For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़जलः
2122 2122 2122 212

मुन्तज़िर थे हम मगर मिलना मयस्सर ना हुआ
वस्ल तो तय थी नसीबा पर हमारा ना हुआ

चाँद रातों में तड़पता वस्ल की खातिर कोई
वो मुहर लब पर हुई कब वो नज़ारा ना हुआ

चाँदी की दीवारें आड़े आईं आशिक प्यार के
मुफलिसों को प्यार का या रब सहारा ना हुआ

जो पहुँचना था हमें अफलाक की ऊँचाइयों,
रह गये बैठे जमीं कोई हमारा ना हुआ ।

टूटती साँसे रही मकतल बना अस्पताल अब,
ज़िन्दगी तेरा भरोसा मुस्तकिल सा ना हुआ ।

कब ज़रूरत है बहस की कौन सी पैथी अच्छी,
तर्क ए तअल्लुक आज कोई तो गँवारा ना हुआ

आजा महबूब मिरे इकरार तो कर प्यार का,
रार मत कर, बिन तेरे तो वो गुजारा ना हुआ ।

तनक़ीद अच्छी न वो होती प्यार- मुहब्बत के लिय़े,
है लबों दम प्यार वो, तेरा सहारा ना हुआ ।

मौलिक व अप्रकाशित

प्रोफ. चेतन प्रकाश 'चेतन'

Views: 567

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Chetan Prakash on June 4, 2021 at 4:02pm

आदाब,  जनाब, Nilesh Shevgaonkar!  मधुर स्मृति ! आपने सही  कहा, मान्यवर, किन्तु  कई शायर इस तरह भी  लेते हैं ! साभार, बंधुवर!

Comment by Chetan Prakash on June 4, 2021 at 3:51pm

भाई लक्ष्मण सिंह  मुसाफिर  आदाब,  आप ने सही कहा असल में सारी ग़ज़ल  लाइव  अंकित  की गयी थी सो,मतले के  ऊला  मे  शाब्दिक  क्रम बिगड़ गया !दरअसल  ऊला, " मुन्तजिर थे पर मयस्सर  हमको मिलना ना हुआ" ही था ! आपने ग़ज़ल तक पहुंचने की ज़हमत की, इस के लिए आपका  आभारी हूँ ! सधन्यवाद  !

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 3, 2021 at 4:19pm

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन । गजल के प्रयास के लिए हार्दिक बधाई।
गजल में आपने काफिया क्या लिया यह समझ नहीं आया। स्पष्ट करें।
यदि आ लिया है तो इस प्रकार करें

मुन्तज़िर थे पर मयस्सर हमको मिलना न हुआ
वस्ल तो तय थी नसीबा पर हमारा न हुआ

यदि आरा लिया है तो शेरों को बदलने का प्रयास करें। इस संदर्भ में भाई नीलेश जी कह ही चुके हैं । सादर...

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 3, 2021 at 12:37pm

आ. चेतन प्रकाश जी,

मतले में क़वाफ़ी ठीक नहीं है .. 
ग़ज़ल में ना को न की तरह १ मात्रा पर बाँधा जाता है ..देखिएगा..
सादर 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"इल्म गिरवी है अभी अपनी जहालत के लिए ढूँढ लो क़ौम नयी अब तो बग़ावत के लिए अब अगर नाक कटानी ही है हज़रत…"
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।"
10 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"2122, 1122, 1122, 112/22 सर झुका देते हैं हम उसकी इबादत के लिए एक दिल चाहिए हमको तो मुहब्बत के…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सादर अभिवादन।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिएकर्बला   साथ   चले   कौन …"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
" स्वागतम "
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 190 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा नौजवान शायर…See More
Tuesday
आशीष यादव posted a blog post

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत…See More
Apr 20
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, प्रस्तुत दोहों की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर"
Apr 19
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय जयहिंद रायपुरी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर आपने  दोहा छंद रचने का सुन्दर प्रयास किया है।…"
Apr 19
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  सही कहना है हम भारतीय और विशेषकर जो अभावों में पलकर बड़े हुए हैं, हर…"
Apr 19
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभाजी हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
Apr 19

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service