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जो न सोचा था कभी............'जान' गोरखपुरी

२१२२ २१२२ २१२१२

जो न सोचा था कभी,वो भी किया किये

हम सनम तेरे लिये,मर-मर जिया किये

***

तेरी आँखों से पी के आई जवानियाँ

दम निकलता गो रहा पर हम पिया किये

***

आँख हरपल राह तकतीं ही रही सनम..

फर्श पलकों को किये,दिल को दिया किये

***

आदतन हम कुछ किसी से मांग ना सके

और हिस्से जो लगा वो भी दिया किये

***

जख्म को अपने कभी मरहम न मिल सका

गैर के जख्मों को हम तो बस सिया किये

******************************************

मौलिक व् अप्रकाशित (c) ‘जान’ गोरखपुरी

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Comment

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 12:42pm

आ० जितेन्द्र सर! आपकी सराहना से बल मिला,बहुत बहुत शुक्रिया!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 12:41pm

आदरणीय nilesh Shevgaonkar सर!जब लगन लगा दी है,लगाने वाले ने तो रुकने,छुटने की बात ही कहाँ आती है??,बस आप जैसे अग्रजों का पावन सानिध्य और मार्गदर्शन मिलता रहे!रचना पर आपका मार्गदर्शन पाकर अभिभूत हूँ!बहुत बहुत आभार!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 12:35pm

आ० मिथिलेश सर आपकी उपस्थिति सदा मूल्यवान रहती है,जी बिल्कुल मै आप सभी अग्रजों की बातों को सूत्र मानकर स्वध्याय कर रहा हूँ!आभार!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 12:32pm

आ० गोपाल सर मेरी रचनाओ पर आपका आशीर्वाद और मार्गदर्शन मिलना मेरा सौभाग्य है,आपके स्नेह से मै अभिभूत हूँ!
जो लाज्तमा -ए-जुज्ब- ए -रदीफैंन दोष दोष आ रहा है,वह जानकार ही किया है,क्युकी सर कोई और तरह से शब्द रखने से मै संतुष्ट नही हो पा रहा था!इसके लिए क्षमा चाहूँगा!सर यह रचना मैंने २००६ में लिखी थी,इसे बहर में रखकर मैंने यहाँ प्रस्तुत करने की कोशिश की है!मूल तरनुनुम गायन का रूप न बिगड़े,इसलिये कहन में दोष आ जा रहा है.ये मेरा विकार है कि मै कहन के मामले में अभी कच्चा हूँ!धीरे-धीरे सुधार कर रहा हूँ!आशीर्वाद बनाये रक्खे आदरणीय!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 12:18pm

आ० विजय सरजी हैस्लाफजई के लिए बहुत बहुत आभार!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 12:18pm

आ० हरिप्रकाश सरजी! रचना के अनुमोदन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 12:16pm
आ० sushil sarna जी आभार!
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 2, 2015 at 9:44am

आदतन हम कुछ किसी से मांग ना सके

और हिस्से जो लगा वो भी दिया किये.......बहुत सुंदर. इस अशआर पर विशेष बधाई स्वीकारें

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 1, 2015 at 2:22pm

और हाँ सिया किये भी ठीक नहीं है .. सिला किये प्रयुक्त होना चाहिए शायद 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 1, 2015 at 2:19pm

आ. अच्छा प्रयास हुआ है.
कहन अपूर्ण है. जहाँ तक काफिये का सवाल है उसे ठीक से निभाया है आपने पर कहन के अधूरे पन ने बात संप्रेषित नहीं होने दी है.
आ. डॉ श्रीवास्तव साहब की बात को आगे बढाते हुए ये कहूँगा कि एक दिया तो देने वाला लगा और एक दिया असल में दीया (दीपक) है. दीये को दिया लिखना जायज़ है लेकिन काफ़िये में मात्रापतन अपने आप में एक दोष है.
काफिये के आसपास ग़ज़ल बुनी जारी है और वहीँ यदि मात्रा गिरानी पड़े तो गड़बड़ हो जाती है.
आपके प्रयास के लिए आपको बधाई. चल पड़े हैं तो मंज़िल मिल ही जाएगी. रुकियेगा मत.
सादर          

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