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उठने लगा है दिल से मेरे ये सवाल क्यों- ग़ज़ल

221 2121 1221 212

उठने लगा है दिल से मेरे ये सवाल क्यों

इस तंगदिल जहाँ से करूँ अर्ज़े हाल क्यों

 

तुझसे रही न कोई शनासाई ऐ हयात

फिर बार-बार आये तेरा ही खयाल क्यों

 

हैं अश्क़बार और भी इस बज़्म में कई

ऐ दोस्त ये बता कि मेरी ही मिसाल क्यों

 

आयेंगे और लम्हे अभी तो बहार के

आखिर तुम्हें है शाखे शजर ये मलाल क्यों

 

कैसे बताये कोई मुकद्दर किसी का क्या

कल जो खिला चमन में वो अब पायमाल…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on April 4, 2015 at 2:53pm — 34 Comments

हॉकी खेलने जाती लड़कियां

पैरों में एक जोड़ी हवाई चप्पल,

और छोटी छोटी ख़्वाहिशों से चमकती आँखों  के साथ

हाथों में स्टिक लिए

कुछ लड़कियां हॉकी  खेलने जाती है

भागती है गेंद के पीछे

गेंद में छुपा बैठा है पेट भर खाने का सुख

पहाड़ के उस पार

जंगलों के बीचों बीच नंगे पाँव

एक वृद्ध आदिवासी दंपति

सखुआ के पत्तों को हटाकर

पौधों की जड़ें खोद

रात के खाने का इंतजाम करता है।

उसने कभी हॉकी का स्टिक नहीं देखा है

पर वह सपने देखता है

गेंद  से…

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Added by Neeraj Neer on April 4, 2015 at 1:30pm — 7 Comments

शिक्षा और अंगूठा -- डॉo विजय शंकर

द्रोणाचार्य

एक युग प्रवर्तक शिक्षक ,

राजकीय सरंक्षण के शिक्षक ,

सरकारी व्यवस्था के आधीन ,

शिक्षक और वह भी पराधीन ,

एकलव्य से अंगूठा मांगने को विवश ,

शिक्षा को सीमित करने को लाचार।

राज्य के राजकीय गुरु थे द्रोण ,

सरकारी अध्यापक से थे द्रोण ,

राजपुत्रों को पढ़ाते थे द्रोण

राजहित में पढ़ाते थे द्रोण ,

जनहित नहीं जानते थे द्रोण ,

राजहित में ही एकलव्य से अंगूठा

मांग बैठे थे बिचारे द्रोण ………



एक परम्परा छोड़ गए द्रोण… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on April 4, 2015 at 10:37am — 12 Comments

चकोर सवैया

चकोर सवैया

================

भगण X 7 + गुरु + लघु
================

फॊरत है मटकी नित मॊहन, नंद यशॊमति तॆ कहु आज !!
चीर चुरावत गॊपिन कॆ सुनु, वॊहि न आवत एकहु लाज !!
नाँवु धरैं नर नारि सबै नित, नाँवु धरै यदु वंश समाज !!
खीझत खीझत ‘राज’कहैं अलि,खूब सताइ रहा बृजराज !!

"राज बुन्दॆली"

मौलिक व अप्रकाशित

Added by कवि - राज बुन्दॆली on April 4, 2015 at 5:30am — 6 Comments

ग़ज़ल :-सभी कहते हैं अच्छा बोलता है

बह्र:- फ़ऊलुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन



सभी कहते हैं अच्छा बोलता है

जो हम बोलेंगे तोता बोलता है



हमारा काम क्या उन महफ़िलों में

जहाँ दौलत का नश्शा बोलता है



कोई लोरी सुनाओ,गीत गाओ

अधूरा एक सपना बोलता है



ज़रा महकी हुई ज़ुल्फों की ठंडक

कई रातों का जागा बोलता है



मैं सच्चाई की बातें कर रहा हूँ

समझते हैं दिवाना बोलता है



तिरी शक्ति है अपरम पार मौला

तिरे आगे तो गूंगा बोलता है



छुपाए से नहीं छुपती… Continue

Added by Samar kabeer on April 3, 2015 at 10:32pm — 40 Comments

गजल --तू मुस्करा के देख ले दिल से लगा के देख ले

2212  2212
तू मुस्करा के देख ले
दिल से लगा के देख ले

झुकना नहीं मंजूर अब
कोई झुका के देख ले

है नाम तेरे जिन्दगी
बस आजमा के देख ले

ये खेल है दिलकस बहुत
बाजी लगा के देख ले

बुझते मुहब्बत के चिराग
अब तो जला के देख ले

कोई नहीं हमसा यहाँ 
नजरें घुमा के देख ले

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा

Added by umesh katara on April 3, 2015 at 8:10pm — 18 Comments

तमन्ना

तमन्ना

इस चमन की सुमन खिलते रहें

सुख दुःख में हम मिलते रहें

लाख कोशिश करे हमें तोड़ने की

हम जुड़े हुवे हम जुड़ते रहें

इंद्रधनुषी रंग छाते रहें

खुशियों के गीत गाते रहें

लहू के रंग फैलायें न कोई

हम जगे हुवे हम जगते रहें

पक्षियों का कलरव गूंजता रहे

पर्वतों को गगन चूमता रहे

आँधियाँ चाहे चले जोर से

हम अडिग हुवे हम अडिग रहें

झरने कल कल झरते रहें

विकास पथ पर बढ़ते रहें

भूल से भी न रोके कोई

हम अजये विजयी रहें

हिम शिखर…

Continue

Added by Shyam Mathpal on April 3, 2015 at 7:30pm — 5 Comments

मनहरण घनाक्षरी छन्द

मनहरण घनाक्षरी छन्द
***********************



पैरॊं की धूल सॆ तर,गई नार गौतम की,

पैर धो कॆवट पाया, जग मॆं सम्मान है !!

राज-पाट पाया भाई,भरत नॆं अयॊध्या का,

किन्तु प्रभु…
Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on April 3, 2015 at 12:14am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल : रंगमंच ये सारा उसका, उसके ही तो है .... (मिथिलेश वामनकर)

22-22--22-22--22-22—2 

 

तुम बिन सूने-सूने लगते  जीवन-वीवन सब

साँसें-वाँसें, खुशबू-वुशबू, धड़कन-वड़कन सब

 

आज सियासत ने धोके से, अपने बाँटें…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on April 2, 2015 at 11:00pm — 38 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आपने नहीं पहचाना शायद -- अतुकांत - गिरिराज भंडारी

उड़ानें उसकी बहुत ऊँची हो चुकी हैं

बेशक ,  बहुत ऊँची

खुशी होती है देख कर

अर्श से फर्श तक पर फड़फड़ाते

बेरोक , बिला झिझक, स्वछंद उड़ते देख कर उसे

जिसके नन्हें परों को

कमज़ोर शरीर में उगते हुए देखा है

छोटे-छोटे कमज़ोर परों को मज़बूतियाँ दीं थीं

अपने इन्हीं विशाल डैनों से दिया है सहारा उसे

परों को फड़फड़ाने का हुनर बताया था  

दिया था हौसला, उसकी शुरुआती स्वाभाविक लड़खड़ाहट को

खुशी तब भी बहुत होती थी

नवांकुरों की कोशिशें…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on April 2, 2015 at 9:30pm — 23 Comments

चंद शे'र --- 1 ---डॉo विजय शंकर

अपने में ही खोये हुए से रहते हो

तुम्हें लोग कहाँ कहाँ ढूंढते रहते हैं ||



तुमको देखा इक हादसा हो गया ,

भला आदमी एक खुद से खो गया ।



लफ्जों को यूँ तौल तौल के बोलते हो

बच्चों से क्या कभी बात नहीं करते हो ||



लफ्जों को इतना महीन क्यों तौलते हो

बात करते हो या कारोबार करते हो ||



हमेशा दिमागी उधेड़बुन में रहते हो ,

दिल की बात कभी किसी से नहीं करते हो ॥



दिखाते हो दिल से कभी नहीं उलझे हो

बहकाते हो छलावा किस से करते हो… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on April 2, 2015 at 7:04pm — 16 Comments

कहाँ आज जश्ने बहारा /// हिन्दी गजल (एक प्रयास)

 मुतकारिब मुसद्दस सालिम

     १२२   १२२   १२२

 

अधूरा  मिलन  है  हमारा

नहीं  प्यार  ऐसा  गवारा I

 

मिले गर न हम इस जनम में

जनम  साथ लेंगे  दुबारा I

 

भटकता अकेला गगन में

विपथ एक टूटा   सितारा  I

 

समय की बड़ी बात होती

कहाँ आज जश्ने बहारा I

 

तपस्या सदृश मूक जीवन

सभी ने जतन से संवारा I

 

अभी से थका जीव-मांझी

बहुत दूर पर है किनारा I  

 

कहाँ…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 2, 2015 at 5:30pm — 18 Comments

शाकाहार की राजनीति (लघुकथा)

हाथी के नेतृत्व में सभी जानवरों ने शाकाहार संघ बनाया। सबसे पहले लोमड़ी ने शाकाहार की कसम खायी और फिर उसने मांसाहारियों के सामने एक प्रदर्शन करने का सुझाव दिया, जिसे तुरंत ही मान लिया गया। लोमड़ी ने दस-दस जानवरों का समूह बना कर उन्हें एक क्रम में खड़ा किया। सबसे पहले दस हाथी, फिर भालू, बन्दर, बारहसिंघा, हिरण फिर खरगोशों का समूह और सबसे अंत में वो स्वयं थी। बड़े-बड़े पोस्टर लेकर जुलुस ने शाकाहार के पक्ष में नारे लगाते हुए जंगल के राजा शेर की मांद के अंदर तक पूरा चक्कर लगाया जैसे ही लोमड़ी और शेर की…

Continue

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on April 2, 2015 at 3:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल-नूर-ख़ुदा का ख़ौफ़ करो

१२१२/ ११२२/ १२१२/ २२ (सभी संभव कॉम्बिनेशन्स)



हमें न ऐसे सताओ ख़ुदा
का ख़ौफ़ करो

ज़रा क़रीब तो आओ ख़ुदा का
ख़ौफ़ करो. …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 2, 2015 at 2:00pm — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- प्यास में अब. पानी न मिले शबनम ही सही -- ( गिरिराज भंडारी )

२११२२        २११२२         २११२      

प्यास में अब. पानी न मिले शबनम ही सही

*****************************************

प्यास में अब. पानी न मिले शबनम ही सही

ख्वाब तो हो, सच्चा न सही  मुबहम ही सही

 

लम्स तेरा जिसमें न मिले वो चीज़ ग़लत

आब हो या महताब हो या ज़म ज़म ही सही 

 

मेरे सहन में आज उजाला , कुछ तो करो    

धूप अगर हलकी है उजाला कम ही सही

 

कुछ तो इधर अब फूल खिले सह्राओं में भी 

काँटों लदी हो डाल खिले…

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Added by गिरिराज भंडारी on April 2, 2015 at 1:25pm — 29 Comments

जल - पंकज त्रिवेदी

जल बहता है -

झरनें बनकर, लिए अपनी शुद्धता का बहाव

वन की गहराई को, पेड़, पौधों, बेलों की झूलन को लिए

जानी-अनजानी जड़ीबूटियों के चमत्कारों से समृद्ध होकर

निर्मलता में तैरते पत्थरों को कोमल स्पर्श से शालिग्राम बनाता हुआ

धरती का अमृत बनकर वनवासियों का, प्राणियों का विराम !



जल बहता है -

नदी बनकर, नालों का बोझ उठाती, कूड़ा घसीटती

मंद गति से बहती, अपने निज रंग पर चढी कालिमा को लिए

भटकती है गाँव-शहरों की सरहदों से छिल जाते अपने अस्तित्व को लेकर…

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Added by Pankaj Trivedi on April 2, 2015 at 12:30pm — 15 Comments

हिंदी गजल: बहरे हजज मुसद्दस (6) सालिम

1222 1222 1222

""""""""""""""""""""'"""""""'''"''''''

गजब ये रंग देखा है जमाने का।

सहारा है सभी को इक बहाने का।

*****

नजर के तीर से कर चाक दिल मेरा,

कहेगें हाल तो कह दो निशाने का।

*****

रही आदत खिलौना प्यार को समझा,

किया है खेल रोने औ रुलाने का।

*****

हमारा दर्द ही हमको सिखाया है,

बुरे हालात में, हँसने हँसाने का।

*****

मरा है क्यों उसीपे ऐ दिवाना दिल,

हिदायत दे गया जो छोड़ जाने का।

*****

तड़पते देख हैं-हैरान…

Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 2, 2015 at 12:00pm — 11 Comments

जमाना और था जब प्यार आँसू पोंछ देता था - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

1222    1222     1222 1222

******************************

ये कैसी  हलचलें  नवयुग  बता  तेरी  रवानी में

बचे  भूगोल  में  नाले  नदी   किस्से  कहानी में

****

बनीं नित नीतियाँ ऐसी हुकूमत हो किसी की भी

नफा व्यापार  में  बढ़चढ़  रहे  फाका किसानी में

****

दिलों का जोश ठंडा है, उमर कमसिन उतरते ही

बुढ़ापा  हो गया हावी  सभी  पर  धुर  जवानी में

****

जमाना  और  था  जब  प्यार  आँसू पोंछ  देता था

मगर अब अश्क मिलते हैं मुहब्बत की निशानी में…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 2, 2015 at 11:00am — 12 Comments

ओ बी ओ पर्याय (दोहें) - लक्ष्मण रामानुज

विद्वजनों के योग से,सफल हुआ यह काज,
पाँच वर्ष के काल में, खूब सजाया साज |
 
रसिक मंच से जुड़ सके, करें कौन पाबन्द
दूर देश से जुड़ रहें,  देख  यहाँ  आनंद |  
 
छंदों को यूँ खोजकर, देते सबको ज्ञान,
मान धरोहर देश की,  लाते सबके ध्यान |
 
ह्रदय भाव से आ मिले, इक दूजे के संग,
होली से माहौल में, खिले प्रीत के रंग |
 
पाँच वर्ष की साधना, ओ बी ओ पर्याय,
कृपा…
Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 2, 2015 at 11:00am — 16 Comments

मै तो बलिहारी............'जान' गोरखपुरी

२१२ २२१२ १२१२

मै तो बलिहारी,अमीर हो गया

इश्क़ में रब्बा फकीर हो गया

***

मेरे रांझे का मुझे पता नही

बिन देखे ही मै तो हीर हो गया

**

उसके जलवे यूँ सुने कमाल के

दिलको किस्सा उसका तीर हो गया

***

शिवशिवा घट-घट मुझे पिलाओ अब

तिश्न मै वो गंग नीर हो गया

**

उसको पहनूं धो सुखाऊँ रोज मै

लाज मेरी अब वो चीर हो गया

***

गाऊँ कलमा मै सुनाऊँ दर-ब-दर

‘’जान’’ज्यूँ मै कोई पीर हो…

Continue

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 10:30am — 18 Comments

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