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गुलाब आँखें(संशोधित)......................‘जान’ गोरखपुरी

२१२२ २१२२ १२१२२


मेरी दुनिया रहने दो अपनी ख़्वाब आँखें
दो जहाँ हैं मेरी ये दो गुलाब आँखें


***


अब तू सम्हल जिंदगी होश खो चुके हम
साकिया ने है पिला दी शराब आँखे


**


ढूंढ लेंगे हम.....रहो पास तुम अगर बैठे
सब सवालों का देती हैं जव़ाब आँखें


***


मेरी मोहब्बत इबादत नफ़स-नफ़स है
रखती हर पल हैं मेरा सब हिसाब आँखें


**


तुम पलक के मस्त पन्ने उलटते जाओ
पढ़ रहा हूँ मै तुम्हारी किताब आँखें

*****************************************
मौलिक व् अप्रकाशित (c) ‘जान’ गोरखपुरी
*****************************************

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Comment

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Comment by jaan' gorakhpuri on March 31, 2015 at 6:06pm
आ० हरी प्रकाश दुबे सर!आभार!
Comment by jaan' gorakhpuri on March 30, 2015 at 10:37pm

आ० rajesh kumari जी आपकी विस्तृत समीक्षा पाकर अभिभूत हूँ!धीरे धीरे सुधार की ओर तत्पर हूँ! आपके अमूल्य सुझाव के लिए बहुत बहुत आभार! इसी प्रकार मार्गदर्शन करते रहें!मेरा सौभाग्य होगा! सादर!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 30, 2015 at 10:34pm

आदरणीया pratibha tripathi जी सराहना हेतु बहुत बहुत शुक्रिया!!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 30, 2015 at 10:33pm

आ० Shyam Narain Verma जी उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 30, 2015 at 10:32pm

आदरणीय गोपाल सरजी रचना पर आपकी सार्थक प्रतिकिया पाकर मन ख़ुश हुआ!आपके बताये अनुसार कमी को सुधारने  का प्रयास करूँगा!!बहुत बहुत आभार!आदरणीय!

Comment by jaan' gorakhpuri on March 30, 2015 at 10:30pm

कंप्यूटर में तकनीकी ख़राबी और समय की कमी के कारण आप सभी के टिपण्णी पर समय पर अपनी प्रतिक्रिया न दे पाने का मुझे खेद है!

Comment by Hari Prakash Dubey on March 30, 2015 at 8:15pm

सुन्दर प्रयास ,भाई क्रृष्ण मिश्र जी ,,बाकी आदरणीया राजेश जी ने कह ही दिया है ,मुझे तो इस विधा का विशेष ज्ञान  नहीं है ! शुभकामनायें आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 28, 2015 at 11:02pm

अब तू सम्हल जिंदगी होश खो चुके हम

है मिला दी आंखों उसने शराब आँखें-----मिसरा व्याकरण के हिसाब से दुरुस्त नहीं है 

*

ढूंढ लेंगे हम.....रहो पास तुम बैठे

सब सवालों का देती हैं जव़ाब आँखें---ये शेर बेबह्र हो रहा है 

***

**

मेरी मोहब्बत इबादत है हर नफ़स में-----मुहब्बत सही शब्द  दूसरे जुज्ब-ए-रदीफैन दोष भी आ रहा है 

रखती हो तुम तो मेरा सब हिसाब आँखें-----यहाँ भी व्याकरण गड़बड़ है --रखती हैं अब तो  मेरा सब हिसाब आँखें-  ----हो सकता है 

***

तुम पलक के मस्त पन्ने उलटते जाओ

पढ़ रहा हूँ 'जान' तेरी किताब आँखें-----उला में तुम ....सानी  में  तेरी ??? शुतुर्गुरबा दोष बन रहा है 

कृष्णा जी ,आप ग़ज़लों पर अच्छा प्रयास कर रहे हैं ,ग़ज़ल की कक्षा की सभी पोस्ट पढ़ते जाइए धीरे धीरे ग़ज़ल सधने लगेंगी 

Comment by Shyam Narain Verma on March 28, 2015 at 3:57pm
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 28, 2015 at 3:24pm

आ ० कृष्णा जी

बहुत  सुन्दर  गजल . मतला उम्दा . चौथे शेर में लाज्तमा-ए -जुज्ब -ए -रदीफैन दोष को देखिएगा  सस्नेह .

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