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ग़ज़ल -उमेश कटारा

2122  2122 2122
--------------------------------------------
मर्ज बढ़ता जा रहा अब क्या रखा है
बेअसर होती दवा अब क्या रखा है

ढ़ूँढ ले अब हम सफर कोई नया तू 
मुस्करादे कब कज़ा अब क्या रखा है

रच रहे हम साजिशें इक दूसरे को 
साथ चलने में बता अब क्या रखा है

साथ आना जाना भी क्यों महफिलों में 

बन्द कर ये सिलसिला अब क्या रखा है

शहर पूरा है, मगर आया नहीं तू
बिन मिले ही मैं चला अब क्या रखा है

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित



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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 14, 2015 at 11:38pm

क्या बात है ! ग़ज़ल अच्छी हुई है. मतला विशेष प्रभावी है. दाद कुबूल कीजिये.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 12, 2015 at 10:47am

बहुत सुंदर उमेश जी..बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 11, 2015 at 9:00pm

आदरणीय उमेश भाई , लाजवाब गज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ आपको ।

रच रहे हम साजिशें इक दूसरे को 
साथ चलने में बता अब क्या रखा है  -- ढेरों बधाइयाँ ।

Comment by umesh katara on May 11, 2015 at 7:00pm

आदरणीय MUKESH SRIVASTAVA जी ग़ज़ल की पसन्दगी के लिये आभार

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on May 11, 2015 at 1:55pm

 nice sundar gazal mtira  - badhaee ho

Comment by umesh katara on May 10, 2015 at 12:15pm

आदरणीय Samar kabeer जी ग़ज़ल की पसन्दगी के लिये आभार

Comment by Samar kabeer on May 10, 2015 at 10:27am
जनाब उमेश कटारा जी,आदाब,ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है भाई ,दाद के साथ ममुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by umesh katara on May 10, 2015 at 8:04am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी ग़ज़ल की पसन्दगी के लिये आभार

Comment by umesh katara on May 10, 2015 at 8:04am

आदरणीय Shyam Narain Verma जी ग़ज़ल की पसन्दगी के लिये आभार

Comment by umesh katara on May 10, 2015 at 8:03am

आदरणीय वीनस केसरी जी ग़ज़ल की पसन्दगी के लिये आभार

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