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कुछ लम्हे ....

कुछ लम्हे ....

वो कुछ लम्हे

जो हमने मिलकर

अपनी झोली फैलाकर

ख़ुदा की हर चौखट पर

सर झुकाकर

मांगे थे //

वो कुछ लम्हे

जो हमारे ज़हन में

आज तक

इक दूसरे के वास्ते

वक्ते इज़हार के इंतज़ार में

ज़िंदा हैं //

वो कुछ लम्हे

जो हम दोनों ने

दो जिस्म इक जां

हो जाने के लिए मांगे थे

अब जब वो लम्हे

हमें नसीब हुए

तुम उनसे विमुख होने का सोच रही हो

अपनी ही आरज़ुओं का

अजन्मे ही गला घोंट…

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Added by Sushil Sarna on April 12, 2016 at 2:01pm — 2 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 212
कुर्सियों के खेल में माहिर हुए
भेद सारे आपके जाहिर हुए।1

ख्वाब लोगों को दिखाकर सुनहरे
आप तो पलकें नचा साहिर हुए।2

हो गये सब ही गुनाहों से बरी
वे जले फिर आप तो ताहिर हुए।3

हों भले कितने बड़े ही हाथ पर
आप तो कानून से बाहिर हुए।4

हारता अबतक मुआ यह तंत्र है
बिन किये कुछ आप तो काहिर हुए।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on April 12, 2016 at 12:55pm — 2 Comments

छोटे भगवान्

अदभुत अकथनीय वातावरण

आज भगवान स्वयं घर पधारे हैं ,

चारों –ओर खुशियाँ ही खुशियाँ लाये है

भगवान् या देवी जो भी हों

घर को खुशियों से भर दिया है 

आज अम्बर भी ,देव वियोग में आसूं बहा रहा है

हवायें भी व्याकुल हो

प्रभु को ढूढने चली आ रही हैं

इससे अनभिज्ञ ,अंजान हैं

हमारे छोटे भगवान् जी

घरवालों के प्रान जी

पर क्या इनकी पूजा होगी ?

क्या इनकी किलकारियां ,नटखट अदाएं यूँ ही रहेंगी ?

ऐसा प्रश्न क्यूँ आया

आना…

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Added by maharshi tripathi on April 12, 2016 at 10:39am — 2 Comments

तेरा इंतजार करते-करते (कविता)

ए हसीन लम्हे

जरा आहिस्ता गुजर,

बहुत बरस बिताए हैं

तेरा इंतजार करते-करते।



बहुत तडपे हैं

बहुत रोए हैं

आंसू भी खूब बहाए हैं

हमने आहें भरते-भरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



हठ किया है हमने

बादलों से निकलते

चांद की तरह

यहां तक पहुंचे हैं हम

जमाने की नजरों से

डरते- डरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



जाने क्या तडप थी

जाने क्या एहसास था

जिंदगी जी आज तक

हमने यूंही मरते-मरते।

बहुत बरस_ _ _ _।



मौलिक… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 12, 2016 at 9:27am — 2 Comments

रिजर्वेशन (लघु कथा )

रिजर्वेशन (लघु कथा )

--------------------------

हामिद का थर्ड ए सी का टिकट कन्फर्म हो चूका था , ट्रैन के आते ही वह पत्नी के साथ जयपुर के लिए रवाना हो गया | उसकी सीट के सामने 9 और 12 नंबर की बर्थ  थीं जिन पर लेटे यात्री आगे से आरहे थे | अगले स्टेशन पर दो महिलाएं कोच में चढ़ गयीं ,आते ही कहने लगीं कि बर्थ 9 और 12  हमारी हैं दो महीने पहले से रिजर्वेशन करवा रखा है | इतना सुनते ही दोनों यात्री सकते में आगये। ......... बहस शुरू हो गयी ,  दोनों यात्रियों ने मोबाइल पर कन्फर्म  मेल…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 11, 2016 at 9:43pm — 2 Comments

ग़ज़ल (ज़िंदगी का यही तो साहिल है )

ग़ज़ल (ज़िंदगी  का यही तो साहिल है )

----------------------------------------------

2122 -------1212 --------22

किस लिए मौत से तू ग़ाफ़िल है |

ज़िंदगी का यही तो साहिल  है |

जो बचाता है बद नज़र से उन्हें

उनके रुख़ का सियाह वह तिल है |

वह सफ़र में नहीं है साथ अगर

मेरे किस काम की वो मंज़िल है |

जितनी आसां है राह उल्फत की

उसकी मंज़िल भी उतनी मुश्किल है |

मेरी आँखों से देखिये उनको

वह…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 11, 2016 at 9:05pm — 2 Comments

अपने

उनकी क्या बात करूँ,

मैं अपनी ही सुनाता हूँ।

भाव-भंगिमा थी क्या उनकी,

मैं अपनी पर इतराता हूँ।

पसीना आए या खून बहे,

पर उनका क्या जाता है?

लूट लिया उन्होंने मुझको,

मुझे लुटना भी भाता है।

मीठी-मीठी वाणी से,

लूट हाड-मांस का सार लिया।

अपने पराये हो गए,

बिगाड सारा परिवार दिया।

धन-दौलत की क्या बात करूँ,

वो तो उनके पास रही।

क्या लेना मुझको था उससे,

वो गले में पडके खाक रही।

है अच्छाई और बुराई क्या,

मैं समझ नहीं पाता… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 11, 2016 at 5:06pm — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
जो कर सको तो दुआ करो (ग़ज़ल ) ..डॉ० प्राची

११२१२, ११२१२, ११२१२, ११२१२ 

मुझे ज़िन्दगी की तलाश है, मुझे ख़्वाब में न मिला करो।

न करो कभी कोई वायदा, जो करो तो फिर न फिरा करो।



वो जो चीर दे कोई पाक दिल, न ही तंज ऐसे कसा करो।

बड़ी मुश्किलों से भरा हो जो, न वो जख़्म फिर से हरा करो।…

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Added by Dr.Prachi Singh on April 11, 2016 at 2:48pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बाँध

उसके गले में गोया सहस्त्रों  केक्टस उग आये हों 

थोड़ी थोड़ी देर में उनको निगलने की कोशिश में

गले की कोशिकाएँ कभी खिंच रही थी

 कभी  फूल रही थी

साँसें नियंत्रण खो रही थी

आँखों में दर्द के लाल डोरे उभर आये थे

मुझे ऐसा लगा मैं बहते दरिया को  बाँध से रोकते हुए  देख रही हूँ

जो कितना तकलीफ देह है

कुछ देर  और देखती रहूंगी तो वो मेरी आँखों

के रास्ते बह चलेगा

क्यूँ नहीं उस दरिया को मुक्त किया जा रहा

भावनाओं पर नियंत्रण…

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Added by rajesh kumari on April 11, 2016 at 10:24am — 2 Comments

पर क्यों?

पर क्यों

पांच सौ रूपये महीने की बाई,

प्रतिस्थापित हो जाती है,

सहेली में,

सब सुख दुख,

सास की ज्यादतियां,

पति की बेवफाईयां,

बड़े प्रेम से सुनती है,

कमेंट्स भी देती है ,

मरहम भी रखती है,

चली जाती है दूसरे घर,

बेतार की सेवा प्रदान करने।

कभी कभी,

प्रतिस्थापित हो जाती है,

संशय के घेरे में,

शक के डेरे में,

सौत बन जाती है,

पर देहरी नहीं छुड़ाती,

अजीब सी कसमसाहट देती है,

रस भरी प्रेम पगी,

कथायें सुनाती है…

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Added by Pawan Jain on April 11, 2016 at 10:05am — No Comments

दोहा छंद......ग्यारह मनके

दोहा छंद......ग्यारह मनके

भले भलाई ही करें, बुरे बुने नित जाल.

भले हुए यश-चांदनी, बुरे क्रूर-तम-काल.१

सत्य-अहिंसा-प्रेम रस, सदगुरु की पहचान.

रखे मुक्त हर दोष से, जैसे कमल-कमान.२

सूरज की किरनें चली, सत्य ज्ञान के पार.…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 10, 2016 at 10:49am — 4 Comments

लग्न-मुहूर्त(लघुकथा)-सतविंदर कुमार

"अरे!जानती हो आचार्य जगत ज्ञानी जी की पुत्रवधु मरते-मरते बची। बस भगवान ने साँसे बख्श दी। वर्ना ऐसा दुःख मिला है जीवन भर कलेजे में ठुंसा रहेगा।बेचारी!"

बैठने के लिए पीढ़ा सरकाते हुए मुख्तारी ताई एक साँस में बोल गई।

"हाँ! सुना तो है कि कल उसकी तबियत ज्यादा ख़राब हो गई थी। शहर के नर्सिंग होम में ही दाखिल है। अभी तक..."

कुछ सोचते हुए फिर बोली, "अब तो उसकी तबीयत में काफी सुधार है।फिर आप किस दुःख की बात कर रही हो ताई?"

सहमते हुए।

"अरे! जानती हो न कि उसका प्रसव का समय नजदीक…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on April 10, 2016 at 9:30am — 6 Comments

दोहे(विविधा-21)

सृत्वा सोम सुरेश शिव,नंदीश्वर नटराज।
अनघ अघोर अज्ञेय जी,पूर्ण करें सब काज।।

गंगा जल व् विल्व पत्र,लिए पुष्प मंदार।
हे शेखर अर्पित करूँ,स्वीकारें अभिसार।।

जीवन भर ऐसा रहे ,हो उनका सम्मान।
माता बहना रूप जो,उनको अर्पण जान।।

संगी साथी या सखा,कह दूँ तुमको मित्र।
इक दूजे में यूँ बसे, जैसे छाया चित्र।।

कितना किसने कब दिया,है कितना अनुपात।
स्वार्थ दिखे सम्बन्ध पर,हावी मुझको तात।।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on April 8, 2016 at 2:30pm — 4 Comments

गीत-आज प्रिये कुछ कहना चाहूँ।

आज प्रिये! कुछ कहना चाहूँ, हिय में तेरे रहना चाहूँ।

तेरे तन-मन में खोया मैं खोया ही अब रहना चाहूँ।।

आज प्रिये! कुछ.........



निज नृग-से न्यारे नयनों में अंजन-सा मुझे रचा लो तुम।

उलझा लो कुंचित-केशों में या गजरा मुझे बना लो तुम।।

अधरों की लाली बन प्यारी मैं अधर-सुधा पा लेना चाहूँ।

आज प्रिये! कुछ............



कानों का कुंडल बन जाऊँ या उर का हार बना लो तुम।

बन जाऊँ छम-छम पायल मैं या कंगन मुझे बना लो तुम।

नथ की नथिया बन सजनी मैं चूम होठ को लेना… Continue

Added by रामबली गुप्ता on April 8, 2016 at 10:01am — 1 Comment

दवा लाते नहीं कोई दिले बीमार की ख़ातिर- बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान – 1222 1222 1222 1222

 

सभी आते हैं घर मेरे महज़ दीदार की खातिर|

दवा लाते नहीं कोई दिले बीमार की  ख़ातिर|

 

सुना है दान वीरों में भी उनका नाम आता है,

मगर वो दान करते है तो बस जयकार की  ख़ातिर|

 

वो मंदिर और मस्जिद में लुटाते लाख पर अफ़सोस,

नही लेकिन दिया कुछ भी कभी लाचार की  ख़ातिर|

 

बनाता मैं भी इक बंगला जो रिश्ते ताक पर रखता,

मगर रहता हूँ कुटिया में तो बस परिवार की  ख़ातिर|

 

बता तू सरफिरा है…

Continue

Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on April 7, 2016 at 5:30pm — 2 Comments

वफा उस पार से रखते मगर इस पार गद्दारी - गजल - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

1222 1222 1222 1222

कहाँ तक  नाव  जाएगी करे पतवार गद्दारी

गजल लय में रहे कैसे करें असआर गद्दारी ।1।

भले कहना सरल है ये यहाँ हर नींव पक्की है

सलामत  छत  रहे  कैसे  करे  दीवार  गद्दारी ।2l

कहा करते हैं दुर्जन भी ये तो तहजीब का फल है

सुहाती है किसी  को  ढब  किसी  को भार गद्दारी ।3l

न जाने यार क्या होगा चमन में हाल फूलों का

अगर करने  लगे यूँ  ही  कसम  से खार गद्दारी ।4l

जुड़े जब स्वार्थ ही केवल…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 7, 2016 at 12:00pm — 2 Comments

वही नर्म अहसास ....

वही नर्म अहसास ....

वही नर्म अहसास

किसी सुर्ख शफ़क़ से

पलकों की खिड़की में

यादों की शरर बन

जाने कब

मेरी रूह में उतर गए//

वही नर्म अहसास

मेरी तन्हाईयों को

मुझसे लिपट

मेरी करवटों को

ख़ुशनुमा सुरों से सजा

मेरी हयात को

जीने की अदा दे गए//

वही नर्म अहसास

फिर किसी गुजरे लम्हे से निकल

दिल के करीब यूँ हंसे

मानो फ़िज़ाओं ने हौले से

अपनी पाज़ेब छनकाई हो

शोखियों में डूबी

जैसे कोई…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 6, 2016 at 9:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल-नूर --वक़्त यूँ आज़माता रहा

२१२/२१२/२१२

.

वक़्त यूँ आज़माता रहा,

रोज़ ठोकर लगाता रहा.

.

साहिलों पर समुन्दर ही ख़ुद,

नाम लिखता,, मिटाता रहा.

.

वो मेरे ख़त जलाते रहे,  

और मैं दिल जलाता रहा.

.

वक़्त कम है, पता था मुझे

रोज़..फिर भी लुटाता रहा.   

.

डूबती नाव का नाख़ुदा,

बस उम्मीदें बँधाता रहा.

.

वो समझते रहे शेर हैं,

धडकनें मैं सुनाता रहा.

.

कोई तो प्यास से मर गया,

कोई आँसू बहाता…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on April 6, 2016 at 5:04pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
सपनों को सजा कर देखूँ (ग़ज़ल)// डॉ. प्राची

2122, 1122, 1122, 22



खुद को मिट्टी में चलो फिर से मिला कर देखूँ।

आख़िरी बार सही, रिश्ता निभा कर देखूँ।



उसने सीने में ही बारूद छिपा रक्खा है,

कैसे चिंगारियाँ नफरत की बुझा कर देखूँ?



दर्द अब रूह तलक मुझको न झुलसा डाले,

उफ़! ये लावा मैं कहाँ आज बहा कर देखूँ?



ज़िन्दगी मौत की दहलीज़ पे लाई, फिर भी-

दिल ये कहता है कि सपनों को सजा कर देखूँ।



मुख जो मोड़ा था हकीकत से, हुआ क्या हासिल?

कर के हिम्मत ज़रा नज़रें तो मिला कर… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 6, 2016 at 1:21pm — 4 Comments

गुफ़्तगू हो रही सबकी दीवार से (ग़ज़ल)

212   212   212   212

ये है आलम अब आपस की तकरार से

गुफ़्तगू   हो   रही   सबकी   दीवार  से

फिर  हमें  कब रहा  डर किसी  वार से

लफ्ज़  अपने  हुए  जब से हथियार से

कुछ ख़बर  हो न पाई  हमें,  इस क़दर

जिस्म से  दिल निकाला गया  प्यार से

सोचिये,  स्वस्थ   तब   देश   कैसे  रहे

ख़ैरख़्वाह  आज  सारे   हैं  बीमार - से

जीत को जब बनाया है मक़सद,तो फिर

मैं  भला   क्यों  डरूं   एक - दो  हार…

Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on April 5, 2016 at 10:08pm — 1 Comment

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