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विश्वासों की बढती डोर- लक्ष्मण लडीवाला

जयकारी/चोपई छंद (१५ मात्राओं के इस छंद में चरणान्त गुरु लघु से)

राष्ट्र सृजन में जिनका योग, उनको कहे पुरोधा लोग

जनता का मिलता सहयोग, खुशहाली का होता योग |

कानूनन जन हित का भान, सफल प्रशासक उसको मान

योग्य प्रशासक का सम्मान, तभी देश का हो उत्थान ||

 

जड़ चेतन का जिसको भान, उसमे ही आध्यात्मिक ज्ञान

परम पिता ने डाले प्राण, इसके मिलते बहुत प्रमाण |

जिसमे हो सेवा का भाव, मन में वह रखता सद्भाव

जिसमे भी जिज्ञासा जान, गुरुवर का वह करता मान ||

 

नदी के जब मिले दो छोर, विश्वासों की बढती डोर 

प्राची में जब होती भोर, मन की बगिया भरे हिलोर |

श्रमिक नीव का पत्थर मान, तभी देश को हो उत्थान

सैनिक का जब हो सम्मान. देश सुरक्षित तब ही मान ||

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 20, 2014 at 10:57am

छंद पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री सौरभ भाई जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 20, 2014 at 3:32am

चौपई छन्द पर बहुत ही संयत रचना हुई है, आदरणीय. बहुत-बहुत बधाई !

आदरणीय अखिलेशजी ने शब्द-संयोजन पर सार्थक बात कही है.

सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 5, 2014 at 9:23am

रचना को मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री अरुण कुमार निगम जी -

जोड़े दोनो कर कर विलग, हम आपसे है नहीं विलग  

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 5, 2014 at 9:17am

आपका हार्दिक आभार श्री केवल प्रसाद जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on May 4, 2014 at 9:23pm

जीवन का लिख दिया निचोड़, हम हतप्रभ अपने कर जोड़ ..................बधाई....................

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 4, 2014 at 12:40pm

रचना सराहकर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीया कुंती मुकर्जी | सादर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 4, 2014 at 12:39pm

रचना पसंद कर सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री शिज्जू शकूर भाई, श्री अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी, और श्री गिरिराज भंडारी जी, प्रवाह हेतु आपका शुझाव मान्य भाई श्री गिरिराज जी 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 4, 2014 at 11:54am

आ0 लक्ष्मण सरजी, वाह! बहुत सुन्दर छन्द। हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by coontee mukerji on May 4, 2014 at 12:23am

नदी के जब मिले दो छोर, विश्वासों की बढती डोर 

प्राची में जब होती भोर, मन की बगिया भरे हिलोर |

श्रमिक नीव का पत्थर मान, तभी देश को हो उत्थान

सैनिक का जब हो सम्मान. देश सुरक्षित तब ही मान ||.....सत्य वचन.आपको साधुवाद...लक्ष्मण जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 3, 2014 at 7:42pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , सुन्दर चौपाई छंद रचना के लिये बधाई , आदरनीय अखिलेश भाई जी की सलाह पर ज़रूर ध्यान दीजियेगा ।

कृपया ध्यान दे...

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