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May 2014 Blog Posts

मन की उपलब्धियों की ढेरी

बेकार अख़बारों की ढेरी जैसा

खाली दूध की थैली व बोतल -सा

मन की उपलब्धियों का -

माल बिक सकता है ?

कोई कबाड़ी वाला आएगा।

ये सब ले जाएगा,

पूरा-का-पूरा कबाड़ उठ जाएगा

सच्ची सजावट सुथरी हो कर निखरेगी

हर चीज यथावत रखी हुई चमकेगी ।

मन की उपलब्धियों की इस ढेरी में

टूटे-फूटे शीशों और कनस्तर जैसा-

मुरझाया हुआ विश्वास,

फटे-पुराने जूतों सा-

बदरंग स्वाभिमान ,

टूटी -फूटी काँच की बोतल…

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Added by kalpna mishra bajpai on May 3, 2014 at 4:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
यूँ ही सोचा ज़माने की रविश भी जान ली जाये - ग़ज़ल

1222/ 1222/ 1222/ 1222

यूँ ही सोचा ज़माने की रविश भी जान ली जाये

पसे तस्वीर सूरत किसकी है पहचान ली जाये               पसे तस्वीर= तस्वीर के पीछे

 

ज़रा देखूँ कि सच कितना है तेरे इन दिखावो में

चलो कुछ देर को तेरी कही भी मान ली जाये         

 

कभी तो आप अपने तज़्रिबे से तौलें सच्चाई

ज़रूरी तो नहीं है हाथ में मीज़ान ली जाये                    मीज़ान =तराजू

 

नहीं लगती मुझे अनुकूल मौसम की तबीयत क्यूँ

बरस जायें न…

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Added by शिज्जु "शकूर" on May 3, 2014 at 12:30pm — 23 Comments

विश्वासों की बढती डोर- लक्ष्मण लडीवाला

जयकारी/चोपई छंद (१५ मात्राओं के इस छंद में चरणान्त गुरु लघु से)

राष्ट्र सृजन में जिनका योग, उनको कहे पुरोधा लोग

जनता का मिलता सहयोग, खुशहाली का होता योग |

कानूनन जन हित का भान, सफल प्रशासक उसको मान

योग्य प्रशासक का सम्मान, तभी देश का हो उत्थान ||

 

जड़ चेतन का जिसको भान, उसमे ही आध्यात्मिक ज्ञान

परम पिता ने डाले प्राण, इसके मिलते बहुत प्रमाण |

जिसमे हो सेवा का भाव, मन में वह रखता सद्भाव

जिसमे भी जिज्ञासा जान, गुरुवर का वह…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 3, 2014 at 10:00am — 12 Comments

तान्या : तुम्हे पा कर

तुम आये

मै खुश था

बहुत खुश /

मुझे घेर लेते थे

या कहो

कोशिश करते थे

घेर लेने की /

कुछ अहसास

उल्लास ,दर्प , ईर्ष्या ,द्धेष

सम्मान / कुछ मखमली से

कुछ अनजाने से भी

और मैं उड़ता था / परी कथाओं के

नायक की तरह

पंखों वाले सफ़ेद घोड़े पर

खुशगवार मौसम में

चमकीली धूप में

नीले आसमान में /

सर-सर चलती हवाएं से आगे

और आगे ।

और फिर

जैसा कि सुनता आया था सबसे/

कि ऐसा ही होता है /…

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Added by ARVIND BHATNAGAR on May 3, 2014 at 8:00am — 11 Comments

ऋतु गर्मी की आई

ऋतु गर्मी की आई

छन्न पकैया छन्न पकैया, ऋतु गर्मी की आई|

आँधी धूल उडाते चलती, बहे गर्म लू भाई|१|

छन्न पकैया छन्न पकैया, नीम सिरिष हैं फूले |

हवा सुगंध बिखेरे उनकी, खुशबू से मन झूले|२|…

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Added by Satyanarayan Singh on May 2, 2014 at 9:30pm — 24 Comments

गैर जरूरी चीजें

तमाम गैर जरूरी चीजें 

गुम हो जाती हैं घर से चुपचाप 

हमारी बेखबर नज़रों से 

जैसे मम्मी का मोटा चश्मा 

पापा जी का छोटा रेडियो 

उन दोनों के जाने के बाद 

गुम हो जाता है कहीं 

पुराने जूते, फाउंटेन पेन, पुराना कल्याण 

हमारी जिंदगी की अंधी गलियों से .... 

हर जगह पैर फैलाकर कब्जा करती जाती है 

हमारी जरूरतें, लालसाए 

आलमारी में पीछे खिसकती जाती है 

पुरानी डायरी, जीते हुये कप 

मम्मी का भानमती का…

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Added by Amod Kumar Srivastava on May 2, 2014 at 7:59pm — 11 Comments

गजल : बिंदी, काजल, झुमके, बेसर, चूड़ियां//शकील जमशेदपुरी

बह्र : 2122/2122/212



बिंदी, काजल, झुमके, बेसर, चूड़ियां

पास वो रखतीं हैं कितनी बिजलियां



आज फिर उसने किया है मुझको याद

आज फिर अच्छी लगीं हैं हिचकियां



खुशबू तेरी लाएगी बाद-ए-सबा          [बाद-ए-सबा = सुब्ह की हवा]  

खोल दी कमरे की मैंने खिड़कियां



तेरी जुल्फों से उलझती है हवा

काश मैं भी करता यूं अठखेलियां



दिल तो तेरे नाम से मंसूब था          [मंसूब= निर्दिष्ट, Assign]

यूं बहुत आई थी दर पे लड़कियां



जब…

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Added by शकील समर on May 2, 2014 at 6:00pm — 15 Comments

रिटायरमेंट

केदार के मरने की खबर सुनते ही एक मिनट को राय साहब चौंके फिर अपने को सामान्य करते हुये बस इतना ही कहा अरे अभी उसी दिन तो आफिस में आया था पेंशन लेने तब तो ठीक ठाक था। ‘हां, रात हार्ट अटैक पड गया अचानक डाक्टर के यहां भी नही ले जा पाया गया’ राय साहब ने कोई जवाब नहीं दिया बस हॉथो से इशरा किय, सब उपर वाले की माया है, और चुपचाप चाय की प्याली के साथ साथ अखबार की खबरों को पढने लगे। खबर क्या पढ रहे थे। इसी बहाने कुछ सोच रहे थे।



चाय खत्म करके राय साहब ने अपनी अलमारी खोल के देखा पचपन हजार…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on May 2, 2014 at 1:30pm — 12 Comments

ऐसे नेता को क्या कहिए -// व्यंग्य रचना // अन्नपूर्णा बाजपेई' अंजु'

ऐसे नेता को क्या कहिए

जो पीटे हिन्दू मुस्लिम राग

सांप्रदायिकता का बिगुल

बजा कर लगाये देश मे आग 

ऐसे नेता .......

जिनका कोई ईमान नहीं 

धर्म से कोई प्रेम नहीं 

राष्ट्र प्रेम का ढोंग दिखाएँ 

बेबस जनता को लूटें खाएं 

ऐसे नेता .......

गिरगिट से होते नेता 

पल मे रंग बदलते नेता 

पल मे तोला पल मे माशा 

खूब दिखाते रोज तमाशा 

ऐसे नेता .......

हाथ जोड़ ये दौड़े आते 

झोली…

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Added by annapurna bajpai on May 2, 2014 at 1:30pm — 18 Comments

मजदूर दिवस : काश ऐसा न होता...

रात अंधड़ में 

छितराए फूस के छप्पर को 

करना है दुरस्त

लेकिन समय कहाँ

अभी तो जाना है काम पर 



फिरसे फूल आये पेट में 

कुलबुला रहा है जीव 

अनमनी सी कराह रही घरवाली

रांध नही पाती भात...



भूखे पेट पैडल मारता भूरा 

टुटही साइकिल खींच रहा 

ससुरी चैन साईकिल की 

काहे उतरती बार-बार

भूरा बेबस-लाचार, 

ठीकेदार का मुंशी भगा देगा उसे 

जो देर से पहुंचा वो...

लड़ भी तो नही सकता 

भगा दिया गया तो 

डूब…

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Added by anwar suhail on May 2, 2014 at 9:37am — 9 Comments

चुनावी क्षणिकाएँ

1

जारी है कवायद

शब्दों को रफ़ू करने की

बुलाये गए हैं 

शब्दों के खिलाड़ी

 

शब्द

काटे जोड़े और

मिलाये जा रहे हैं

रचे और रंगे जा रहे हैं

शब्दों का सौंदर्यीकरण जारी है

2

शब्द

कभी चाशनी में

घोले जा रहे हैं

तो कभी छौंके जा रहे हैं 

कढ़ाई में

फिर जारी है खिलवाड़

हमारे सपनों का

 

3

 

भाँपा जा रहा है मिजाज़

हर शख्स का

अचानक…

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Added by नादिर ख़ान on May 2, 2014 at 8:30am — 11 Comments

एक नज़्म - रतजगे

एक नज़्म

रतजगे

इक खयाल दिल मे उठा

रात के सन्नाटे मे

मेरी नींदों को उड़ाकर

क्या वो भी जागी है

मैं ही बुनता हूँ उसके

ख्वाब या फिर

मेरे ख़याल से

वाबस्ता वो भी है

मेरे अश्कों के लबों पे

है बस सवाल यही

उसके तकिये पे भी

थोड़ी सी नमी है कि नहीं

रतजगों से है परेशान

अब मेरा बिस्तर

उसने भी काटी है क्या

कोई शब जगकर

मेरे ज़ेहन के दरीचों से…

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Added by Gajendra shrotriya on May 2, 2014 at 6:00am — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
( ग़ज़ल ) दुश्मनी ही, मोल लें क्या ( गिरिराज भन्डारी )

2122          2122  

दस्तो बाज़ू खोल  लें क्या

फिर परों को तोल लें क्या

 

शब्दों  में धोखे  बहुत  हैं

मौन में  ही बोल  लें क्या

 

दोस्त के  क़ाबिल नहीं वो

दुश्मनी ही,  मोल लें क्या

 

और  कितना  हम  लुटेंगे

हाथ  में  कश्कोल लें क्या ------ कश्कोल - भिक्षापात्र

 

दिल हमारा ,साफ  है  तो

रंग, कुछ भी घोल लें क्या

 

नीम है , हर  बात उनकी

हम ही मीठा ,बोल लें…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 1, 2014 at 4:30pm — 47 Comments

मजदूर दिन

छंद मदन/रूपमाला

(चार चरण: प्रति चरण २४ मात्रा,

१४, १० पर यति चरणान्त में पताका /गुरु-लघु)



मजदूर दिन



मजदूर दिन जग मनाता, शान से है आज।

कर्म के सच्चे पुजारी, तुम जगत सर ताज।।

प्रतिभागिता हर वर्ग की, देश आंके साथ।

राष्ट्र के उत्थान में है, हर श्रमिक का हाथ।१।



श्रम करो श्रम से न भागो, समझ गीता सार।

सोया हुआ भाग्य जागे, जानता संसार।।

श्रम स्वेद पावन गंग सम, बहे निर्मल धार।

श्रम दिलाता मान जीवन, श्रम प्रगति का द्वार।२।…

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Added by Satyanarayan Singh on May 1, 2014 at 4:00pm — 13 Comments

हे स्त्री !!

उठो हे स्त्री !

पोंछ लो अपने अश्रु

कमजोर नही तुम

जननी हो श्रृष्टि की

प्रकृति और दुर्गा भी, 

काली बन हुंकार भरो

नाश करो!

उन महिसासुरों का

गर्भ में मिटाते हैं

जो आस्तित्व तुम्हारा, 

संहार करो उनका जो

करते हैं दामन तुम्हारा

तार-तार,

करो प्रहार उन पर

झोंक देते हैं जो

तुम्हें जिन्दा ही

दहेज की ज्वाला में,

उठो जागो !

जो अब भी ना जागी

तो मिटा दी जाओगी और

सदैव के लिए इतिहास

बन कर रह जाओगी…

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Added by Meena Pathak on May 1, 2014 at 2:10pm — 19 Comments

चुनावी चौपई ( चौपई छंद ) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

चौपई छंद - प्रति चरण 15 मात्रायें चरणान्त गुरु-लघु

==================================

ऋतु चुनाव की जब आ जाय। यहाँ वहाँ नेता टर्राय॥

सज्जन दिखते, मन में खोट। दांत निपोरें, माँगे वोट॥

 

जिसकी बन जाती सरकार। सेवा नहीं, करते व्यापार॥

नेता अफसर मालामाल। देश बेचने वाले दलाल॥

 

जब अपनी औकात दिखांय। बिना सींग दानव बन जांय॥

नख औ दांत तेज हो जाय। देश नोंचकर कच्चा खांय॥

 

है इनमें कुछ अच्छे लोग। न लोभी हैं, न कोई…

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Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on May 1, 2014 at 1:00pm — 16 Comments

मुहब्बतों की ज़मीन पर ....

मुहब्बतों की ज़मीन पर ....

वो जागती होगी

यही सोच हम तमाम शब सोये नहीं

चुरा न ले सबा नमीं कहीं

हम एक पल को भी रोये नहीं

वो रुख़्सत के लम्हात,वो अधूरे से जज़्बात

बंद पलकों की कफ़स में कैद वो बेबाक से ख्वाब

क्या वो सब झूठ था

क्यों पल पल के वादे हकीकत की धूप में

हरे होने से पहले ही बेदम हो कर झरने लगे

अटूट बंधन के समीकरण बदलने लगे

खबर न थी कि हमारी खुद्दारी

हमें इस…

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Added by Sushil Sarna on May 1, 2014 at 12:30pm — 14 Comments

कविता : ग्रेविटॉन

यकीनन ग्रेविटॉन जैसा ही होता है प्रेम का कण

तभी तो ये दोनों मोड़ देते हैं दिक्काल के धागों से बुनी चादर

कम कर देते हैं समय की गति…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 1, 2014 at 10:30am — 12 Comments

आचरण सबको यहाँ अब है नकाबों की तरह - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    2122    212

***

हर खुशी  हमको  हुई  है अब सवालों  की तरह

और दुख आकर मिले हैं नित जवाबों की तरह

***

चाँद  निकला  तो  नदी में  देख छाया  खुश रहे

रोटियाँ  अब हम गरीबों को  खुआबों  की तरह

***

यूं कभी  जिसमें कहाये  यार हम  महताब थे

उस गली में आज क्यों खाना खराबों की तरह

***

एक भी आदत नहीं ऐसी कि तुझको  गुल कहूँ

पास काँटें क्यों रखो फिर तुम गुलाबों की तरह

***

है हमें तो जिन्दगी में साँस-धड़कन यार ज्यों

आप…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 1, 2014 at 9:30am — 13 Comments

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