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माधव मालती छन्द, नारी शौर्य गाथा

कष्ट सहकर नीर बनकर,आँख से वो बह रही थी।
क्षुब्ध मन से पीर मन की, मूक बन वो सह रही थी।


स्वावलम्बन आत्ममंथन,थे पुरुष कृत बेड़ियों में।
एक युग था नारियों की,बुद्धि समझी ऐड़ियों में।

आज नारी तोड़ सारे बन्धनों की हथकड़ी को,
बढ़ रही है,पढ़ रही है,लक्ष्य साधें हर घड़ी वो।


आज दृढ़ नैपुण्य से यह,कार्यक्षमता बढ़ रही है।
क्षेत्र सारे वो खँगारे, पर्वतों पर चढ़ रही है।

नभ उड़ानें विजय ठाने, देश हित में उड़ रही वो,
पूर्ण करती हर चुनौती हाथ ध्वज ले बढ़ रही वो।


संकटों में कंटकों से है उबरती आत्मबल से,
अब न अबला पूर्ण सबला विजय उसकी शौर्यबल से।

राष्ट्र सेवक मार्गदर्शक हौंसलों के पर लगाये,
अड़चनों से दुश्मनों के होश देती वो उड़ाये।


शान भी अभिमान भी वह देश का सम्मान नारी,
आज कहता विश्व सारा है गुणों की खान नारी।।
★★★★★★★★★★★★★★

यह मापनी आधारित मात्रिक छन्द है।
इसकी मापनी निम्न है-
2122 2122 2122 2122
चूंकि यह मात्रिक छन्द है अतः गुरु वर्ण (2) को दो लघु (11) में तोड़ा जा सकता है।
इसके चार चरण होते हैं, जिनमें दो-दो या चारों चरण समतुकांत होने चाहिए।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on June 2, 2021 at 7:50am

आपने रचना को मान दिया, हार्दिक आभार आशीष यादव जी।

Comment by आशीष यादव on June 1, 2021 at 11:14pm

बहुत सुंदर रचना हुई है

Comment by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on June 1, 2021 at 1:55pm

उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार लक्ष्मण धामी जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 1, 2021 at 10:37am

आ. सुचिसंदीप जी, माधवी छंद में सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

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