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All Blog Posts (19,170)

मेरी आह के बाद ....

सुनो,

तुम तो जानती ही हो ....

मेरी ग़ज़ल,

मेरी कविताओं ...

के हर अलफ़ाज़ को ...

और ये भी,

कि ये दुनियाँ कितनी रुखी है ...

ये जमाने भर तल्खी,

अक्सर घाव कर देती है,

मुझ पर ...

फिर तितलिया ..

वक्त के साथ साथ,

फीकी पड़ जाती है,

चुभते है नाश्तर बन के रंग...

और एक कसक लिए मैं,

जमाने के दरार वाले इस पहाड़ के पीछे,

करता हूँ तुम्हारा इन्तजार ..

तुम देखना,

एक दिन ये दुनियाँ,

ताजमहल के साथ भरभरा कर,

गिर…

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Added by अमि तेष on June 11, 2013 at 3:11am — 15 Comments

एक गीतिका ज़िदगी की

ज़िंदगी इतने दिन तूफ़ान रही,

कभी बारिश,कभी मुस्कान रही 



मिर्च थी खूब,मसाले भी बहुत

सौदा-सुलुफ की ये दुकान रही 

लोग चेहरे लगाये ,आये ,गए 

कौन रिश्ते थे बस पहचान रही 



आसमां पर निरी सलाखें थीं 

अपनी आँगन में ही उड़ान रही 

खूब ढोया है उम्र को हमने 

इसलिए दोस्त,कुछ थकान…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 10, 2013 at 10:55pm — 12 Comments

पिता,परमात्मा सा होता है

पिता परमात्मा सा होता है

जो जन्म देकर दुनिया में ले आता है

वो दुनिया दिखाने वाला पिता,परमात्मा से कैसे कम है

हमारी आहट से जो सन्न हो जाता है

जिसके भीतर हर पल हमारे पालन की चिन्ता पलती है

जो हमें जन्म देने के बाद,

अपने सारे सुख भूल जाता है।।

दुनिया में हमारे आने के बाद

वो एक राह पर ही चलता है

और अपने पुरातन ताज्य कार्य भी छोड देता है

उसकी दुनिया हमारी आहट से बदल जाती है

वो पिता परमात्मा सा होता…

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Added by सूबे सिंह सुजान on June 10, 2013 at 4:38pm — 11 Comments

"शुक्रिया"

यूँ पाठ जिंदगी का पढ़ाने का शुक्रिया

की बेरुखी से मुझको भुलाने का शुक्रिया



गुज़रे हुए निशान कुछ रेती पे पैर के

यादें यूँ अपनी छोड़ के जाने का शुक्रिया



कोई तो चाहिए ही था इक हमसफ़र तुझे

दिल में किसी को और बसाने का शुक्रिया



रातों से हो गयी है मुहब्बत सी अब हमें

ख्वाबों में ही दीदार कराने का शुक्रिया



दिल मोम का है सोंच के रोता रहा सदा

पत्थर कि तरहा दिल को बनाने का शुक्रिया



मुझको लगा ये काफ़िला मेरे ही साथ है…

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Added by Anurag Singh "rishi" on June 10, 2013 at 1:15pm — 11 Comments

कौन...??

दोस्तों को दुश्मन बनाया है किसने ..

शमशान में लाशों को पहुँचाया है किसने..



किसने किसको, किसको है देखा ..

न देखा है हमने न, देखा है तुमने...



हुयी शाम और ये रात है आयी..

किसने ये तारों की महफ़िल सजाई ...



सोचते-सोचते में सो गया हूँ ..

रात की कालिमा में मैं खो गया हूँ..



किसने इस कालिमा को लालिमा बनाया ..

किसने मुझको फिर से जगाया..



किसने किसको, किसको है देखा ..

न देखा है हमने न, देखा है तुमने... …

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 10, 2013 at 12:00pm — 8 Comments

किस काबिल किया - ग़ज़ल

मालिक ने इस दौड़ में यूं ही नहीं शामिल किया,

फ़क्त ये जानना ज़रूरी है कि किस काबिल किया |

 

कहते रहे जो ज़िंदगी भर खुदा ही आख़िरी ज़रुरत है,

उन्होंने अपनी रूह तक को भी ना हासिल किया |

 

बहुत कोशिशें की मगर पढ़ ना सके उस इबारत को,

जिन हर्फों ने राम और रहमान को फ़ाज़िल किया|

 

सोचा वो धुँआ थी, बिखर के मिल गयी हवाओं में

हर अधूरी ख्वाहिश को इस तरहा मुकम्मिल किया|

 

मैं ना ग़ालिब था, ना मीर ना ही और कोई…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on June 10, 2013 at 11:55am — 7 Comments

आकाशदीप

आकाशदीप
‘’ आओ ! आओ ! मेरे पास आओ ! ! ‘’
हर शाम आकाश का निमंत्रण आता ,
उसे पाने का हर सम्भव प्रयास ,
साम दाम दण्ड भेद मैंने अपनाया .
मन की तृष्णा कहूँ या कमज़ोरी ,
सबने उन्नति कह स्वागत किया .
मेरे रास्ते में अनेक तारेपुंज थे ,
पर आजीवन एक ही लक्ष्य है साधा .
आकाशदीप पाने हेतु पथ में ,
कितने तारे टूटे कितने हुए धूल ,
आया भी हाथ में एक बुझा दीपक ,
लोभ में नष्ट हुआ जीवन समूल .
( मौलिक व अप्रकाशित रचना )

Added by coontee mukerji on June 10, 2013 at 11:13am — 1 Comment

प्रकृति

पेड़ पर बैठी चिड़िया बोली

ओ जंगल के राजा

मानव कितना अभिमानी है

इसको तू खाजा

स्वार्थ में आकर छीन रहा था

मेरा घर वो आज

बच्चे मेरे बिलख रहे थे

कैसी गिरी ये गाज

ना जाने क्या सोच कर उसने

ये पेड़ आज नही काटा

पेड़ भी बोला गुस्से से

मारूंगा एक चांटा

छाया देता ,फल भी देता

और आसरा सबको

फिर भला ये मानव

काट रहा क्यों मुझको

सुन कर सारी बातें

शेर जोर से दहाड़ा

आने दो  कल मानव…

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Added by Pragya Srivastava on June 10, 2013 at 11:04am — 5 Comments

वामनो का बाण है

एक घनाक्षरी मेरा भी -----

सूर्य की गभस्तियों से अग्नि वृष्टि हो रही है और ये शरीर स्वेद से न पाए त्राण है
प्राण वायु का अभाव खलने लगा है मित्र आज व्यग्र नासिका व हीन शक्ति घ्राण है
ये प्रतीत हो रहा कि लक्ष्य मानवी शरीर ही बना हुआ प्रयुक्त वामनो का बाण है
हे मनुष्य जाग देख स्वार्थ लोभ का प्रसार प्रकृति से खेलने की वृत्ति का प्रमाण है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
सर्वथा नूतन मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 10, 2013 at 11:03am — 6 Comments

मक्का से राम और काशी से अल्लाह की भी अलख जगानी है

मंदिर से घंटी ,मस्जिद से अजान की आवाज पूरी दुनिया को सुनाई है ,

धर्म बांटने की हमने कसम उठाई है .



मदिर से हिन्दू ,मस्जिद से मुसलमान बनाने की फैक्ट्री बनाई है ,

धर्म प्रचारक हैं हमने  गजब जिम्मेदारी निभाई है



मंदिर नापाक कर  मुसलमान  ने ,मस्जिद तोड़  हिन्दू ने खुशियाँ  मनाई…

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Added by Dr Dilip Mittal on June 10, 2013 at 10:42am — 4 Comments

वो पिता होता है : सरिता भाटिया

दो छोटी रचनाएँ पिता को समर्पित                      

                      1.

थाम ऊँगली जो चलाये वो पिता होता है

प्यार छुपा जो डांट से समझाए वो पिता होता है

कंधे बिठा सारी…

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Added by Sarita Bhatia on June 10, 2013 at 10:30am — 14 Comments

एक तल्ले पे था चाँद तो उन दिनों

पर कटे से पड़े तडफडाते रहे 

इश्क़ में उनके ऐसे फँसे दोस्तोँ !

 

रूबरू वो हुये चार पल के लिए 

जाम नैनों अधर के पिला दोस्तों !

 

मयकशी में मुकद्दर के मारे तभी 

लूट हँसते चले रोते हम दोस्तों…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 10, 2013 at 1:00am — 16 Comments

कुछ मुक्तक

गाँव बदले हुए हैं ,शहर हो गए ,

स्वार्थ की आत्म-केंद्रित नहर हो गए,

सूर्य में थीं यहीं नेह की रश्मियाँ

रिश्ते सब गर्म अब दोपहर हो गए !

*

आओ मिलकर मोड दें पन्ने किताब के ,

और ढूँढें फूल कुछ सूखे गुलाब के ,

सकपकाई उम्र ,वो बारिश सवालों की

खूबसूरत झूठ ,वो किस्से जवाब के !

*

दर्द को खूब लिखा ,

गहरे जा डूब लिखा ,

पाँव जब जलने लगे

पथ को हरी दूब लिखा !

*

रूप की एक नदी बहती है,,

खूबसूरत ए हंसी लगती है,

फूल,घाटी…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 9, 2013 at 10:00pm — 8 Comments

HAPPY FATHERS DAY

पिता वह खूबसूरत नाम है उस इंसान का जो अपने बच्चों की सारी ख्वाहिशों को पूरी करने में दिन रात एक कर देते हैं, उनके लिए सारे कष्टों को झेलते हैं, उन्हें दो समय की भले ही न रोटी मिले पर कहीं न कहीं से वे अपने बच्चों का पेट भरने के लिए दो समय की रोटी का इंतजाम करते हैं। 

वे धूप, ठंडक, आंधी-तूफ़ान, बारिश, किसी की परवाह किये बगैर दिन-रात मेहनत करते हैं। वे भले ही कभी अच्छे स्कूल में न पढ़े हों पर अपने बच्चों को हमेशा…

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Added by SAURABH SRIVASTAVA on June 9, 2013 at 4:00pm — 4 Comments

इंतजार

इंतजार 

करता हूँ इंतजार उसका 

कब वह आयेगी 

हाँ कब वह आयेगी 

सुबह से शाम तक 

रात से सुबह तक 

न सो  पाया पूरी रात 

उसके इंतजार में …

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Added by SAURABH SRIVASTAVA on June 9, 2013 at 3:31pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
गंगा-दशा // --सौरभ

(छंद - मनहरण घनाक्षरी)



गोमुखी प्रवाह जानिये पवित्र संसृता  कि  भारतीय धर्म-कर्म  वारती बही सदा

दत्त-चित्त निष्ठ धार सत्य-शुद्ध वाहिनी कुकर्म तार पीढ़ियाँ उबारती रही सदा

पाप नाशिनी सदैव पाप तारती रही उछिष्ट औ’ अभक्ष्य किन्तु धारती गही सदा    …

Continue

Added by Saurabh Pandey on June 8, 2013 at 8:30pm — 33 Comments

आधुनिक नेता( किरीट सवैया = भगण X ८)

ताकत झांकत लूटत पाटत,छीनत बीनत नोट फटा फट !

लोगन की परवाह नहीं अरु ,चाट रहे सब देश चटा चट!!

दौड़त भागत घूम रहे अरु, खाइ रहे सब कोष गटा गट !

बन्दर बांट करें फिर झूमत ,आपन लूट बढ़ाइ झटा झट !!



राम शिरोमणि पाठक"दीपक

मौलिक…

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Added by ram shiromani pathak on June 8, 2013 at 5:30pm — 21 Comments

मेरा प्यारा भारत

मेरा देश स्वर्ग से सुन्दर, जग में सबसे महान है |

वक्ष पर शोभें गंगा यमुना, प्रहरी हिमालय शान है |

जलधि हिन्द आ पाँव पखारे, सागर करें नित गान हैं |

हरदम रहे सुहाना मौसम, खेत की फसलें जान हैं |

सब मिलकर हर पर्व मनाते, भेद भाव का नाम नहीं |

साथ साथ रहते जनु भाई, मिलकर करते काम कहीं…

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Added by Shyam Narain Verma on June 8, 2013 at 3:30pm — 3 Comments

अक्स तेरा..//आबिद अली मंसूरी!

यह दिलकशी का आलम
यह ख़्यालोँ की अंजुमन,
हमसफर बन गयी हैँ जैसे
हिज़्र की तन्हाइयां..
हसरतोँ की आगोश मेँ
ली हैँ धड़कनोँ ने
फिर
अंगड़ाइयाँ चाहत की..
फूलोँ मेँ निहित खुश्बू की तरह
एक नयी सहर की आस लिए
आँखोँ मेँ उतर आया है जैसे
झिलमिल-झिलमिल
अक्स तेरा..!
>¤<>¤<>¤<>¤<>¤br /> (मौलिक व अप्रकाशित)
----->_आबिद अली मंसूरी

Added by Abid ali mansoori on June 8, 2013 at 3:15pm — 3 Comments

ग़ज़ल : अरुन शर्मा 'अनन्त'

फाईलु / फाइलातुन / फाईलु / फाइलुन

वज्न : २२१, २१२२, २२१, २१२

नैनो के जानलेवा औजार से बचें,

करुणा दया ख़तम दिल में प्यार से बचें,



पत्थर से दोस्त वाकिफ बेशक से हों न हों,

है आइना फितरती दीदार से बचें,

आदत सियासती है धोखे से वार की,

तलवार से डरे ना सरकार से बचें,

गिरगिट की भांति बदले जो रंग दोस्तों,

जीवन में खास ऐसे किरदार से बचें,

नफरत नहीं गरीबों के वास्ते सही,

यारों सदा दिमागी बीमार से…

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Added by अरुन 'अनन्त' on June 8, 2013 at 1:00pm — 14 Comments

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