For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

यकीनन ग्रेविटॉन जैसा ही होता है प्रेम का कण

तभी तो ये दोनों मोड़ देते हैं दिक्काल के धागों से बुनी चादर

कम कर देते हैं समय की गति

इन्हें कैद करके नहीं रख पातीं स्थान और समय की विमाएँ

ये रिसते रहते हैं एक ब्रह्मांड से दूसरे ब्रह्मांड में

ले जाते हैं आकर्षण उन स्थानों तक

जहाँ कवि की कल्पना भी नहीं पहुँच पाती

अब तक किये गये सारे प्रयोग

असफल रहे इन दोनों का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण खोज पाने में

लेकिन ब्रह्मांड का कण कण इनको महसूस करता है

यकीनन ग्रेविटॉन जैसा ही होता है प्रेम का कण

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 649

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 28, 2014 at 10:13am

बहुत बहुत शुक्रिया Satyanarayan जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 28, 2014 at 10:12am

बहुत बहुत शुक्रिया Dr.Prachi Singh जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 28, 2014 at 10:12am

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ Saurabh Pandey जी। स्नेह बना रहे।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 28, 2014 at 10:11am

बहुत बहुत शुक्रिया गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 28, 2014 at 10:11am

धन्यवाद annapurna bajpai जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 28, 2014 at 10:11am

बहुत बहुत शुक्रिया Arun जी

Comment by Satyanarayan Singh on May 23, 2014 at 5:14pm

प्रेम को विज्ञान की परिधि में परिभाषित करती इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 23, 2014 at 11:23am

बहुत सार्थकता से प्रेम के मूल कारण/स्वरुप तक पहुँचने का प्रयास हुआ है.. मुझे लगता है की हिग्ज़ बोजोन या ग्रेविटोन कण ही वो माध्यम हैं जिनसे ये सारी प्रकृति /ब्रह्माण्ड परस्पर आबद्ध हैं/ खूबसूरत समन्वय में हैं एक वार्तालाप करते से...

फिजिक्स को मेटा-फिजिक्स तक ले जाती... इस गहन प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 15, 2014 at 1:02am

प्रेम की सार्वभौमिकता को जिन बिम्बात्मक नोमेनक्लेचर के साथ रखा गया है वह अचंभित करता है. बहुत-बहुत शुभकामनाएँ..


चाहे वो फोटोन्स हों या वो ग्लुऑन्स हों या फिर बोसोन्स हों यानि गॉड्स ओन पार्टिकल्स ! कुछ हैं जो प्राणिजगत के मस्तिष्क के न्यूरान कोशिकाओं (सेल्स) को संयमित और संतुलित करते हैं कि उन्हें आखिर सिग्नल क्या आते हैं !

ये सिग्नल ही तो संप्रेषणीयता का इंगित हैं. इन्हीं इंगितों की सार्थकता को साहित्य और कला परिभाषित करती हैं, जो हॉरमोन्स की सान्द्र तीव्रता मात्र पर निर्भर नहीं करते..वस्तुतः, मनस की वृत्तियों का विस्तार मनोविज्ञान के माध्यम से समझ में आता है.
आपकी इस रचना के लिए बधाई, आदरणीय..
:-)))


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 2, 2014 at 10:32pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , प्रेम को नये ढंग से परिभाषित हो ते देख बहुत अच्छा  लगा ! आपको हार्दिक बधाई ॥

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
18 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service