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March 2015 Blog Posts

ग़ज़ल -नूर 'मैं काफ़िर हूँ प् ना-शुक्रा नहीं हूँ'

१२२२/१२२२/१२२ 



किसी की आँख का क़तरा नहीं हूँ

ग़ज़ल में हूँ मगर मिसरा नहीं हूँ.

.

न जाने क्या करूँगा ज़िन्दगी भर  

तेरे सदमे से मैं उबरा नहीं हूँ.

.

अना से आपकी टकरा गया था

मैं टूटा हूँ मगर बिखरा नहीं हूँ.

.

खुदाया हश्र पर नरमी दिखाना

मैं काफ़िर हूँ प् ना-शुक्रा नहीं हूँ.

.

सफ़र में हूँ, कोई सूरज हो जैसे

कहीं भी एक पल ठहरा नहीं हूँ.

.

तराशेगी…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 28, 2015 at 10:08am — 12 Comments

तुमसे अकेले में मुलाक़ात

आज झुरमुट से उजास में

शुभ्र नूतन सा गुलाबी प्रभात

तुम से की, शरमाते हुए ,

आज कितने दिनों के बाद

तुमसे अकेले में की मुलाक़ात

 

और अपलक रही थी निहार…

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Added by kalpna mishra bajpai on March 28, 2015 at 9:30am — 6 Comments

गुलाब आँखें(संशोधित)......................‘जान’ गोरखपुरी

२१२२ २१२२ १२१२२



मेरी दुनिया रहने दो अपनी ख़्वाब आँखें

दो जहाँ हैं मेरी ये दो गुलाब आँखें



***



अब तू सम्हल जिंदगी होश खो चुके हम

साकिया ने है पिला दी शराब आँखे



**



ढूंढ लेंगे हम.....रहो पास तुम अगर बैठे

सब सवालों का देती हैं जव़ाब आँखें



***



मेरी मोहब्बत इबादत नफ़स-नफ़स है

रखती हर पल हैं मेरा सब हिसाब आँखें



**



तुम पलक के मस्त पन्ने उलटते जाओ

पढ़ रहा…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 27, 2015 at 10:30pm — 10 Comments

उदारता....(लघुकथा)

“ माँ! तुम्हे भैया के फ्लेट से आये हुए, यहाँ मेरे पास दो महीने हो गये है. उनका फ्लेट काफी बड़ा भी है, कुछ महीने वहाँ रह आओ. आखिर! उन्हें आपकी कमी भी तो महसूस होती होगी “  

अचानक अपने कमरे में से निकलकर छोटे बेटे के इन उदारता भरे शब्दों को सुनकर, माँ को दो माह पहले बड़े बेटे की उदारता याद आ गई. आँखों में नमी लेकर अपने कपड़ो का बेग जमाते हुये उसे मन में दोनों बेटों के फ्लेट,  अपनी कोख से बहुत  ही छोटे लग रहे थे..

 

 जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)      

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on March 27, 2015 at 10:52am — 42 Comments

मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया

मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया
था रब्त मुझसे भी कभी वो मान तो गया


आवारगी वही रही है आशिकी वही
दीवानेपन की इन्तहा को जान तो गया


दिल थे जिगर भी थे कभी वो और ही थे दिन
अब तो मशीनें रह गई इन्सान तो गया


कट तो रहा है वक्त यूं  तेरे बगैर भी
जीने का जिंदगी से वो सामान तो गया


मज़हब भी चल रहे हं सियासत की राह पर
ईमान से पहले सा वो ईमान तो  गया

मौलिक व अप्रकाशित

Added by charanjit chandwal `chandan' on March 27, 2015 at 7:00am — 1 Comment

सच

हर फूल खुश्बू नहीं देता,हर कली  फूल नहीं बनती           

हर चमकता रात  में तारा नहीं होता ,हर चमकता पत्थर हीरा नहीं होता

जरा संभल के मेरे दोस्त हर बात सच्ची नहीं होती

हर मीठा स्वर अच्छा नहीं होता, हर खड़ी जीज सहारा नहीं होती,

हर खून का रिश्ता अपना नहीं होता ,हर दोस्त सच्चा नहीं होता .

जरा सभंल........

हर रात काली नहीं होती,हर दिन उजाला नहीं होता,

हर रात दिवाली नहीं होती, हर रोज होली नहीं होती.

जरा संभल......

हर लाल कपड़ा कफ़न नहीं…

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Added by Shyam Mathpal on March 26, 2015 at 8:44pm — 14 Comments

सब्जी वाला है वो

गरीब है 

पर स्वाभिमानी बहुत है 

सब्जी की ढकेल 

शहर की कोलोनियों में 

घुमाता है

जोर जोर से सब्जियों के

नाम की आबाज

लगाता है

आखिर में ले लो साहब

कहकर जरूर चिल्लाता है

कुछ आदतें हो गयी हैं

उस पर हावी

कल की सब्जियों को भी 

कह जाता है ताजी

कुछ सब्जियाँ

पूरी बिक चुकी होती हैं

उनका भी नाम पुकार जाता है

बीच बीच में पानी के छींटों से

सब्जियों को सँवार जाता है

ऊँचे लोगों की नीची हरकतों को 

बखूबी पहचानता है

लाखों…

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Added by umesh katara on March 26, 2015 at 7:46pm — 24 Comments

इतनी सी बात ( व्यंग्य कथा ) - डा0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव

भगवान किसी को लडकी न दे I लडकी दे तो उसे जवान न करे I जवान करे तो उसे खूबसूरत न बनाये I  एक अदद जवान, खूबसूरत और कुमारी कन्या का खुशनसीब बाप होने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ I पहले मैं समझता था की स्वस्थ और सुन्दर लडकी का पिता होना एक गौरव की बात है I इससे न केवल उसका विवाह करने में आसानी होगी बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसे नर्तकी या अभिनेत्री भी बनाया जा सकता है और यदि उसमे कामयाबी न मिली  तो किसी प्राईवेट फर्म में रिसेप्शनिस्ट का चांस तो पक्का ही है  I लेकिन मेरे इन सभी सपनो पर उस समय…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 26, 2015 at 7:00pm — 18 Comments

मैं हूँ बीमारे गम :हरि प्रकाश दुबे

मैं हूँ बीमारे गम लेकिन ऐसा नहीं,

जैसे जुल्फ से जुल्फ टूटकर गिर पड़े !

मेरा दिल कांच की चूड़ियां तो नहीं,

एक झटका लगे टूटकर गिर पड़े !

मैं हूँ बीमारे गम …………

 

मेरे महबूब ने मुस्कराते हुए ,

नकाब चेहरे से अपने सरका दिया !

चौदहवीं का चाँद रात शरमा गया,

चौदहवीं का चाँद

जितने तारे थे सब टूटकर गिर पड़े !

मैं हूँ बीमारे गम …………

 

जिक्र जब छिड़ गया उनकी अंगडाई का,

शाख से फूल यूँ ,टूट कर गिर पड़े…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on March 26, 2015 at 9:00am — 16 Comments

ग़ज़ल -नूर



कहते हैं इल्ज़ाम छुपाकर रक्खा है

मैंने तेरा नाम छुपाकर रक्खा है.

.

झाँक के देखो मेरी इन आँखों में तुम

अनबूझा पैग़ाम छुपाकर रक्खा है.

.

शायद वो हो मुझ से भी ज़्यादा प्यासा

उसकी ख़ातिर जाम छुपाकर रक्खा है.

.

जिसको तुम सब कहते हो ईमाँ वाला,

उसने अपना दाम छुपाकर रक्खा है.

.  

आया है वो आज जुबां पर गुड लेकर

शायद कोई काम छुपाकर रक्खा है.

.

मस्जिद की…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 25, 2015 at 11:21pm — 24 Comments

दूसरों को....................'जान' गोरखपुरी

खुशियों में होते है सब हमसफ़र..

गम में साथ कोई खड़ा नही होता!

दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...

कोई बड़ा नही होता!

जाने कितनी खायी ठोकरें

लाख रंजिश की गम ने..!

सामने खींचकर बड़ी लकीर

बड़ा बनना सीखा नही हमने..!!

यही करना था तो सियासत आजमाई होती!

हाथ में कलम की न रोशनाई होती..

जंग अदब की मै लड़ा नही होता!!

दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...

कोई बड़ा नही होता!

जिसने रची है सारी ही सृष्टि!

उसने है…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 25, 2015 at 8:00pm — 14 Comments

अंतिम शब्द

अंतिम शब्द

द्वार खुला था

तुम दहलीज़ पर अहम्‌ के जूते उतार

सुस्मित शरद चाँदनी-सी कभी

कभी भोर की प्रथम किरण बनी

बाँहें फैलाए घर के भीतर चली आई

तुमने जिसे मंदिर बनाया

वह आँसू-डूबा उल्लास-भरा

मेरा मन था।

मन पावन था पावन रहा

कब कहा मैंने भगवान हूँ मैं

तुमने मुझको भगवान बनाया

और अब असीम बेरहमी से सहसा

जूतों समेत मेरे सीने पर चल कर

तुम्हारा प्रहार पर प्रहार ... उफ़ !

भीतर…

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Added by vijay nikore on March 25, 2015 at 12:30pm — 30 Comments

सूने पन्ने पे तेरा नाम .......'इंतज़ार'

बहुत बार समझाया

कभी दिल को फुसलाया

मगर खुद ही ना समझ पाया

मैं हूँ क्यों यहाँ पर

बस रोज़ वो अँधेरे

और तेरी यादें के

दहकते अंगारे

परवानों सा जलने की

दुआ करता हूँ

कुछ हसीन सपनों का व्यापार

अपनी नींदों से

किया करता हूँ

दिल में बसी मूरत को

पलकों में छिपा रखता हूँ

तेरी यादों को

कागज पे अक्सर उतार देता हूँ

जब सूने पन्ने पे तेरा नाम आता है

क्या जानू क्यूँ पन्ने को

अहंकार हो जाता है

और मुझे फिर से प्यार हो जाता है…

Continue

Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 25, 2015 at 11:48am — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल-- मैं ही फ़क़त नादान हूँ...... (मिथिलेश वामनकर)

2212---2212---2212---2212

 

देखो मुझे फिर ये कहो- क्या आज भी इंसान हूँ

क्यों इस तरह जतला रहें मैं कब कोई भगवान हूँ

 

ईमान का ऐलान हूँ तूफ़ान का फरमान…

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Added by मिथिलेश वामनकर on March 25, 2015 at 11:00am — 36 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - अभी गुफ़्तार में शामिल बहुत इक़रार बाक़ी है ( गिरिराज भंडारी )

1222     1222     1222     1222 

मुझे लूटो कि कांधों में अभी जुन्नार बाक़ी है

मेरे सर पे अभी पुरखों की ये दस्तार बाक़ी है

 

लड़ाई के सभी जज़्बे तिरोहित हो गये यारों

अना से मेल खाता सा कोई हथियार बाक़ी है

 

इशारों ने इशारों की बहुत बातें सुनी, लेकिन  

अभी गुफ़्तार में शामिल बहुत इक़रार बाक़ी है

 

दरारें जिस तरह खाई बनीं इस से तो लगता है

अभी भी बीच में अपने कोई दीवार बाक़ी है

 

गदा बन कर तेरे दर पे बहुत आया मेरे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on March 25, 2015 at 8:30am — 39 Comments

ग़ज़ल-निलेश "नूर"

२१२२/ २१२२/ २१२२/२१२२ 



हादसा टूटा जो मुझ पे हादसा वो कम नहीं है

ग़म ज़माने का मुझे है इक तेरा ही ग़म नहीं है.  

.

या ख़ुदा! तेरे जहाँ का राज़ मैं भी जानता हूँ,

हैं ख़ुदा हर मोड़ पर लेकिन कहीं आदम नहीं है.

.

तेरे वादे की क़सम मर जाएँ हम वादे पे तेरे,

क्या करें वादे पे तेरे तू ही ख़ुद क़ायम नहीं है. 

.

ज़ख्म वो तलवार का हो वार हो चाहे जुबां का

वक़्त से बढकर जहाँ में कोई भी मरहम…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on March 25, 2015 at 8:00am — 24 Comments

रिहाई--

जेल से रिहा होकर बहुत प्रसन्न था वो , कदम उसके उत्साह का साथ नहीं दे पा रहे थे | बस मन में एक ही इच्छा , कितनी जल्दी पहुंचे अपने घर , अपनों के बीच | भागते हुए अपने मोहल्ले में घुसा , नुक्कड़ की दुकान वाले चाचा ने जैसे अनदेखा कर दिया | उसे थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वो घर की ओर लपका | अचानक उसके कान में आवाज़ आई " किसने सोचा था कि ये भी इसमें शामिल हो सकता है , कितना मासूम चेहरा और ऐसी नापाक हरक़त "|

शक के बिना पर उसकी गिरफ्तारी हुई थी , वज़ह थी उसके कुछ दोस्त जो सामाजिक…

Continue

Added by विनय कुमार on March 24, 2015 at 10:48pm — 14 Comments

औलाद - लघुकथा

"देख बड़ी बहू तूने छोटी बहू को लेकर डाॅक्टरो के बहुत चक्कर लगा लिये, इससे कुछ नही होगा?" हस्पताल से देवरानी का चेकअप कराकर रमा घर लौटी ही थी कि सासु माँ शुरू हो गयी। "अब तो स्वामी जी की दया हो तो ही छोटी की गोद में किलकारी गूँजेगी।" सासु माँ का बोलना जारी था।

"कल ही स्वामीजी से बात करके ले जाऊँगी इसे उनके आश्रम में 'सप्त रात्रि' की पूजा के लिये।"

"बड़ी बहू अगर तू भी पूजा छोड़ बीच में नही भाग आयी होती तो उन के आर्शीवाद से आज तेरी गोद भी...........।

"बस कीजिये माँजी।" रमा पुरानी… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on March 24, 2015 at 9:56pm — 25 Comments

अपना मयंक....

अपना मयंक....

ये दर्द था या
स्मृति का संदेश
मैं समझ ही न सका
बस जल भरे नयनों से
उस मयंक में
अपना मयंक ढूंढता रहा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 9:24pm — 8 Comments

जिसे हर शय में................'जान' गोरखपुरी

१२२२ १२२२

जिसे हर शय में देखा था

नजर का मेरी धोखा था।

भरम तेरी निगाहों का

कोई जादू अनोखा था।

सदी बीती जहां लम्हों

मेरा जग वो झरोखा था।

बरसतीं खार आखें अब

लबों सागर जो सोखा था।

गया न इश्क खूँ रब्बा

चढ़ाया रंग चोखा था।

नसीबी ‘’जान’’ रोये क्यूँ

ख़ुदा का लेखा जोखा था।

******************************************

मौलिक व् अप्रकाशित (c) ‘जान’…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 24, 2015 at 8:12pm — 12 Comments

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