज़र ये कई बार खा गई



पहले तो इसने उनको ज़मींदार कर दिया

फिर ये ज़मीन सारे ज़मींदार खा गई



लिल्लाह अब ये ज़ुल्म-ओ-सितम रोक दीजिये

नफ़रत की आग कितने ही घर बार खा गई



जो कह रहा हूँ कोई नई बात तो नहीं

रोटी की भूक सेकड़ों फ़नकार खा गई



कपड़े ही सिल सके हैं ,न दीपक… Continue

Added by Samar kabeer on May 10, 2015 at 1:54pm — 17 Comments

दर्द की पहुँच (लघुकथा)

"भैया, इनके पेट में असहनीय दर्द हो रहा है, शराब मांग रहे हैं|"

"भाभी, पहले कितनी पीते थे, छुड़ा रहे हैं तो थोड़ा दर्द होगा ही|"

"आप सही कह रहे हैं...हम नहीं पीने देंगे, अरे माँ जी!" दरवाजे पर सासुमाँ को शराब की बोतल के साथ देखकर बहू आश्चर्यचकित रह गयी|
"माँ ये क्यों लाई? और पैसे कहाँ से लाई?"

"मेरी दवाई लौटा दी मैनें बेटा, उसका दर्द सहन नहीं हो रहा...."

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on May 10, 2015 at 1:30pm — 8 Comments

माँ स्मरण (मातृदिवस पर विशेष )

                     :: 1 ::

             मॉं तू माने या न माने !

तेरी  वाणी-वीणा  के स्वर ।

रस-वत्सल के बहते निर्झर ।

मै अबोध तन्मय सुनता था वह सारे कलरव अनजाने ।

            मॉं तू माने या न माने !

वह तेरे पायल की रून-झुन ।

मै बेसुध घुंघुरू की धुन सुन ।

मेरे  मुग्ध  मन:स्थिति  की गति अन्तर्यामी  ही जाने ।

             मॉं तू माने या न माने !

सरगम सा आँखो का पानी ।

तू कच्छपि रागो  की रानी ।

इन तारो की ही झंकृति…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 10, 2015 at 1:03pm — 6 Comments

अपेक्षा है तुझे....! (अतुकांत)

सब कुछ

है तेरा

तुझ पर, तेरे कारण ही

और तेरे ही लिए हैं

अपने दामन में पाले हैं तूने

समान, असमान भाव से 

कांटे भी, फूल भी

देव और दानव  

जल भी तेरा, थल भी

मरुस्थल और तेरे ही है पर्वत

तेरी ही नदियाँ

तेरा ही आश्रय है, सागर को

अश्विन से फाल्गुन तक

सिकुड़ती है,  तू

ज्येष्ठ की दहक में 

तपती और पिघलती रही

अथाह सहनशीलता है,  तुझमे

इस तरह सिकुड़ने और

पिघलने के…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on May 10, 2015 at 11:26am — 12 Comments

माँ परियों की रानी है -- डॉo विजय शंकर

मातृ-दिवस पर



माँ

जिसके बिन जन्म नहीं

सुरक्षा है, सुकून है ,

शान्ति हैं ,

ज्ञान है , संस्कृति है ,

एक पूर्ण परिवेश है ,

अबोथ के लिए ,

अपना विश्वकोष है ,

ईश्वर का वरदान है।

नैसर्गिक अधिकार है ,

अमूल्य है, मूल्यरहित

उपहार है.



स्वर्ग में ,

अप्सराएं प्रतीक्षा करतीं हैं ,

स्वर्ग जाने पर मिलती हैं ,

किसने देखा है,

किसने जाना है ?



धरती पर आने पर

सबसे पहले माँ मिलती है,

माँ प्रतीक्षा… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on May 10, 2015 at 10:00am — 14 Comments

ममता नहीं मरती ....( लघुकथा )

एक जोड़ा दो पहिया वाहन पर तेज़ गति से हाइवे पर गुजर रहा था ।स्त्री की गोद में एक नन्हा बालक था जो हवा के झोंकों से उनींदा हो रहा था ।पुरुष बार बार पीछे मुड़कर पत्नी से बात कर रहा था ।पत्नी ने टोका भी पर उसने अनसुना कर दिया ।अचानक वाहन का संतुलन बिगड़ गया , क्योंकि पीछे से आता हुआ एक ट्रक लगातार तेज हॉर्न देते हुए ' ओवर-टेक ' करने का प्रयास कर रहा था ।अनहोनी हो चुकी थी ।दंपत्ति सामने से आती बस से टकरा चुके थे ।स्थिति भाँप माँ ने दोनों हाथों से बच्चे को भींच लिया था ।गिरते हुए भी मस्तिष्क बच्चे को… Continue

Added by shashi bansal goyal on May 10, 2015 at 9:57am — 12 Comments

अंधी ममता ( लघु कथा )

" क्यों बेवजह सुबह सुबह बेटे पर चिल्ला रहे हो ।बच्चा ही तो है ।आपको भी बस बहाना चाहिए डाँटने का ।जैसे खुद से तो कभी गलती...।" मैं पूर्ण आवेग से पति से भीड़ गई थी ।
" बस बस बहुत हो गया ।चुप भी करो । या छुट्टी का पूरा दिन ख़राब करके ही मानोगी ।जैसे मैं तो उसका बाप हूँ ही नहीं।तुम्हारी तरह मैं भी ममता में अँधा हो जाऊँ तो बस ...।"
" करते रहो गुस्सा हुम् ....। आखिर एक माँ पत्नी से कैसे हार सकती है ? "
==========≠======
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by shashi bansal goyal on May 10, 2015 at 9:56am — 10 Comments

चेहरे--

" अंकल " , बस यही आवाज़ निकल पायी थी उसके मुँह से |
पहले भी यही आवाज़ निकलती थी , पर वो आवाज़ ख़ुशी की होती थी |
आज वो अपनी सहेली के घर बिना फोन किये आई , और अब अस्पताल में बेसुध पड़ी थी |
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 9, 2015 at 9:02pm — 16 Comments

मदर्स डे (लघुकथा)

"सुनो जी, कल माँ को वृद्धाश्रम से एक दिन की छुट्टी पर ले आना।"
"क्यों, कल ऐसा क्या है?"
"कल मदर्स डे है।"

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on May 9, 2015 at 8:29pm — 16 Comments

इंसानियत का रिश्ता

लड़का रोज शाम को कानो में लीड लगाकर सड़क के बीचो बीच बने पार्क में वाकिंग करने पहुंच जाता.! और वो बुजुर्ग दम्पति भी रोज शाम को पार्क के बीचो बीच बने बेन्च पे बैठकर घंटो खेलते हुए बच्चो को एक टक निहारते.! कभी -कभी प्यार से बच्चो को पुचकार भी देते तो कभी थपकियाँ देने के बहाने सहला भर लेते.! ऐसा करके उन्हें एक अलग सा सुकून मिलता था ! लड़का भी पार्क के एक कोने में बैठकर हर पल उन बूढी आँखों में एक ख़ुशी की चमक देख खुश भर हो जाता..! हर रोज वो लड़का सोचता आज मै इनसे बात करुगा, पर किस बारे में उनसे मेरा…

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Added by Jitendra Upadhyay on May 9, 2015 at 4:00pm — 7 Comments

अपेक्षा का दीप

अपेक्षा का दीप

मैंने अपनी अपेक्षा का दीप जलाया घर में

बुझे दीप न तेज हवा से सुरक्षा बाढ़ लगाया।

लक्ष्य को छूने का दृढ़ संकल्प लिया मन में

त्याग और बलिदान से प्रेरित मंत्र अपनाया ।

छल,कपट,ईर्ष्या कभी टिके नहीं अंतस्थल में

नैतिक मूल्यों के संस्कार का आवृत्त बनाया ।

मैंने अपनी अपेक्षा का दीप जलाया घर में

दया धर्म सद्भाव बढ़े आज सभी के जीवन में

अपेक्षा की आस लिए मैंने एक दीप जलाया।

स्नेह का तेल भरा ज्योति ज्ञान की जीवन में

मन में धीरज…

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Added by Ram Ashery on May 9, 2015 at 9:56am — 4 Comments

ग़ज़ल -उमेश कटारा

2122  2122 2122

--------------------------------------------

मर्ज बढ़ता जा रहा अब क्या रखा है

बेअसर होती दवा अब क्या रखा है



ढ़ूँढ ले अब हम सफर कोई नया तू 

मुस्करादे कब कज़ा अब क्या रखा है



रच रहे हम साजिशें इक दूसरे को 

साथ चलने में बता अब क्या रखा है



साथ आना जाना भी क्यों महफिलों में 

बन्द कर ये सिलसिला अब क्या रखा है



शहर पूरा है, मगर आया नहीं तू

बिन मिले ही मैं चला अब क्या रखा है



उमेश कटारा

मौलिक व…

Continue

Added by umesh katara on May 9, 2015 at 9:52am — 13 Comments

बातों में आ जाता हूँ (गजल)

जब बातों में आ जाता हूँ।

तब मैं धोखा खा जाता हूँ,

तू नैनों में बसती हरदम,

तेरी पलकें छा जाता हूँ।

मेरी जां तू कह देती है,

तुझपे जां लु'टा जाता हूँ।

बज़मे-बेदिल से मैं भी तो,

देखो अब रुठा जाता हूँ।

तुझको सहरा फरमाते लेे

फिर मैं अब बु'झा जाता हूँ।

दीया जलने दे जानेमन,

शब तेरी अब उ'ड़ा जाता हूँ।

जल-जल कर जलता दीया हूँ,

तम पी हर दिश छा जाता हूँ।…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 8, 2015 at 11:00pm — 10 Comments

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