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सदस्य टीम प्रबंधन
पर्यावरण-दिवस के अवसर पर छ: दोहे // --सौरभ

आपाधापी, व्यस्तता, लस्त-पस्त दिन-रात

छोड़ इन्हें, आ चल सुनें, कली-फूल की बात ।



मन मारे चुप आज मैं.. सोचूँ अपना कौन..

बालकनी के फूल खिल, ढाँढस देते मौन !!



सांत्वना वाले हुए.. हाथ जभी से दूर ..

लगीं बोलने डालियाँ, 'मत होना मज़बूर' !!



जाने आये कौन कब, मन की थामे डोर

तुलसी मइया पोंछना, नम आँखों की कोर



फिर आया सूरज लिये, नई भोर का रूप

उठ ले अब अँगड़ाइयाँ, निकल काम पर धूप ! 

 

मन-जंगल उद्भ्रांत है, इसे चाहिए त्राण…

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Added by Saurabh Pandey on June 5, 2021 at 5:30pm — 10 Comments

थी अस्ल में सियाह वो रंगीन हम ने की.....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

थी अस्ल में सियाह वो रंगीन हम ने की

कुछ इस तरह से रात की तज़ईन हम ने की (1)

उनकी नज़र के सामने गिरने से बच गए

कल आइने में अपनी ही तौहीन हम ने की (2)

अपने गिरोह में हमें शामिल तो कीजिए

लोगों ने दी हैं गालियाँ तहसीन हम ने की (3)

उस ने तो चीर फाड़ के क्या कर दिया इसे

पहलू में दिल नहीं था ये तस्कीन हम ने की (4)

सौ काम ठीक ठाक कीये आज तक मगर

ग़लती भी एक बारहा संगीन हम ने की…

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Added by सालिक गणवीर on June 5, 2021 at 9:00am — 10 Comments

कम है-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२

गीत में सद् भावना का ज्वार कम है

सर्वहित की कामना का ज्वार कम है।१।

**

दे रहे  सब  सान्त्वना  पर  जानता हूँ

शुद्ध मन की प्रार्थना का ज्वार कम है।२।

**

सिद्ध कैसे  झट  से  होगी  योग  माया

आज साधक साधना का ज्वार कम है।३।

**

सत्य मर्यादा टिकेगी किस तरह अब

हर किसी में वर्जना का ज्वार कम है।४।

**

हर नगर श्मसान जैसा आज दिखता

किस नयन में वेदना का ज्वार कम है।५।

**…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 4, 2021 at 1:20pm — 11 Comments

समझा बताओ किसने किताबों ने जो कहा-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२

लिक्खा सजा के हम ने उजालों ने जो कहा

लाया  मगर  अमल  में  अँधेरों  ने जो कहा।१।

**

बैठक में ला के रख दी वो शोभा बढ़ाने को

समझा बताओ किसने किताबों ने जो कहा।२।

**

देखा जो उसको मान के आँखों का धोखा है

जाना  अमर  है  सत्य  हवाओं  ने  जो  कहा।३।

**

सोचा ही था कि शाप के परिणाम आ गये

आया असर  न  एक  दुआओं ने जो कहा।४।

**

इस दौर कह के झूठ है अन्नों की बात को

सच कह रही है  देह  दवाओं ने जो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 3, 2021 at 11:30am — 9 Comments

ग़ज़ल: लाओ जंजीर मुझे पहना दो

2122 1122 22

लाओ जंजीर मुझे पहना दो 

मेरी तकदीर मुझे पहना दो

तुम ख़ुदा हो तो ये डर कैसा है

मेरी तहरीर मुझे पहना दो

जो भी चाहो वो सज़ा दो मुझको

जुर्म ए तामीर मुझे पहना दो

पहले काटो ये ज़ुबाँ मेरी फिर

कोई तज़्वीर मुझे पहना दो

मुफ़्लिसी ज़ुर्म अगर है मेरा

सारी ताजी़र मुझे पहना दो

आज आया हूँ मैं हक की खातिर

कोई तस्वीर मुझे पहना दो

मौलिक व…

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Added by Aazi Tamaam on June 2, 2021 at 12:30pm — 9 Comments

ग़जलः

ग़जलः

2122 2122 2122 212

मुन्तज़िर थे हम मगर मिलना मयस्सर ना हुआ

वस्ल तो तय थी नसीबा पर हमारा ना हुआ

चाँद रातों में तड़पता वस्ल की खातिर कोई

वो मुहर लब पर हुई कब वो नज़ारा ना हुआ

चाँदी की दीवारें आड़े आईं आशिक प्यार के

मुफलिसों को प्यार का या रब सहारा ना हुआ

जो पहुँचना था हमें अफलाक की ऊँचाइयों,

रह गये बैठे जमीं कोई हमारा ना हुआ ।

टूटती साँसे रही मकतल बना अस्पताल अब,

ज़िन्दगी तेरा भरोसा…

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Added by Chetan Prakash on June 2, 2021 at 11:30am — 4 Comments

जिसे दिल ने चाहा, मिला ही नहीं...

जिसे दिल ने चाहा, मिला ही नहीं
सिवा इसके कोई गिला ही नहीं

नसीबों में उनके बहारें लिखीं
इधर तो कोई सिलसिला ही नहीं

कहां से महकतीं ये फुलवारियां
कोई फूल अब तक खिला ही नहीं

जड़ें उसकी मजबूत थीं इसलिए
शज़र आंधियों में हिला ही नहीं

यहां भीड़ में भी अकेले हैं सब
मुहब्बत का वो काफ़िला ही नहीं।।  # अतुल कन्नौजवी

                                    (मौलिक व अप्रकाशित)

Added by atul kushwah on June 1, 2021 at 8:31pm — 1 Comment

लावणी छन्द,संपूर्ण वर्णमाला पर प्रेम सगाई

(सम्पूर्ण वर्णमाला पर एक अनूठा प्रयास)

.

अभी-अभी तो मिली सजन से,

आकर मन में बस ही गये।

इस बन्धन के शुचि धागों को,

ईश स्वयं ही बांध गये।

उमर सलोनी कुञ्जगली सी,

ऊर्मिल चाहत है छाई।

ऋजु मन निरखे आभा उनकी,

एकनिष्ठ हो हरषाई।

ऐसा अपनापन पाकर मन,

ओढ़ ओढ़नी झूम पड़ा,

और मेरे सपनों का राजा,

अंतरंग मालूम खड़ा।

अ: अनूठा अनुभव प्यारा,

कलरव सी ध्वनि होती है।

खनखन चूड़ी ज्यूँ मतवाली,

गहना…

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Added by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on June 1, 2021 at 8:30am — 10 Comments

माधव मालती छन्द, नारी शौर्य गाथा

कष्ट सहकर नीर बनकर,आँख से वो बह रही थी।

क्षुब्ध मन से पीर मन की, मूक बन वो सह रही थी।



स्वावलम्बन आत्ममंथन,थे पुरुष कृत बेड़ियों में।

एक युग था नारियों की,बुद्धि समझी ऐड़ियों में।

आज नारी तोड़ सारे बन्धनों की हथकड़ी को,

बढ़ रही है,पढ़ रही है,लक्ष्य साधें हर घड़ी वो।



आज दृढ़ नैपुण्य से यह,कार्यक्षमता बढ़ रही है।

क्षेत्र सारे वो खँगारे, पर्वतों पर चढ़ रही है।

नभ उड़ानें विजय ठाने, देश हित में उड़ रही वो,

पूर्ण करती हर चुनौती…

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Added by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on May 31, 2021 at 5:00pm — 4 Comments

करने को नित्य पाप जो-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



करने को नित्य  पाप  जो  गंगा नहायेंगे

हम से अधिक न यार कभी पुण्य पायेंगे।१।

**

तन के धुलेंगे पाप न पावन जो मन हुआ

अंतस में ग्लानि होगी तो गंगा को आयेंगे।२।

**

कोसेेंगे एक दिन तो स्वयं अपने आप को

अपनी नजर से बोलिए क्या क्या छिपायेंगे।३।

**

हम को भले ही भाव न तुम दो अभी मगर

घन्टी बजा कलम  से  तो  हम ही जगायेंगे।४।

**

जिनको शऊर आया न दीपक जलाने का

कहते  हैं  रोशनी  को  वो  सूरज  उगायेंगे।५।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 31, 2021 at 10:00am — 8 Comments

कोई बिका तो लाया है कोई खरीद कर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

कोई बिका तो लाया है कोई खरीद कर

दुनिया में आज हो रही शादी खरीद कर।१।

**

हम हर गली या चौक पे चर्चा में व्यस्त हैं

लाला चलाता  देश  है  खादी खरीद कर।२।

**

पाया अधिक तो हो गया दुश्मन की ओर ही

किसका हुआ  वकील  है  वादी खरीद कर।३।

**

रखता बचा के  कौन से जीवन के हेतु वो

बच्चों को लोभी देता न टाफी खरीद कर।४।

**

खुद खाके भूख माँ ने खिलाया था कौर इक

कमतर उसे जो दें  भी  तो  रोटी खरीद कर।५।

**

कर्मों से जो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 30, 2021 at 10:05am — 4 Comments

ग़ज़ल: सुख दुख जीवन के हैं साथी क्यों रोता है तू यार

22 22 22 22 22 22 22 1

कोई करता है उद्धार कोई करता अत्याचार  

इस रंगमंच दुनिया में है सबका अपना किरदार

सुख दुख जीवन के हैं साथी क्यों रोता है तू यार

मिट ही जायेंगे सारे दुख जब छूटेगा संसार

जी भर के जीले हर इक पल ज़िद करना है बेकार

तन्हाई में कितने मौसम गुजरे हैं कितनी बार

कोई तो मिल जाये दिल कस्ती वाला इस पार

बैठे हैं साहिल पर कब से लेकर खाली पतवार

ऐसे भी तो ना घूमा कर लेकर दुख का…

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Added by Aazi Tamaam on May 28, 2021 at 9:00am — 2 Comments

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम मर जाओ

रणभेरी बजने से पहले अच्छा है तुम घर जाओ

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम मर जाओ

कितनी ही आशाएं तुमसे लगी हुई है, टूटेंगीं

कितनी ही तकदीरें तुमसे जुड़ी हुई हैं, रूठेगीं



तेरे पीछे मुड़ जाने से कितने सिर झुक जाएंगे

कितने प्राण कलंकित होंगे कितने कल रुक जाएंगे



उतर गए हो बीच समर तो कौशल भी दिखला जाओ

हिम्मत के बादल बन कर तुम विपदाओं पर छा जाओ

तप कर और प्रबल बनकर तुम शोलों बीच सँवर जाओ

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम…

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Added by आशीष यादव on May 28, 2021 at 12:11am — 7 Comments

अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

2×11

बदहाली का एक समंदर सर पर है।

शहर की हालत वीरानों से बदतर है।

जिद पर तो बेशक मैं भी आ सकता हूँ ,

लेकिन मुझको बात बिगड़ने का डर है।

जो आँखों की भाषा समझ नहीं पाते,

उन लोगों से कुछ ना कहना बेहतर है।

लूट लिया जिसने आपस के रिश्तों को,

तुम लोगों की आँखों मे वो रहबर है?

नीव हिलाकर चीख रहे हैं झूठे लोग,

उनके पास योजना सबसे बढ़कर है।

एक इमारत है बनने की कोशिश में,

उसकी खातिर मुश्किल…

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Added by मनोज अहसास on May 27, 2021 at 11:44pm — 8 Comments

आँसू हमारी आँखों में लाने का शुक्रिया-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



मीठी सी बात कर के लुभाने का शुक्रिया

फिर गीत ये विकास के गाने का शुक्रिया।१।

***

हमको दुखों से एक भी शिकवा नहीं भले

होते हैं सुख के दिन ये बताने का शुक्रिया।२।

**

वादे सियासती  ही  सही  हम को भा गये

फिर से दिलों में आस जगाने का शुक्रिया।३।

**

खातिर भले ही वोट की आये हो गाँव तक

यूँ पाँच साल  बाद  भी  आने  का शुक्रिया।४।

**

पथरा गयीं थी देखते पथ ये तुम्हारा जो

आँसू हमारी आँखों में लाने का शुक्रिया।५।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 27, 2021 at 8:15pm — 6 Comments

कामरूपछन्द_वितालछन्द, माँ की रसोई

माँ की रसोई,श्रेष्ठ होई,है न इसका तोड़,

जो भी पकाया,खूब खाया,रोज लगती होड़।

हँसकर बनाती,वो खिलाती,प्रेम से खुश होय,

था स्वाद मीठा,जो पराँठा, माँ खिलाती पोय।

खुशबू निराली,साग वाली,फैलती चहुँ ओर,

मैं पास आती,बैठ जाती,भूख लगती जोर।

छोंकन चिरौंजी,आम लौंजी,माँ बनाती स्वाद,

चाहे दही हो,छाछ ही हो,कुछ न था बेस्वाद।

मैं रूठ जाती,वो मनाती,भोग छप्पन्न लाय,

सीरा कचौरी या पकौड़ी, सोंठ वाली चाय।

चावल पकाई,खीर लाई,तृप्त मन हो जाय,…

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Added by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on May 25, 2021 at 8:30pm — 2 Comments

चल आज मिल के दोनों.....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212



चल आज मिल के दोनोंं क़सम ये उठाएँ हम

तुम हमको भूल जाओ तुम्हें भूल जाएँ हम (1)

इह तरह तो हमारा गला बैठ जाएगा

कब तक असम को अपनी कहानी सुनाएँ हम (2)

पीछा न अपना छोड़ेंगी यादों की बिल्लियाँ

चल यार इनको दूर कहीं छोड़ आएँ हम (3)

तेरे ख़िलाफ़ फिर से न आवाज़ उठ सके

लोगों के साथ अपना गला भी दबाएँ हम (4)

मुद्दत से आरज़ू है हमारी ऐ जान-ए-मन

इक शाम तेरे साथ कभी तो बिताएँ हम…

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Added by सालिक गणवीर on May 25, 2021 at 10:30am — 5 Comments

रसाल_छन्द, प्रकृति से खिलवाड़

सुस्त गगनचर घोर,पेड़ नित काट रहें नर,

विस्मित खग घनघोर,नीड़ बिन हैं सब बेघर।

भूतल गरम अपार,लोह सम लाल हुआ अब,

चिंतित सकल सुजान,प्राकृतिक दोष बढ़े सब।

दूषित जग परिवेश, सृष्टि विषपान करे नित।

दुर्गत वन,सरि, सिंधु,कौन समझे इनका हित,

है क्षति प्रतिदिन आज,भूल करता सब मानव,

वैभव निज सुख स्वार्थ,हेतु बनता वह दानव।

होय विकट खिलवाड़,क्रूर नित स्वांग रचाकर।

केवल क्षणिक प्रमोद,दाँव चलते बस भू पर,

मानव कहर मचाय,छोड़ सत धर्म विरासत…

Continue

Added by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on May 22, 2021 at 5:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल: नेकियों का अता नहीं मिलता

2122 1212 22

नेकियों का अता नहीं मिलता

खुल्द से वास्ता नहीं मिलता

क्यों भला दिल दुखाने वालों को

दंड बाद ए ख़ता नहीं मिलता

तुझको मेरा पता नहीं मिलता

मुझको तेरा पता नहीं मिलता

ऐ ख़ुदा है भी तू या फ़िर कि नहीं

तुझसे क्यों राब्ता नहीं मिलता

कौन ऐसा है जो कि मुफ्लिस के

ज़िस्म को नोंचता नहीं मिलता

दिल की मंज़िल भी कोई मंजिल है

आज़ तक रास्ता नहीं…

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Added by Aazi Tamaam on May 19, 2021 at 9:44am — No Comments

कालिख सना समय

जब-जब कालिख सने समय के,

पन्ने खोले जाएंगे

मानवता पर लगे ग्रहण को,

सीधा याद दिलाएंगे।

आफत को जो अवसर मानें,

लाभ कमाने बैठे हैं

अन्तस् को बस मार दिया है,

हठ में अपनी ऐंठे हैं

आज हवा और दवा सब पर,

जिनका पूरा कब्जा है

जान छीनने के कामों को,

ही करने का जज़्बा है।

उनके सारे कर्म आज के,

सदा ही मुँह चिढाएंगे।

जब-जब कालिख सने समय के,

पन्ने खोले जाएंगे।

कुर्सी का लालच कुर्सी का

मद अब जिन पर छाया है

जिनके…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 18, 2021 at 5:00pm — No Comments

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