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मेरा अस्तित्व कहाँ है // रवि प्रकाश

एक समन्दर भी है अन्दर

थोड़ा उथला,थोड़ा गहरा

और लहर पे लहर चढ़ी है

पहले भी मालूम था लेकिन-

जब से तेरा नाम लिखा है

धाराएँ कुछ और हो गईं

सभी किनारे छूट गए हैं।

कब सूरज ने दम तोड़ा था

तड़प-तड़प के हिमशिखरों पर

टूटे तारे कौन गली में

आस जगा कर रहे बिखरते

प्रोषितपतिका रात बनी कब

दरके थे तटबंध हृदय के

कब मैंने आलाप किया था

वेदमंत्र सा राग तुम्हारा

कब उतरा मेरे अधरों पे

कुछ भी तो अब याद नहीं है।

वो छोटा सा एक अकेला

पल,जब… Continue

Added by Ravi Prakash on May 8, 2015 at 7:01am — 14 Comments

माहौल

माहौल"

गुप्ता जी की बेटी ने प्रेम विवाह कर लिया। ये खबर आग की तरह पूरे आस पड़ोस मे फैल गयी। गुप्ता जी के नाम और प्रतिष्ठा से जलने वालो को तो मानो मौका मिल गया था। कई रोज़ तक ये खबर लोगो के मनोरंजन का विषय बनी रही, पर इन सबके बावजूद गुप्ता जी के चेहरे पर शिकन तक ना थी उनके चेहरे मे पहले सी मुस्कान देखकर पडोसियों की ख़ुशी खिसियाहट मे बदल गयी थी।

ये खबर जानकर गांव से आए उनके पिता ने बड़ी नाराजगी में अपने बेटे-बहु को ड़ांटते हुए कहा- यह जो हुआ इसका जिम्मेदार तुम्हारे घर का माहौल है जो… Continue

Added by Priya mishra on May 7, 2015 at 10:06pm — 7 Comments

बाँझ माँ

उसकी अपनी कोई संतान नहीं थी लोग उसे बाँझ कहते थे ! उसने (बाँझ) दरवाजे में कुण्डी लगाया ही था, की तभी किसी बच्चे की रोने की आवाज सुन वो वही ठिठक भर गयी ! दरवाजे की कुण्डी खोल हाथ में लालटेन लिए वो आवाज के दिशा में चल पड़ी ! थोड़ी दूर पहुंची ही थी की अचानक सामने का दृश्य देख चौक पड़ी, छोटे से कपडे में लिपटा वो बच्चा भूख से बुरी तरह बिलबिला रहा था ! उसने बच्चे को उठा कर सीने से लगा लिया,बच्चा ममतामयी स्पर्श पा शांत होकर सो गया ! सुबह लोगो ने उसके झोपडी से बच्चे की आवाज सुनी सुनकर सब चौक गए ! सच से…

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Added by Jitendra Upadhyay on May 7, 2015 at 4:58pm — 9 Comments

एक पर्वत की व्यथा - कविता

गर्व से सर उठाये

पर्वत की शिखरोँ को

सूर्य की किरण, सर्वप्रथम

व अंतिम किरण, अंत तक

निज दिन चूमती है

परंतु चकित हूँ

यह फिर भी हरित नहीँ होती

हरित होती हैँ घाटियाँ

जीवन वहीँ विचरता है

किँचित यह ओट देने का श्राप है

अथवा दमन का प्रतिशोध

कि जल की एक बूँद नहीँ ठहरती यहाँ

जल स्त्रोत इसी गोद मेँ जन्म ले

पलायन कर जाते हैँ

हवा की सनसनाहट

बादलोँ की गडगडाहट

के अतिरिक्त कोई स्वर नहीँ…

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Added by Mohinder Kumar on May 7, 2015 at 3:45pm — 3 Comments

ज़रा सा

वो तेरे इश्क़ में दरिया होना
सिमटकर आज ज़रा सा होना

होश में आके हमने जाना है
कितना मुश्किल था तमाशा होना

तुमको देखा वो सब याद आया
क्या न हो पाना और क्या होना

गलतियां तुममे ढूंढ़ ली मालिक
हमसे हो पाया ना इन्सां होना

गुनाह इस ग़ज़ल का उतरना है
या फिर इसमें ना तेरा होना

तहज़ीब हमसे कोई निभ न सकी
ज़िन्दगी या के काफ़िया होना

मौलिक और अप्रकाशित

Added by मनोज अहसास on May 7, 2015 at 3:36pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - बहक ही जाने दो मुझको, कि अब बचा क्या है ( गिरिराज भंडारी )

1212   1122   1212   22  /112

चली गई मेरी मंज़िल कहीं पे चल के क्या

या रह गया मैं कहीं और ही बहल के क्या

 

वहाँ पे गाँव था मेरा जहाँ दुकानें हैं  

किसी से पूछता हूँ , देख लूँ टहल के क्या

 

असर बनावटी टिकता कहाँ था देरी तक

वही पलों में तुम्हें रख दिया बदल के क्या

 

हरेक हाथ में पत्थर छुपा हुआ देखा

ये गाँव फिर से रहेगा कभी दहल के क्या

 

मेरा ये घर सही मिट्टी, मगर ये मेरा है

मुझे न पूछ थे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 7, 2015 at 9:16am — 31 Comments

रेल की पटरी जैसे चलती ,साथ चले हैं हम दोनों

पग पग तेरा मान करूँ 
अपमान मेरा मत कर तू भी
एक दिन तो सबको मरना है
अभिमान जरा मत कर तू भी
जीवन की आँख मिचौली में
ठहरूँ पल भर मैं पलक तले 
क्या है भरोसा कल सुबह तक 
कौन बचे और कौन जले
कौन मिलेगा बीच सफर में
साथ मेरे ही चलता जा
आयू भी आधी निकल गयी 
हाथ मले तो मलता जा
इक दूजे को देते रहें है
जाने क्यों हम गम दोनों
रेल की पटरी जैसे चलती
साथ चले हैं हम दोनों

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित




Added by umesh katara on May 7, 2015 at 7:20am — 8 Comments

दीमक ( लघुकथा )

" ये देखिये , सोनू का परीक्षा परिणाम ।बहुत ही निराशाजनक है ।"
" मैडम क्या आप 'ट्यूशन' लेती हैं ?"
" ट्यूशन का बच्चे के प्रदर्शन से क्या सम्बन्ध ? "
" है क्यों नहीं । पुराने विद्यालय में सोनू सदा अव्वल आता था क्योंकि वहीं के मास्टर जी से 'ट्यूशन' लेता था ।"
" ओह्ह्ह ! यानि बच्चे की बुनियाद में ही दीमक लगी है।"
=======================
मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by shashi bansal goyal on May 6, 2015 at 8:00pm — 18 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

मध्य अपने जम गयी क्यों बर्फ़.. गलनी चाहिये

कुछ सुनूँ मैं, कुछ सुनो तुम, बात चलनी चाहिये



खींचता है ये ज़माना यदि लकीरें हर तरफ  

फूल वाली क्यारियों में वो बदलनी चाहिये



ध्यान की अवधारणा है, ’वृत्तियों में संतुलन’

उस प्रखरतम मौन पल की सोच फलनी…

Continue

Added by Saurabh Pandey on May 6, 2015 at 6:30pm — 40 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शम्स तो है वो मगर डूबा हुआ है-शिज्जु शकूर

2122 2122 2122

शम्स तो है वो मगर डूबा हुआ है

रौशनी से बेख़बर डूबा हुआ है

 

अपने होने का उसे अहसास तो हो

क्यों ग़मों में इस कदर डूबा हुआ है

 

क्या अँधेरा मेरी नज़रों में है मौजूद

या अँधेरे में ये घर डूबा हुआ है

 

रौशनी के सिर्फ इक ज़र्रे के दम पर

ठण्ड से वो बेअसर डूबा हुआ है           

 

इस जुनूने इश्क़ का होगा समर* क्या           *नतीजा

सोच में कोई इधर डूबा हुआ है

 

फिर गुजश्ता…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on May 6, 2015 at 5:00pm — 18 Comments

कविता : प्रेम

(१)

 

तुम्हारा शरीर

रेशमी ऊन से बुना हुआ

सबसे मुलायम स्वेटर है

 

मेरा प्यार उस सिरे की तलाश है

जिसे पकड़कर खींचने पर

तुम्हारा शरीर धीरे धीरे अस्तित्वहीन हो जाएगा

और मिल सकेंगे हमारे प्राण

 

(२)

 

तुम्हारे होंठ

ओलों की तरह गिरते हैं मेरे बदन पर

जहाँ जहाँ छूते हैं

ठंडक और दर्द का अहसास एक साथ होता है

 

फिर तुम्हारे प्यार की…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 6, 2015 at 4:00pm — 10 Comments

एक सादा ग़ज़ल-नूर

२१२२/ २१२२/ २१२२/ २१२ 

.दिल में गर तूफां उठे तो मुस्कुराना है कठिन

याद करना है सरल पर भूल जाना है कठिन. 

.

यादों के झौंके पे झूले झूलना कुछ और है,

यादों के अंधड़ को लेकिन रोक पाना है कठिन.

.

हिचकियाँ आई यूँ ही होंगी तुझे नादान दिल!

भूलने वालों को तेरी याद आना है कठिन.

.

आड़ दो हाथों की पाकर सर उठा लेती है लौ,

हाँ खुली छत पर दीये का जगमगाना है कठिन.

.

कैसे कैसे लोग अब बसने लगे हैं शह्र में

अब लगे है यां भी अपना…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2015 at 4:00pm — 22 Comments

देखते ही देखते

देखते ही देखते देखो समां क्या हो गया

आज अपना आप ही खुद से पराया हो गया



देखकर बदहाली उसकी उठता नहीं अब दिल में दर्द

वो मेरी दुनिया का मालिक था जो दुनिया हो गया



मैंने उसके हिस्से की तन्हाइयां जब मांग ली

वो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा तनहा हो गया



भूलने की कोशिशों में याद रखने की तलब

दो उलट लहरो में फंसकर पाट गहरा हो गया



उसके हाथो की लकीरो में न मेरा नाम था

और जो कुछ भी लिखा था वो भी धुंधला हो गया



रह गयी है पास मेरे दर्द… Continue

Added by मनोज अहसास on May 6, 2015 at 3:21pm — 10 Comments

उन्नति....(लघुकथा)

समय कितना बदल गया है. वो दिन थे जब शरीर तोड़कर उतना ही पैदा कर पाता था, कि साल भर अपने परिवार का पेट भर सके.. अगर चार दिन को कोई मेहमान आ जाए तो आस-पड़ोस से उधार मांग लाता. और खूब से खूब इस बार के कर्ज के गड्डे को भर, फिर खुदाई शुरू कर देता..

आज भरपूर बिजली, पानी और कम ब्याज पर सरकारी ऋण से पैदावार बहुत बड़ गई है, अश्विन और बैशाख के माह में हर तरफ अनाज ही अनाज. खुशियों के सपने संजोये,  बैलगाड़ी की जगह ट्रकों से अनाज लेकर उपार्जन केंद्र पर खड़ा है..

“ बाबूजी!! यह रहा मेरा…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 11:11am — 24 Comments

उम्दा तैराक कभी था तो यकीनन पर सुन

2122   1122   1122   22/112

हुस्न है रब ने तराशा न जुबाँ से कहिये 

आप हैं  बुझते दिए आप जरा चुप रहिये 

आईना देख के बालों की सफेदी देखें 

गाल भी लगते हैं अब आपके पंचर पहिये

 

आप तैराक थे उम्दा ये हकीकत है पर

बाजू कमजोर हवा तेज न उल्टे  बहिये 

इश्क का भूत नहीं सर से है उतरा माना 

पर सही क्या है ये, इस उम्र में खुद ही कहिये ?

लोग जिस मोड़ पे अल्लाह के हो जाते हैं 

आप उस मोड़ पे मत दर्दे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 6, 2015 at 11:00am — 10 Comments

नैतिक बुनियाद (लघुकथा)

"अरे! कमलजी आप यहां 'जाॅब' कर रहे है, सरकारी 'रिटायरमेन्ट' के बाद फिर से।" अरूणजी एक निजी कम्पनी में कमलजी से मिलने पर कुछ हैरत से बोले।

"हाँ भाई। अभी कुछ जिम्मेदारियाँ शेष रह गयी है, पूरी तो करनी ही पड़ेगी ना। कमल जी धीरे से हॅसकर बोले।

"अब कमल बाबु इसमें मे भी दोष आपका ही है, यदि आप हमारे कहे से चले होते है तो आर्थिक बुनियाद का खोखलापन आपको छूता भी नही।" अरूण जी अर्थपूर्ण मुस्कराहट से बोले।

"मेरा ये खोखलापन तो देर सवेर भर ही जायेगा अरूण भाई.....।"

"लेकिन आप जैसे लोगो के… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on May 6, 2015 at 10:09am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- चराग़ किसका जला हुआ है - ( ग़िरिराज भंडारी )

121  22     121  22        121  22   121  22

 

ये कैसी महफिल में आ गया हूँ , हरेक इंसा , डरा हुआ है 

सभी की आँखों में पट्टियाँ हैं , ज़बाँ पे ताला जड़ा हुआ है

 

कहीं पे चीखें सुनाई देतीं , कहीं पे जलसा सजा हुआ है

कहीं पे रौशन है रात दिन सा , कहीं अँधेरा अड़ा हुआ है

 

ये आन्धियाँ भी बड़ी गज़ब थीं , तमाम बस्ती उजड़ गई पर  

दरे ख़ुदा में झुका जो  तिनका , वो देखो अब भी बचा हुआ है 

 

हरेक…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 6, 2015 at 6:30am — 25 Comments

क्यों ?

क्यूँ आज फिर घेर रहे,सन्नाटे मुझे?

क्यूँ उठ रहे बवंडर,यादों के?

क्यूँ ले रहे गिरफ़्त में अपनी?

जिनसे दूर बहुत,निकल आई हूँ मैं,

जिन्हें दबा चुकी ,बहुत गहरा

अरमानों के कब्रिस्तान में,

क्यूँ जकड़ रहे फिर आज?

मानो कि यकीन हूँ ज़िंदा।

हूँ महज़ इक बुत,चलता-फिरता।

बेजान बेज़ार सी ज़िन्दगी हलचल से दूर,

ढो रही हूँ बोझ,जिस्म का,

चुका रही हूँ कर्ज,साँसों का।

क्यूँ दिखाता है खुदा ख्वाब?

कभी जो पूरे हो नही सकते ,

क्यूँ देता है…

Continue

Added by jyotsna Kapil on May 5, 2015 at 10:30pm — 12 Comments


प्रधान संपादक
बुनियाद (लघुकथा)

"कितने शर्म की बात है, हमारे आका लोग दुनिया भर से अरबों खरबों भेज चुके हैं, मगर तुम लोग फिर भी आज तक हिन्दुस्तान के टुकड़े नही कर पाए।"

"हमने हरचन्द कोशिश की, मगर ....."

"मगर क्या ?"

"ये लोग टूटते ही नहीI"

"क्यों नही टूटेंगे ? तुम इनको धर्म के नाम पर क्यों नही तोड़ते?"

"हम कश्मीर और पंजाब समेत कई जगहों पर ये कोशिश पहले ही कर चुके हैं सर।"

"कोशिश कर चुके हो तो कामयाब क्यों नही हुए अब तक?"

"क्योंकि इस देश की बुनियाद नफ़रत पर नही प्रेम पर रखी गई है…

Continue

Added by योगराज प्रभाकर on May 5, 2015 at 10:30pm — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- बह्र-ए-शिकस्ता में एक प्रयास (मिथिलेश वामनकर)

फ़'इ'लात फ़ाइलातुन फ़'इ'लात फ़ाइलातुन (बह्र-ए-शिकस्ता)

1121 - 2122 - 1121 - 2122

 

मेरे नाम से न चाहे तू अगर तो मत सदा दे  

मुझे देख के मगर तू, कभी हाथ तो हिला दे…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on May 5, 2015 at 10:00pm — 25 Comments

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