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उठने लगा है दिल से मेरे ये सवाल क्यों- ग़ज़ल

221 2121 1221 212

उठने लगा है दिल से मेरे ये सवाल क्यों

इस तंगदिल जहाँ से करूँ अर्ज़े हाल क्यों

 

तुझसे रही न कोई शनासाई ऐ हयात

फिर बार-बार आये तेरा ही खयाल क्यों

 

हैं अश्क़बार और भी इस बज़्म में कई

ऐ दोस्त ये बता कि मेरी ही मिसाल क्यों

 

आयेंगे और लम्हे अभी तो बहार के

आखिर तुम्हें है शाखे शजर ये मलाल क्यों

 

कैसे बताये कोई मुकद्दर किसी का क्या

कल जो खिला चमन में वो अब पायमाल क्यों

 

जिनकी वफा का बोझ लिये चल रहा था मैं

उनको पता नहीं मेरा जीना मुहाल क्यों

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 8, 2015 at 10:27am

आदरणीय धर्मेन्द्र जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 7, 2015 at 9:49am

बड़ी ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है आ. शिज्जू जी, दाद कुबूल कीजिए


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2015 at 8:05pm

जनाब समर कबीर साहब आप जैसे ग़ज़लकार से दाद पाना हमेशा ही खुशी का कारण होता है आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2015 at 8:04pm

आदरणीय गिरिराज सर बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2015 at 8:03pm

जनाब नज़ील साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2015 at 8:03pm

आदरणीय हरिप्रकाश जी आपका आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2015 at 8:02pm

आदरणीय कृष्ण मिश्रा जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2015 at 7:52pm

आदरणीय सुनील प्रसाद जी आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2015 at 7:51pm

आदरणीय गुमनाम जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2015 at 8:18am

आदरणीय निलेश भैया आप जैसे ग़ज़लकार से दाद पाना हौसले का सबब हुआ करता है आपका तहेदिल से शुक्रिया

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