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रेल की पटरी जैसे चलती ,साथ चले हैं हम दोनों

पग पग तेरा मान करूँ 
अपमान मेरा मत कर तू भी
एक दिन तो सबको मरना है
अभिमान जरा मत कर तू भी
जीवन की आँख मिचौली में
ठहरूँ पल भर मैं पलक तले 
क्या है भरोसा कल सुबह तक 
कौन बचे और कौन जले
कौन मिलेगा बीच सफर में
साथ मेरे ही चलता जा
आयू भी आधी निकल गयी 
हाथ मले तो मलता जा
इक दूजे को देते रहें है
जाने क्यों हम गम दोनों
रेल की पटरी जैसे चलती
साथ चले हैं हम दोनों

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित




Views: 516

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Comment by umesh katara on May 8, 2015 at 8:53pm
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 8, 2015 at 2:25pm

कटारा जी

अच्छी प्रस्तुति है  .

Comment by umesh katara on May 7, 2015 at 8:59pm

आदरणीय krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी आभार

Comment by umesh katara on May 7, 2015 at 8:59pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी आभार

Comment by umesh katara on May 7, 2015 at 8:58pm

आदरणीय Sushil Sarna जी आभार

Comment by Sushil Sarna on May 7, 2015 at 7:59pm

आंतरिक अंतर्द्वंद का सुंदर चित्रण हुआ आदरणीय आपकी इस रचना में। … हार्दिक बधाई सुंदर प्रस्तुति हेतु। 

Comment by Shyam Narain Verma on May 7, 2015 at 3:39pm
बधाई , इस प्रस्तुति पर , सादर।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 7, 2015 at 2:16pm

रेल की पटरी जैसे चलती
साथ चले हैं हम दोनों

वाह! उमेश सर हार्दिक बधाई!

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